संत रविदास के बेगमपुरा से कृत्रिम बुद्धिमत्ता तक, शेखावाटी साहित्य संगम में भविष्य के भारत पर मंथन
सीकर, 11 अक्टूबर (हि.स.)। संत रविदास के समतामूलक समाज की कल्पना से लेकर कृत्रिम बुद्धिमत्ता के दौर में शिक्षा की चुनौतियों तक, इतिहास के नायकों से नेतृत्व की सीख से लेकर साहित्य में भारत की सांस्कृतिक पहचान तक—भविष्य के भारत की दिशा और दशा से जुड़े विभिन्न विषय रविवार को शेखावाटी साहित्य संगम के अंतिम दिन चर्चा के केंद्र में रहे। तीन दिवसीय आयोजन के समापन पर आयोजित चार सत्रों में वक्ताओं ने भारतीय ज्ञान परंपरा, सामाजिक समरसता, तकनीकी बदलाव, ऐतिहासिक चेतना और साहित्य की भूमिका पर विचार साझा किए।
साथ ही चित्रकला, लोकगीत और लोकनृत्य प्रतियोगिताओं के माध्यम से विद्यार्थियों ने विकसित भारत की कल्पना और राजस्थान की सांस्कृतिक विरासत को प्रस्तुत किया।
सालासर रोड स्थित गोविंदम रिसॉर्ट में केशव संस्कृति प्रन्यास और पंडित दीनदयाल उपाध्याय शेखावाटी विश्वविद्यालय के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित साहित्य संगम के अंतिम दिन विचारों और संस्कृति का अनूठा संगम देखने को मिला। अलग-अलग सत्रों में वक्ताओं ने समकालीन चुनौतियों को भारतीय परंपराओं और सामाजिक मूल्यों के संदर्भ में समझने का प्रयास किया।
पहले सत्र ‘संत रविदास की वर्तमान में प्रासंगिकता’ में राजस्थान माध्यमिक शिक्षा बोर्ड, अजमेर के अध्यक्ष हनुमान सिंह राठौड़ ने संत रविदास के सामाजिक चिंतन और उनकी बेगमपुरा की संकल्पना पर विचार रखे। उन्होंने इस कल्पना के माध्यम से ऐसे समाज की अवधारणा को सामने रखा, जिसमें भेदभाव, शोषण और भय के लिए कोई स्थान न हो।
सत्र में सामाजिक समरसता, श्रम की प्रतिष्ठा, कर्मयोग और मानवीय गरिमा जैसे विषयों पर चर्चा हुई। वक्ताओं ने संत रविदास की शिक्षाओं को वर्तमान सामाजिक परिस्थितियों से जोड़ते हुए बताया कि समानता और परस्पर सम्मान पर आधारित समाज के निर्माण में उनके विचार आज भी प्रासंगिक हैं। युवा पीढ़ी को इन मूल्यों से परिचित कराने की आवश्यकता पर भी जोर दिया गया। सत्र का संचालन इंदुशेखर तत्पुरुष ने किया।
दूसरे सत्र ‘ज्ञान की विरासत और तकनीक की रफ्तार’ में उच्च शिक्षा विभाग अजमेर के अतिरिक्त निदेशक प्रो. अनिल दाधीच ने शिक्षा व्यवस्था में हो रहे बदलावों और तकनीक की बढ़ती भूमिका पर चर्चा की। कृत्रिम बुद्धिमत्ता के बढ़ते उपयोग के बीच यह सवाल प्रमुखता से उठा कि जब तकनीक कुछ ही क्षणों में सवालों के जवाब उपलब्ध करा सकती है, तब विद्यार्थियों में स्वतंत्र चिंतन, तार्किक क्षमता और सही-गलत का निर्णय लेने की समझ कैसे विकसित की जाए।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के संदर्भ में शिक्षा को रोजगार और व्यावहारिक कौशल से जोड़ने पर भी विचार-विमर्श हुआ। भारतीय ज्ञान परंपरा के साथ आधुनिक तकनीक, नवाचार और स्टार्टअप के अवसरों को जोड़ने की संभावनाओं पर चर्चा की गई।
‘गुरुकुल से गूगल तक’ विषय के माध्यम से ज्ञान प्राप्त करने के बदलते तरीकों को समझाया गया। साथ ही भारतीय भाषाओं में अध्ययन सामग्री की उपलब्धता, विद्यार्थियों की रुचि के अनुरूप शिक्षा और रोजगार के बदलते स्वरूप के अनुरूप कौशल विकास की जरूरत पर भी विचार रखे गए। सत्र का संचालन अमित झालानी ने किया।
तीसरे सत्र ‘रणभूमि से बोर्डरूम तक : ऐतिहासिक योद्धाओं का नेतृत्व और युवाओं के लिए प्रासंगिकता’ में इतिहास विषय विशेषज्ञ राजवीर सिंह चलकोई ने ऐतिहासिक नायकों के नेतृत्व गुणों और वर्तमान समय में उनकी उपयोगिता पर चर्चा की। उन्होंने कहा कि किसी ऐतिहासिक नायक की सफलता को केवल उसके व्यक्तिगत साहस तक सीमित करके नहीं देखा जा सकता। उसके पीछे समाज का सहयोग, सामूहिक शक्ति, निर्णय लेने की क्षमता और कठिन परिस्थितियों में संघर्ष करने की इच्छाशक्ति भी महत्वपूर्ण होती है। सत्र में रानी पद्मिनी से जुड़ी ऐतिहासिक स्मृतियों के संदर्भ में शौर्य, स्वाभिमान, त्याग और सामूहिक शक्ति जैसे विषयों पर भी चर्चा हुई।
