अधर्म के निशांत पर धर्म के दिव्य सूर्योदय से आलोकित हुआ रामलीला प्रांगण

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अधर्म के निशांत पर धर्म के दिव्य सूर्योदय से आलोकित हुआ रामलीला प्रांगण


अधर्म के निशांत पर धर्म के दिव्य सूर्योदय से आलोकित हुआ रामलीला प्रांगण


उदयपुर, 18 अक्टूबर (हि.स.)। झीलों के शहर में सूरजपोल स्थित निम्बार्क महाविद्यालय के रामलीला प्रांगण में पिछले दस दिनों से प्रवाहित हो रही भक्ति, मर्यादा और सनातन चेतना की पावन धारा का रविवार को अत्यंत भावपूर्ण और भव्य वातावरण में समापन हुआ। श्रीराम लीला समिति के तत्वावधान में 9 अक्टूबर से आयोजित इस दस दिवसीय पारम्परिक रामलीला के अंतिम दिन बुराई के प्रतीक लंकापति रावण के संहार और मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम के अलौकिक राज्याभिषेक के साथ समूचा प्रांगण 'जय सियाराम' के गगनभेदी उद्घोष से गुंजायमान हो उठा।

समापन दिवस के मंचन का आरंभ युद्ध कांड के उन निर्णायक क्षणों से हुआ, जहां आसुरी शक्ति और अहंकार का धर्म के समक्ष पराभव निश्चित था। विशालकाय कुंभकरण और मायावी मेघनाद के वध के बाद रणभूमि में राम और रावण का महासंग्राम जीवंत हो उठा। जैसे ही प्रभु श्रीराम के बाण ने लंकाधिपति के नाभि स्थित अमृत कुंड को सुखाया, दस शीश वाला अहंकारी अधर्म का प्रतीक धराशायी हो गया। मंचन के इस दृश्य ने मानस की चौपाई, 'जस जस प्रभु सायक सर संधा। तस तस दसानन सिर कटि बंधा॥ कटे सीस पुनि भए नवीन। प्रभु लीला नहिं जान प्रबीन॥' को साक्षात चरितार्थ कर दिया। दशानन रावण के मोक्ष पाते ही उपस्थित श्रद्धालु भाव-विभोर हो उठे और संपूर्ण वातावरण धर्म-विजय के जयकारों से आलोकित हो गया।

मंचन का सबसे प्रभावी और आध्यात्मिक क्षण तब आया जब भगवान श्रीराम ने लक्ष्मण को महाज्ञानी, प्रकांड पंडित और राजनीति के धुरंधर रावण के चरणों में बैठकर ज्ञान लेने भेजा। सिरहाने खड़े अनुज लक्ष्मण को प्रभु राम द्वारा यह समझाना कि ज्ञान कभी अहंकार से नहीं, अपितु चरणों में झुककर ही अर्जित किया जाता है, दर्शकों के अंतर्मन को छू गया।

इसके बाद जब भ्राता लक्ष्मण ने महाज्ञानी रावण के चरणों की तरफ खड़े रहकर प्रणाम किया तब अंतिम सांसें गिनते लंकापति रावण ने लक्ष्मण को राजनीति और आचार-विचार की तीन त्रिकालदर्शी सीखें दीं। रावण ने पहली सीख शुभस्य शीघ्रम की दी। रावण ने कहा कि शुभ कार्य में कभी विलंब नहीं करना चाहिए और अशुभ या अनैतिक विचार को जितना हो सके टालते रहना चाहिए। दूसरी सीख में रावण ने समझाया कि शत्रु को कभी दुर्बल नहीं समझना चाहिए। रावण ने कहा कि अपने सारथी, द्वारपाल, भाई अथवा सामान्य वानर-भालुओं को कभी हीन समझने की भूल मत करना। यही अहंकार रावण के विनाश का मूल कारण बना। तीसरी सीख में रावण ने रहस्य का गोपनीयता चक्र समझाया। रावण ने कहा कि जीवन के मर्म और गुप्त भेद कभी किसी ऐसे के सम्मुख उजागर नहीं करने चाहिए जो कालान्तर में विभीषण सिद्ध हो। प्रचंड विद्वता के बावजूद मर्यादा और धर्म विहीन होने पर व्यक्ति का क्या हश्र होता है, रावण के इन अंतिम वचनों ने संपूर्ण सभा को निःशब्द और विचारमग्न कर दिया।

