सन्त जीव को बंधनों से मुक्त कर सतदेश का मार्ग दिखाते हैं : बाबा उमाकांत महाराज
जयपुर, 02 अगस्त (हि.स.)। परम पूज्य परम संत बाबा उमाकान्त जी महाराज ने सत्संग में कहा कि सन्त वही होते हैं, जो सृष्टि के आदि और अन्त का भेद जानते हैं तथा जीवात्माओं को सांसारिक बंधनों से मुक्त कर उनके वास्तविक धाम, सतदेश और प्रभु तक पहुंचाने का मार्ग दिखाते हैं। उन्होंने कहा कि सन्त समागम ईश्वर की कृपा से ही प्राप्त होता है। उन्होंने कहा कि बिन हरि कृपा मिलहीं नहीं संता।
बाबा उमाकान्त महाराज ने कहा कि सन्त इस धरती पर ही मनुष्य रूप में जन्म लेते हैं, जीवन की सभी परिस्थितियों का सामना करते हुए अपना आध्यात्मिक कार्य करते हैं। उनका उद्देश्य जीवात्माओं को अज्ञान, मोह और सांसारिक बंधनों से मुक्त कर प्रभु से मिलाना होता है। उन्होंने कहा कि सन्त ही बताते हैं कि जीव की शुरुआत कहां से हुई और उसका अंतिम लक्ष्य क्या है। उन्होंने प्रवचन में सांसारिक और आध्यात्मिक जीवन का अंतर समझाते हुए कहा कि मनुष्य जीवनभर जिस धन और भौतिक साधनों को जुटाने में लगा रहता है, वे केवल जीवित रहने तक ही उपयोगी होते हैं, जबकि 'आत्मधन' ऐसा धन है जो जीवन में भी काम आता है और मृत्यु के बाद भी साथ रहता है।
उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि पहले लोगों से बेगार कराई जाती थी और बदले में कुछ नहीं दिया जाता था। उसी प्रकार केवल सांसारिक कार्यों में उलझे रहना भी दूसरों के लिए बेगार करने जैसा है। मनुष्य को अपने वास्तविक हित के लिए आत्मधन अर्जित करना चाहिए। बाबा उमाकान्त महाराज ने कहा कि प्राचीन काल में अनेक लोग आत्मधन का संचय करते थे और आध्यात्मिक शक्ति से अनेक कार्य संपन्न करते थे। वर्तमान समय में भी सन्त, महात्मा, साधक और सिद्ध पुरुष इसी आत्मधन को अर्जित कर मानवता के कल्याण का मार्ग प्रशस्त कर रहे हैं। उन्होंने श्रद्धालुओं से सत्संग, साधना और आध्यात्मिक जीवन अपनाकर आत्मकल्याण के मार्ग पर चलने का आह्वान किया।
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हिन्दुस्थान समाचार / दिनेश

