अनुसंधान से ऊंटनी के स्वास्थ्य, दुग्ध उत्पादन और ऊंटपालकों की आजीविका को मिल सकेगी नई दिशा : डॉ. पूनिया

WhatsApp Channel Join Now
अनुसंधान से ऊंटनी के स्वास्थ्य, दुग्ध उत्पादन और ऊंटपालकों की आजीविका को मिल सकेगी नई दिशा : डॉ. पूनिया


बीकानेर, 03 सितंबर (हि.स.)। राष्ट्रीय उष्ट्र अनुसंधान केन्द्र (एनआरसीसी) निदेशक डॉ. अनिल कुमार पूनिया ने गुरुवार काे कहा कि थनैला रोग दुधारू पशुओं के स्वास्थ्य, दुग्ध उत्पादन एवं पशुपालकों की आय से जुड़ी महत्वपूर्ण समस्या है तथा इसके उपचार में एंटीबायोटिक के अत्यधिक उपयोग से एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस (एएमआर) की चुनौती बढ़ रही है। केंद्र परिसर में पत्रकाराें से प्रेस कांफ्रेंस में उन्होंने कहा कि स्टेम सेल आधारित यह अनुसंधान एंटीबायोटिक के वैकल्पिक उपचार की संभावनाओं की दिशा में महत्वपूर्ण पहल है। यदि अनुसंधान के माध्यम से भविष्य में थनैला रोग के प्रभावी एवं सुरक्षित वैकल्पिक उपचार की संभावना विकसित होती है, तो इससे ऊंटनी के स्वास्थ्य एवं दुग्ध उत्पादन को बनाए रखने तथा थनैला से होने वाले आर्थिक नुकसान को कम करने में मदद मिल सकेगी। डॉ. पूनिया ने कहा कि ऊंट एक विशिष्ट एवं अनूठा प्राणी है, जिस पर अनुसंधान की व्यापक संभावनाएँ मौजूद हैं। जैसे ऊँटों के सरंक्षण, ऊँट संबद्ध जैव विशिष्टता, बहु आयामी उपयोगिता, “डेजर्ट की डेयरी” के रूप में विकसित करना आदि सम्मिलित है।

परियोजना के प्रधान अन्वेषक एवं केन्द्र के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. रतन कुमार चौधरी ने बताया कि परियोजना के अंतर्गत ऊंट के विभिन्न ऊतकों से मेसेनकाइमल स्टेम सेल्स (MSCs) प्राप्त कर उनकी विशेषताओं का अध्ययन किया जाएगा। प्रयोगशाला एवं प्रायोगिक मॉडल के माध्यम से थनैला रोग में इनके संभावित प्रभावों का मूल्यांकन तथा आगामी चरणों में उपचार की सुरक्षा एवं प्रभावशीलता का प्रीक्लिनिकल अध्ययन किया जाएगा। उन्होंने बताया कि परियोजना का उद्देश्य भविष्य में एंटीबायोटिक-मुक्त एवं सुरक्षित एवं वैकल्पिक उपचार पद्धति विकसित करने की वैज्ञानिक संभावनाओं का पता लगाना है, एक अनुमान के अनुसार भारत में थनैला रोग से प्रतिवर्ष 13 हजार करोड़ का नुकसान होता है, अत: इस महत्वपूर्ण परियोजना की सफलता पर थनैला रोग के कारण होने वाले आर्थिक नुकसान को कम करने में मदद मिल सकेगी। डॉ. रतन चौधरी ने कहा कि यह एक अंतरराष्ट्रीय स्तर से जुड़ा अनुसंधान प्रयास है, जिसके परिणाम भविष्य में व्यापक पशु चिकित्सा उपयोग की संभावनाएँ खोल सकते हैं।

प्रधान वैज्ञानिक डॉ. राकेश रंजन ने बताया कि एनआरसीसी में किए गए अध्ययन के अनुसार ऊंटों में क्लिनिकल थनैला थनैला रोग के कारण दवाओं, पशु चिकित्सा सेवाओं तथा दुग्ध उत्पादन में कमी के रूप में ऊंटपालकों को आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है। अध्ययन के अनुसार एक प्रभावित ऊंट पर औसतन लगभग ₹2,179 वार्षिक आर्थिक भार सामने आया है।

पत्रकारों द्वारा ऊंटों की घटती संख्या एवं उष्ट्रपालन से जुड़े विषयों पर पूछे गए प्रश्नों के उत्तर में बताया गया कि ऊंट के संरक्षण के लिए उसकी उपयोगिता बढ़ाना आवश्यक है, जिसके लिए वैज्ञानिक अनुसंधान एवं मूल्यसंवर्धित उत्पादों के विकास पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है।

प्रेस कॉन्फ्रेंस में अखिल ठुकराल, वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी, डॉ. श्रीशैलम, वैज्ञानिक उपस्थित रहे। कार्यक्रम का संचालन नेमीचंद बारासा, मुख्य तकनीकी अधिकारी द्वारा किया गया।

---------------

हिन्दुस्थान समाचार / राजीव

Share this story