रावण मुक्ति के पश्चात माता सीता की अग्निपरीक्षा और पुष्पक विमान द्वारा प्रभु श्रीराम, माता जानकी, भ्राता लक्ष्मण और भक्त हनुमान के अवध आगमन के दृश्य ने दर्शकों को आनंद-सिंधु में सराबोर कर दिया। चौदह वर्ष के वनवास और अधर्म के अंधकार को समाप्त कर जैसे ही गुरु वशिष्ठ द्वारा प्रभु श्रीराम का राज्याभिषेक संपन्न हुआ, मंच से लेकर प्रांगण तक फूलों की वर्षा होने लगी। चहुंओर आरती की दिव्य ज्योति और शंख-घड़ियाल के नाद ने उदयपुर की धरा को साक्षात साकेत धाम (अयोध्या) में परिवर्तित कर दिया। शंख-घड़ियाल और आरती की पावन ज्योतियों के बीच प्रांगण में मानस के उत्तरकांड की अमर चौपाई गूंज उठी, “दैहिक दैविक भौतिक तापा। राम राज नहिं काहुहि ब्यापा॥ सब नर करहिं परस्पर प्रीती। चलहिं स्वधर्म निरत श्रुति नीती॥”

समापन अवसर पर श्रीरामलीला समिति के अध्यक्ष धर्मनारायण जोशी ने कहा कि राम का चरित्र केवल एक कथा नहीं, अपितु जीवन जीने की आचार संहिता है। दस दिनों तक चला यह अनुष्ठान केवल अभिनय नहीं, बल्कि जनमानस में सत्य, मर्यादा और धर्म की पुनर्प्रतिष्ठा का संकल्प रहा।

समिति के महासचिव भंवरलाल शर्मा ने बताया कि रविवार को अतिथियों में संत गुलाबदास महाराज (माकड़ादेव), पूर्व नगर नियोजक बी.एस. कानावत, राजस्थान सरकार के अतिरिक्त महाधिवक्ता प्रवीण खंडेलवाल, कांग्रेस के शहर जिलाध्यक्ष फतहसिंह राठौड़, रक्तदान क्षेत्र के रिकॉर्डधारी रवीन्द्रपाल सिंह कप्पू, औदीच्य समाज के अध्यक्ष मोहन औदीच्य, पार्षद महेशपुरी गोस्वामी, पूर्व पार्षद घनश्याम चावला, जगदीश मेनारिया, सिद्धार्थ शर्मा, बोहरा गणेश मंदिर के पुजारी गोपीलाल जोशी, शिशु भारती संस्थान के निदेशक जितेश श्रीमाली, शहीद मुस्तफा की माताजी श्रीमती फातिमा बोहरा, पिताजी जकीउद्दीन बोहरा, समाजसेवी नारायण मेघवाल, श्यामसुंदर मोड़, रामचंद्र जोशी (नाथद्वारा), जगदीश जोशी, नंदकिशोर जोशी (इंदौर), सहस्त्र औदीच्य समाज उदयपुर की अध्यक्ष इन्द्रा शर्मा शामिल रहे। अतिथियों का सम्मान अध्यक्ष धर्मनारायण जोशी, डॉ. विजय विप्लवी, समन्वयक अशोक बाबेल, हरीश मारवाड़ा, प्रवक्ता कौशल मूंदड़ा, कमल कुमावत, चेतन माली, राकेश पालीवाल, चैनशंकर दशोरा, धरणीधर तिवारी, जगन्नाथ शर्मा, निर्मल चौबीसा, दीपक डांगी, एडवोकेट दिनेश गुप्ता, गोपाल कनेरिया ने किया।इस अवसर पर विशिष्ट अतिथि झाड़ोल माकड़ादेव आश्रम के महंत गुलाबदास महाराज ने कहा कि हमारे ग्रन्थ रामायण, गीता, वेद, उपनिषद सिर्फ प्रदर्शन के लिए नहीं, अपितु जीवन दर्शन के लिए है। हमारा सनातन दर्शन किसी की जान लेने का नहीं, बल्कि सर्वे भवन्तु सुखिन: के संकल्प वाला है। उन्होंने कहा कि विषम परिस्थितियों में स्मित मत्छार ने हनुमान चालीसा पढ़ते हुए सभी को बचाने का साहस दिखाया। उन्होंने उपस्थित माताओं—बहनों से बच्चों को हनुमान चालीसा कंठस्थ कराने और उसके निहितार्थ को समझाने का आह्वान किया। रामलीला संयोजक डॉ. विजय प्रकाश विप्लवी ने बताया कि 20 अक्टूबर को विजयदशमी के पावन पर्व पर सेक्टर-14 में भव्य रावण दहन का कार्यक्रम होगा। सायंकाल होने वाले इस आयोजन में पश्चिमी क्षेत्र सांस्कृतिक केन्द्र के कलाकार विविध प्रस्तुतियां देंगे।

हिन्दुस्थान समाचार / सुनीता

Livevns.news Desk
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