सिंधी भाषा और संस्कृति का संरक्षण ही राष्ट्र की शक्ति- वासुदेव देवनानी

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सिंधी भाषा और संस्कृति का संरक्षण ही राष्ट्र की शक्ति- वासुदेव देवनानी


सिंधी भाषा और संस्कृति का संरक्षण ही राष्ट्र की शक्ति- वासुदेव देवनानी


सिंधी समुदाय के योगदान विषय पर हुई एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी

अजमेर, 13 जनवरी(हि.स.)। राजस्थान विधानसभा अध्यक्ष वासुदेव देवनानी ने कहा कि सिंधी समाज भारत की बहुसांस्कृतिक आत्मा का एक सशक्त और गौरवपूर्ण अंग है, जिसकी जड़ें सिंधु घाटी की प्राचीन सभ्यता से जुड़ी हुई हैं। 1947 के विभाजन में इस समाज ने भारी पीड़ा और विस्थापन सहा, परंतु अपनी भाषा, संस्कृति और आत्मसम्मान को अक्षुण्ण रखते हुए भारत में नए सिरे से जीवन आरंभ किया। परिश्रम, ईमानदारी और उद्यमशीलता के बल पर सिंधी समाज ने व्यापार, उद्योग, शिक्षा और सेवा के क्षेत्रों में देश की प्रगति में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

देवनानी महर्षि दयानंद सरस्वती विश्वविद्यालय अजमेर के सिंधु शोध पीठ एवं राष्ट्रीय सिंधी भाषा विकास परिषद नई दिल्ली के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित भारत के विकास में सिंधी समुदाय के योगदान विषय पर आयोजित एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी तथा पारितोषिक वितरण का कार्यक्रम को मुख्य अतिथि के रूप में संबोधित कर रहे थे।

महर्षि दयानंद सरस्वती विश्वविद्यालय के स्वराज सभागार में आयोजित कार्यक्रम में हरि सेवा धाम भीलवाड़ा के महामंडलेश्वर स्वामी हंसराम महाराज ने आशीर्वचन प्रदान किया। कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रोफेसर सुरेश कुमार अग्रवाल महर्षि दयानंद सरस्वती विश्वविद्यालय के कुलगुरु ने की।

कार्यक्रम में मुख्य अतिथि प्रो वासुदेव देवनानी ने कहा कि सिंधी समाज ने अस्पतालों, शिक्षण संस्थानों और सामाजिक सेवाओं के माध्यम से इस राष्ट्र के मानव संसाधन को सशक्त किया। स्वतंत्रता संग्राम से लेकर स्वतंत्र भारत तक सिंधी समाज ने बलिदान, नेतृत्व और राष्ट्रभक्ति की मिसालें प्रस्तुत की हैं। सिंधी भाषा, लोकसंस्कृति और सनातन मूल्य भारतीय सांस्कृतिक विविधता को समृद्ध करते हैं। आज भी यह समाज आर्थिक विकास के साथ सांस्कृतिक संरक्षण और सामाजिक समरसता के माध्यम से राष्ट्र निर्माण में सक्रिय भूमिका निभा रहा है।

इस अवसर पर हरि सेवा धाम भीलवाड़ा के महामंडलेश्वर स्वामी हंसराम महाराज ने आह्वान किया कि सिंधु केवल एक भूभाग नहीं, बल्कि सनातन सभ्यता का जीवंत केंद्र रहा है, सिंधी समाज आर्थिक रूप से सशक्त होते हुए भी संगठित शैक्षिक व सांस्कृतिक ढांचे के अभाव में कमजोर पड़ रहा है। स्वामी हंसराम ने चेताया कि केवल सरकार पर निर्भर रहने से कुछ नहीं होगा, समाज को स्वयं जागृत होकर प्रतिनिधित्व, अधिकार और संरक्षण के लिए आगे आना होगा। भाषा को बचाना सबसे पहला कर्तव्य है, क्योंकि घर में बोली जाने वाली भाषा ही पीढ़ियों तक संस्कृति को जीवित रखती है। यही आने वाली पीढ़ियों के लिए सच्ची विरासत और अपने पुरखों के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

इस अवसर पर कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे विश्वविद्यालय के कुलगुरु प्रो सुरेश कुमार अग्रवाल ने कहा कि समाज चाहता है कि विश्वविद्यालय सक्रिय, शोधोन्मुख और वैदिक-सनातन परंपरा से जुड़ा हुआ विश्वविख्यात संस्थान बने। उन्होंने रेखांकित किया कि सिंधु सभ्यता केवल एक भूभाग नहीं, बल्कि विविधता, सहअस्तित्व और सनातन मूल्यों की महान सभ्यता है, जिसका भारत की सांस्कृतिक पहचान में अद्वितीय योगदान है। वासुदेव देवनानी के प्रयासों और दूरदृष्टि से सिंधु शोध पीठ एवं सिंधी भाषा-संस्कृति के संरक्षण का कार्य नई गति से आगे बढ़ रहा है। कुलगुरु ने इस बात पर जोर दिया कि सिंधी भाषा केवल एक समुदाय तक सीमित न रहकर राष्ट्रव्यापी पहचान बने, क्योंकि भाषा के माध्यम से ही संस्कृति और संस्कार पीढ़ियों तक जीवित रहते हैं। भाषा के लोप से संस्कृति का भी लोप होता है, इसलिए उसका संरक्षण अत्यंत आवश्यक है।

कार्यक्रम का सञ्चालन प्रो हासो ददलानी ने किया और आभार ज्ञापन कुलसचिव कैलाश चन्द्र शर्मा द्वारा किया गया।

सिंधुशोध पीठ द्वारा आयोजित निबंध प्रतियोगिता के निम्न विजेताओं को भी पुरस्कृत किया गया।

उच्च शिक्षा वर्ग में: प्रकाश तेजवानी, मोनिका चौधरी, महिमा सोनी, रिया वालेचा,

स्कूल शिक्षा: आरती, इशिका खटवानी, भव्य करमचंदानी शोध पीठ में संविदा पर नव नियुक्त उपनिदेशक डॉ. लाजवंती छतवानी की नियुक्ति पत्र भी दिया गया।

कार्यक्रम में डॉ मंजू लालवानी, डॉ. बलदेव मटलानी. डॉ. काजल रामचंदानी, डॉ. अशोक मुक्ता, डॉ वंदना रामवाणी, कृष्णा रतनानी, डॉ. कमल गोखलनी, डॉ. अमित रामचंदानी, डॉ. सीपी ददलानी, विजय मंगलानी डॉ. पुष्पा कोडवानी, डॉ. मीना असवानी, मनोज कुमार ने पत्र वाचन किया।

इस अवसर पर सुरेश सिंधी प्रताप पिंजानी, रमेश चेलानी, घनश्याम भगत, प्रो. नरेश धीमान प्रो. प्रवीण माथुर, प्रो. रितु माथुर प्रो. अरविंद परीक, प्रो. मोनिका भटनागर, डॉ. आशीष पारीक, डॉ लारा शर्मा, प्रो सुब्रत दत्ता, प्रो. लक्ष्मी ठाकुर, डॉ विनोद टेकचांदनी, डॉ. ललित सुखीजा, डॉ भारती प्रकाश, दो चंदा केसवानी, डॉ दिलीप रायसिंघानी डॉ दीप्ति रंगनानी सहित विश्वविद्यालय के शिक्षक, अधिकारी कर्मचारी उपस्थित रहे।

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हिन्दुस्थान समाचार / संतोष

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