गाजर घास से स्वास्थ्य, पर्यावरण व खेती पर पड़ने वाले प्रतिकूल प्रभावों की जानकारी दी

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गाजर घास से स्वास्थ्य, पर्यावरण व खेती पर पड़ने वाले प्रतिकूल प्रभावों की जानकारी दी


बीकानेर, 19 अगस्त (हि.स.)। खरपतवार-गाजर घास के प्रतिकूल प्रभावों व प्रबंधन की जानकारी हेतु कृषि अनुसंधान केन्द्र बीकानेर में बुधवार को जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किया गया। कार्यक्रम में किसानों विद्यार्थियों को गाजर घास से स्वास्थ्य, पर्यावरण व खेती पर पड़ने वाले प्रतिकूल प्रभावों की जानकारी दी गई।

केन्द्र के वैज्ञानिक डॉ शीश पाल सिंह सिंह ने बताया कि पार्थेनियम हिस्टेरोफोरस या गाजर घास एक आक्रामक खरपतवार है, जो फसलों और स्थानीय जैव विविधता को प्रभावित करने के साथ मानव एवं पशु स्वास्थ्य के लिए भी परेशानी का कारण बन सकता है।

डॉ रूपेश मीना ने गाजर घास में पाए जाने वाले विषाक्त पदार्थों व उनके प्रभाव के बारे में बताया।

डॉ. बी.डी.एस. नाथावत ने गाजर घास को विभिन्न बीमारियों से जुड़े रोगाणुओं एवं कीट-पतंगों के लिए आश्रय स्थल बताते हुए इसके समयबद्ध नियंत्रण पर जोर दिया।

डॉ. ब्रिज सिंह मीना ने गाजर घास के नियंत्रण की विभिन्न विधियों की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि इसके प्रबंधन के लिए यांत्रिक, रासायनिक और जैविक उपायों को परिस्थितियों के अनुसार अपनाया जा सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार गाजर घास के नियंत्रण में समय पर उखाड़ने, जैव नियंत्रण तथा समेकित खरपतवार प्रबंधन महत्वपूर्ण हैं।

डॉ भूपेंद्र सिंह ने कहा कि फूल एवं बीज बनने से पहले ही नियंत्रित कर गाजर घास को समूल नष्ट करने के प्रयास किए जाएं, ताकि इसके बीजों के प्रसार को रोका जा सके।

कार्यक्रम के समापन पर कृषि महाविद्यालय के विद्यार्थियों ने जागरूकता रैली निकाली। विद्यार्थियों ने “गाजर घास भगाओ—पर्यावरण बचाओ” और “गाजर घास भगाओ—कृषि बचाओ” जैसे नारों के माध्यम से आमजन एवं किसानों को इस आक्रामक खरपतवार के नियंत्रण के लिए जागरूक किया।

गौरतलब है कि 16 से 22 अगस्त तक पार्थेनियम हिस्टेरोफोरस जागरूकता सप्ताह के दौरान देशभर में जागरूकता रैलियों, व्याख्यानों, उन्मूलन अभियानों और किसान संवाद जैसी गतिविधियों के माध्यम से गाजर घास के दुष्प्रभाव एवं प्रबंधन के प्रति जन-जागरूकता बढ़ाई जाती है।

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हिन्दुस्थान समाचार / राजीव

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