हिन्दू धर्म के सुधारक रहे डॉ. अम्बेडकर
कोटा, 15 अप्रैल (हि.स.)। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, कोटा महानगर द्वारा बाबा साहेब डॉ. भीमराव अम्बेडकर जयंती पर महावीर नगर तृतीय स्थित स्वामी विवेकानंद विद्यालय के श्री रामशांताय सभागार में विचार गोष्ठी का आयोजन किया गया। समारोह में मुख्यवक्ता राजस्थान क्षेत्र के क्षेत्र प्रचारक निम्बाराम रहे और उनके साथ कोटा विभाग संघचालक पन्नालाल शर्मा एवं कोटा महानगर संघचालक गोपाललाल गर्ग मंचासीन रहे। अतिथियों ने संविधान निर्माता भारत रत्न डॉ भीमराव अम्बेडकर के चित्र पर पुष्पांजलि अर्पित की।
मुख्य वक्ता क्षेत्र प्रचारक निम्बाराम ने कहा कि बाबा साहेब कहते थे कि मै ब्राह्मणवाद का विरोधी हूं, ब्राह्मणों का नहीं। कई ब्राह्मण मेरे घनिष्ठ मित्र है। मै कम्युनिस्ट एवं कम्युनिज्म का घोर विरोधी हूँं। उनका कहना था कि संघ प्रमुख गोलवलकर कम्युनिस्ट एवं समाज के बीच एक दीवार हैं। मै कम्युनिस्ट एवं दलितों के बीच एक दीवार बन कर खड़ा हूँ। मै हिन्दू धर्म का सुधारक हूँ। हिन्दू धर्म में संघर्ष स्पर्शता बनाम अस्पर्शता नहीं होना चाहिए। हिन्दुओं का संघर्ष पुरातन और रुड़ीवादी विचारधारा बनाम विकास की विचारधारा होना चाहिए।
क्षेत्र प्रचारक निम्बाराम ने डॉ अम्बेडकर के व्यक्तित्व पर कहा कि उनका बचपन संघर्षपूर्ण रहा। उनके पिता तत्कालीन अंग्रेज सेना में सूबेदार रहे। उनके परिवार में पूर्वज संन्यासी भी हुए हैं। वे 14 भाई बहन थे। उनके बचपन पर उस समय की सामाजिक स्थिति का गहरा प्रभाव पडा। शिक्षा लेने गए वहां भी उनके साथ जो व्यवहार हुआ उससे वह तनिक भी विचलित हुए बिना उस सामाजिक व्यवस्था को परिवर्तन करने के लिए अपने आपको तैयार किया। मैट्रिक परीक्षा पास करने वाले वह पहले महार छात्र थे। उनके एक गुरु कृष्ण केशव अम्बेडकर ने उनकी प्रतिभा को और लगन को देखते हुए उन्हें अपना उपनाम दिया अम्बेडकर। महाराष्ट्र के सतारा में उनके स्कूल शिक्षक थे, जो एक ब्राह्मण थे और वे भीमराव की प्रतिभा से बहुत प्रभावित थे। भीमराव का उपनाम ‘अंबावडेकर‘ से बदलकर अपना उपनाम ‘अम्बेडकर‘ कर दिया था।
बाबा साहेब ने गीता पर कहा था कि गीता को मैंने आदर्श माना हैं। अपने साथ हुए दुर्व्यवहार के कारण उन्होंने कहा था कि मै दुर्भाग्य से हिन्दू के नाम से जन्मा हूँ पर हिन्दू के नाम से मरूँगा नहीं। 1935 में कहे इन वाक्यों की क्रियांवती उन्होंने 1956 में बौद्ध धर्म अपना कर की।
इस विषय में उन्होंने गाँधी को कहा था कि आप चिंता मत कीजिये मै ऐसा कोई काम नहीं करूँगा जिससे हिन्दुओं को शर्मिंदा होना पड़े। इस 21 वर्षों के अन्तराल में कई पादरी एवं मौलवी उनके पास अपने अपने धर्म की विशेषता लेकर आये परन्तु बाबा साहेब ने कभी हिन्दू धर्म को छोडकर अन्य धर्म स्वीकार नहीं किया। अंत में उन्होंने अपने अनुयायियों के साथ 1956 में हिन्दू धर्म की एक शाखा बौद्धधर्म स्वीकार किया।
जब उनके पास संविधान लिखने का प्रस्ताव आया तो हास्य व्यंग्य करते हुए बाबा साहेब कहते है कि हिन्दुओं को जब रामायण लिखवानी थी तो वाल्मीकि के पास गए। जब महाभारत लिखवानी थी तो व्यास के पास गए। आज जब भारत का संविधान लिखवाना है तो मुझ अस्पर्श् के पास आये हैं।
उन्होंने कहा कि बाबा साहेब ही थे जिन्होंने संविधान में संस्कृत को सम्मान दिलाने के लिए कार्य किया। भारत को संविधान देने वाले बाबा साहेब के लिए तत्त्कालीन सरकार ने उनकी स्मृति में पंच तीर्थ का निर्माण करवाया है।
संघ के तृतीय सरसंघ चालक बाला साहब ने अपने घर से अस्पर्श्ता व भेदभाव दूर करने के लिए माता के हाथ का खाना उनकी रसोई में भोजन करवाकर की। उन्होंने कहा कि समाज को बाबा साहेब के जीवन से प्रेरणा लेनी चाहिए कितनी भी कठिन परिस्थिति आये पर अपने कर्तव्य के मार्ग पर आगे बढते रहें।
कार्यक्रम के अंत में महानगर संघ चालक गोपाललाल गर्ग ने सभी आगंतुक बंधुओं एवं विद्याभारती विद्यालय प्रबंधन समिति का आभार व्यक्त किया। डॉ अम्बेडकर के संविधान में दिए गए अभूतपूर्व योगदान के लिए एक संविधान प्रदर्शनी भी लगाई गई।
हिन्दुस्थान समाचार / अरविन्द

