पांडुलिपियों के अध्ययन में कृत्रिम बुद्धिमत्ता की भूमिका पर मंथन

WhatsApp Channel Join Now
पांडुलिपियों के अध्ययन में कृत्रिम बुद्धिमत्ता की भूमिका पर मंथन


बीकानेर, 15 मार्च (हि.स.)। बीकानेर स्थित राजस्थान प्राच्य विद्या प्रतिष्ठान द्वारा आयोजित दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) सम्मेलन का रविवार को समापन हुआ। “पांडुलिपियों एवं ऐतिहासिक दस्तावेजों को पढ़ने में एआई के उपयोग और चुनौतियां” विषय पर आयोजित इस सम्मेलन का उद्देश्य आधुनिक तकनीक के माध्यम से भारत की प्राचीन ज्ञान परंपरा और सांस्कृतिक धरोहर के संरक्षण के नए आयाम तलाशना रहा। सम्मेलन का आयोजन भाषिणी तथा ज्ञान भारतम् के सहयोग से किया गया, जिसमें देश-विदेश के अनेक विद्वानों और विशेषज्ञों ने भाग लेकर अपने शोध और अनुभव साझा किए।

सम्मेलन के समापन सत्र की शुरुआत वैदिक मंत्र “आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतः” के भाव के साथ हुई, जिसका अर्थ है संपूर्ण विश्व से कल्याणकारी और शुभ विचार प्राप्त हों। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में प्रो. विमला डुकवाल, कुलगुरु कोटा कृषि विश्वविद्यालय उपस्थित रहीं। उन्होंने अपने संबोधन में कहा कि भारत की समृद्ध पांडुलिपि परंपरा और ऐतिहासिक दस्तावेजों के संरक्षण के लिए कृत्रिम बुद्धिमत्ता का उपयोग एक अत्यंत महत्वपूर्ण और सार्थक पहल है। उन्होंने कहा कि एआई तकनीक के माध्यम से न केवल प्राचीन पांडुलिपियों को पढ़ना और समझना आसान होगा, बल्कि उन्हें डिजिटल रूप में संरक्षित कर भावी पीढ़ियों तक सुरक्षित पहुंचाया जा सकेगा।

कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि अनंत सिन्हा, निदेशक एशियाटिक सोसायटी ने अपने संबोधन में ‘एआई विद्वनिका’ नामक सॉफ्टवेयर की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि यह सॉफ्टवेयर प्राचीन भारतीय पांडुलिपियों के अध्ययन और अनुवाद में सहायक सिद्ध हो रहा है तथा भविष्य में शोधकर्ताओं के लिए एक महत्वपूर्ण उपकरण बन सकता है।

मुख्य वक्ता के रूप में प्रो. अनिर्बाण दास, निदेशक ज्ञान भारतम् ने कहा कि ज्ञान भारतम् अभियान के अंतर्गत पांडुलिपियों के पठन-पाठन के लिए विशेष एआई मॉडल विकसित किए जा रहे हैं। उन्होंने बताया कि इन मॉडलों को प्रभावी बनाने के लिए भाषा विशेषज्ञों और पारंपरिक विद्वानों की बड़ी भूमिका है।

तकनीकी सत्रों में विभिन्न विशेषज्ञों ने अपने शोध प्रस्तुत किए। डॉ. स्पर्श मित्तल, आईआईटी रुड़की ने बताया कि मशीन लर्निंग तकनीक के माध्यम से मोडी लिपि जैसी प्राचीन लिपियों के विश्लेषण और लिप्यंतरण की प्रक्रिया को अधिक प्रभावी बनाया जा सकता है।

इसी क्रम में नमन गोयल, आयुष मंत्रालय, नई दिल्ली ने “Ayush Grid” और “Yoga Saarthi” जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म के बारे में जानकारी दी। उन्होंने बताया कि एआई आधारित Yoga Pose Detector तकनीक योग अभ्यासों की पहचान कर लगभग 90 प्रतिशत तक सटीक परिणाम दे सकती है।

डॉ. रोहित सलूजा, आईआईटी मंडी ने प्राचीन पांडुलिपियों से पाठ निष्कर्षण से जुड़े अपने शोध प्रस्तुत करते हुए एआई आधारित तकनीकों का प्रदर्शन भी किया। वहीं प्रो. शानदार अहमद, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय ने वैज्ञानिक अनुसंधान में एआई की बढ़ती भूमिका पर प्रकाश डालते हुए बताया कि इसके माध्यम से जटिल संरचनाओं और प्रोटीन विश्लेषण जैसे कठिन कार्य भी संभव हो पाए हैं।

डॉ. विनिता चंद्रा, आईआईटी बीएचयू ने सांस्कृतिक धरोहर के संरक्षण के लिए नैतिक एआई (Ethical AI) के विकास और उपयोग से जुड़े दिशा-निर्देशों पर अपने विचार व्यक्त किए। वहीं महक सेजवाल ने पांडुलिपियों में मौजूद चित्रों और पाठ से एआई की सहायता से जानकारी प्राप्त करने की प्रक्रिया पर विस्तृत व्याख्यान दिया।

इसके अतिरिक्त डॉ. मंगल देव आचार्य, इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र ने भारतीय संस्कृति और ग्रंथों के संरक्षण में एआई की संभावनाओं पर प्रकाश डाला और कहा कि आधुनिक तकनीक के माध्यम से भारत की ज्ञान परंपरा को वैश्विक स्तर पर नई पहचान मिल सकती है।

कार्यक्रम में डॉ. नरेश गोयल, डॉ. वेद अग्रवाल, राजेंद्र कुमार, जयदीप दोगने, अमित जांगिड़, लक्ष्मीनारायण जोशी, भैरों सिंह राजपुरोहित, कीर्तिमान लोढ़ा, डॉ. दिग्विजय सिंह, पूरनचंद आखेचा, डॉ. पूजा मोहता, भरत जाजड़ा, डॉ. मोहम्मद फारूक, सुखाराम तथा महेंद्र जैन सहित अनेक गणमान्यजन उपस्थित रहे।

कार्यक्रम का संचालन गोपाल जोशी ने किया। समापन अवसर पर सभी प्रतिभागियों को सम्मानित किया गया तथा डॉ. नितिन गोयल ने सभी आगंतुकों और सहयोगियों के प्रति आभार व्यक्त किया।

---------------

हिन्दुस्थान समाचार / राजीव

Share this story