इतिहास के अपेक्षाकृत कम चर्चित नायकों के योगदान को सामने लाने की आवश्यकता भी रेखांकित की गई।
ऐतिहासिक नेतृत्व और आधुनिक प्रबंधन के बीच संबंधों पर चर्चा करते हुए कठिन परिस्थितियों में निर्णय लेने, लोगों को साथ लेकर चलने और सामूहिक उत्तरदायित्व निभाने जैसे गुणों को युवाओं के लिए उपयोगी बताया गया।
इसी सत्र में राजवीर सिंह चलकोई ने राजस्थानी भाषा की मान्यता के सवाल को भाषा के व्यावहारिक उपयोग से जोड़ते हुए अपनी बात रखी।
उन्होंने कहा कि भाषा के अधिकारों की मांग के साथ उसके संरक्षण और दैनिक जीवन में उपयोग की जिम्मेदारी भी समझनी होगी।
उन्होंने सवाल उठाया कि यदि लोग घरों, सार्वजनिक मंचों और दैनिक व्यवहार में अपनी मातृभाषा का उपयोग नहीं करेंगे, तो उसका सम्मान कैसे बढ़ेगा। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 का उल्लेख करते हुए उन्होंने मातृभाषा में शिक्षा के महत्व पर जोर दिया। उनका कहना था कि बच्चे अपनी भाषा में अधिक सहजता से सीख और समझ सकते हैं। राजस्थानी भाषा को मान्यता दिलाने के प्रयासों के साथ उसे घर-परिवार और सामाजिक व्यवहार में अपनाना भी आवश्यक है। सत्र का संचालन दिवस कुमार ने किया।
समापन सत्र ‘साहित्य में भारत’ में महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा की कुलगुरु प्रो. कुमुद शर्मा ने भारतीय साहित्य में राष्ट्रबोध, लोकजीवन और सांस्कृतिक चेतना के विभिन्न पक्षों पर विचार व्यक्त किए।
उन्होंने साहित्य और समाज के संबंधों के संदर्भ में भारतीय साहित्य में लोकजीवन, परंपराओं, सामाजिक अनुभवों और सांस्कृतिक पहचान की अभिव्यक्ति जैसे विषयों पर चर्चा की। भविष्य के भारत के निर्माण में लेखकों, कवियों और विचारकों की भूमिका भी सत्र का प्रमुख विषय रही।
बदलते सामाजिक परिवेश में साहित्य की जिम्मेदारी, नई पीढ़ी का अपनी भाषाओं से जुड़ाव और लोकसंस्कृति तथा साहित्यिक विरासत के संरक्षण की आवश्यकता पर विचार रखे गए। सत्र का संचालन जयपुर की सुनीता ने किया।
साहित्यिक विमर्श के साथ शेखावाटी साहित्य संगम के तीसरे दिन रचनात्मक और सांस्कृतिक गतिविधियों ने भी आकर्षण बढ़ाया।
चित्रकला और पोस्टर प्रतियोगिताओं में विद्यार्थियों ने अपनी कल्पनाशीलता का प्रदर्शन किया। विद्यालय एवं महाविद्यालय स्तर पर आयोजित चित्रकला प्रतियोगिताओं में ‘विकसित भारत 2047’ और ‘शेखावाटी की कला एवं संस्कृति’ विषयों पर चित्र बनाए गए।
वहीं, विद्यालय, महाविद्यालय और खुली श्रेणी में आयोजित सामूहिक लोकगीत एवं लोकनृत्य प्रतियोगिताओं में राजस्थान की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत की झलक देखने को मिली। प्रत्येक समूह को प्रस्तुति के लिए पांच मिनट का समय दिया गया।
प्रतिभागियों ने अपनी प्रस्तुतियों के माध्यम से लोकपरंपराओं, सांस्कृतिक विविधता और क्षेत्रीय पहचान को अभिव्यक्त किया।
तीन दिवसीय शेखावाटी साहित्य संगम के अंतिम दिन संत रविदास के सामाजिक विचारों, कृत्रिम बुद्धिमत्ता के दौर में शिक्षा, इतिहास से नेतृत्व की सीख और साहित्य में भारत की पहचान जैसे विषयों पर चर्चा हुई। आयोजन में साहित्य और संस्कृति के साथ समकालीन सामाजिक तथा तकनीकी चुनौतियों को भी विमर्श का हिस्सा बनाया गया।
चार सत्रों और सांस्कृतिक प्रतियोगिताओं के माध्यम से कार्यक्रम ने भारतीय ज्ञान परंपरा, मातृभाषा, सामाजिक समरसता और सांस्कृतिक विरासत के महत्व को सामने रखा। इसी के साथ सीकर में आयोजित तीन दिवसीय शेखावाटी साहित्य संगम का समापन हुआ।
---------------
हिन्दुस्थान समाचार / रोहित

