गज पर सवार होकर आएंगी मां भगवती: 11 अक्टूबर से शुरू होंगे शारदीय नवरात्रि

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गज पर सवार होकर आएंगी मां भगवती: 11 अक्टूबर से शुरू होंगे शारदीय नवरात्रि


जयपुर, 07 अक्टूबर (हि.स.)। शक्ति आराधना का पर्व शारदीय नवरात्रि इस बार 11 अक्टूबर रविवार से शुरू होगा। नवरात्रि के पहले दिन घर-घर घट स्थापना के साथ नौ दिवसीय शक्ति साधना का संकल्प लिया जाएगा। धार्मिक मान्यता के अनुसार इस बार मां भगवती का आगमन गज पर होगा, जिसे धन-धान्य, सुख-समृद्धि और वैभव का प्रतीक माना जाता है। ज्योतिषीय दृष्टि से इस बार शुक्र तारा अस्त होने के कारण विवाह और नए कारोबार के शुभारंभ को लेकर भी विशेष सावधानी बरतने की सलाह दी गई है।

पंडित राजेश कुमार शर्मा ने बताया कि 11 अक्टूबर को सूर्योदय से दोपहर साढ़े 12 बजे तक सर्वसाधारण के लिए घट स्थापना की जा सकती है। इसके लिए घर के मंदिर में चौकी स्थापित कर उस पर लाल वस्त्र बिछाएं। इसके बाद गौरी-गणेश, सूर्य, नवग्रह और पंचदेव का पूजन कर कुलदेवी का आह्वान एवं स्थापना करें। विधि-विधान से कलश और जौ स्थापित कर नौ दिनों तक मां दुर्गा की आराधना की जाती है।

नवरात्रि के नौ दिनों में मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा की जाती है। इनमें शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कूष्मांडा, स्कंदमाता और कात्यायनी सहित नवदुर्गा के विभिन्न स्वरूप शामिल हैं।

पंडित शर्मा के अनुसार इस बार भगवती के गज पर सवार होकर आने की धार्मिक मान्यता है। गज को धन-धान्य और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। ऐसे में श्रद्धालु नवरात्रि के दौरान मां दुर्गा की आराधना कर परिवार में सुख-शांति और समृद्धि की कामना कर सकते हैं।

उन्होंने कहा कि नवरात्र केवल पूजा-पाठ का पर्व नहीं है, बल्कि साधना के दौरान आचरण की शुद्धता का भी विशेष महत्व है। श्रद्धालुओं को अखाद्य वस्तुओं के सेवन से बचना चाहिए और सात्विक भोजन तथा सात्विक भाव के साथ देवी की आराधना करनी चाहिए।

पंडित शर्मा ने बताया कि वर्तमान में शुक्र तारा अस्त है। ज्योतिषीय मान्यता में शुक्र को दांपत्य सुख, विवाह और व्यापार से संबंधित ग्रह माना जाता है। शुक्र तुला राशि में होने के कारण व्यापार के क्षेत्र में कई लोगों को लाभ मिलने की संभावना बताई गई है, लेकिन नए प्रतिष्ठान या कारोबार का शुभारंभ करने के लिए कुछ समय रुकना बेहतर रहेगा। ऐसे लोग कार्तिक मास में शुभ मुहूर्त देखकर नए कारोबार का उद्घाटन कर सकते हैं।उन्होंने स्पष्ट किया कि शुक्र अस्त होने को लेकर किसी प्रकार का भय रखने की आवश्यकता नहीं है। ग्रह व्यक्ति के कर्मों के अनुसार फल देते हैं और शुक्र अस्त होना किसी अनहोनी या दुर्घटना का संकेत नहीं माना जाना चाहिए।

विवाह को लेकर पंडित शर्मा ने बताया कि धार्मिक मान्यता के अनुसार देवउठनी एकादशी के बाद विवाह के शुभ मुहूर्त शुरू होते हैं। विवाह के लिए गुरु, चंद्रमा, सूर्य सहित अन्य ग्रहों की स्थिति देखी जाती है। शुक्र को दांपत्य सुख का कारक माना जाता है, इसलिए विवाह के लिए इसकी स्थिति का भी विशेष महत्व रहता है। ऐसे में विवाह की तैयारी कर रहे लोगों को देवउठनी एकादशी तक इंतजार करने की सलाह दी गई है।

शुक्र से जुड़े ज्योतिषीय उपायों के बारे में उन्होंने बताया कि शुक्रवार को माता लक्ष्मी को खीर का भोग लगाने, भगवान श्रीकृष्ण को मिश्री-माखन अर्पित करने तथा सवा किलो चावल या किसी सफेद वस्तु का दान करने से लाभ की धार्मिक मान्यता है। उन्होंने बताया कि विजयदशमी बुराई पर अच्छाई की जीत का पर्व है। धार्मिक मान्यता के अनुसार इसी दिन भगवान श्रीराम ने रावण का वध किया था। विजयदशमी पर कई शुभ कार्य किए जा सकते हैं, लेकिन विवाह की अनुमति नहीं होती। धार्मिक परंपरा के अनुसार इस अवधि में देव शयन अवस्था में रहते हैं और देवउठनी एकादशी के बाद ही विवाह के शुभ मुहूर्त शुरू होते हैं।

पंडित शर्मा ने कहा कि नवरात्र शक्ति आराधना का विशेष पर्व है। श्रद्धालुओं को शुक्र तारा अस्त होने जैसी ज्योतिषीय स्थिति को लेकर चिंतित होने के बजाय श्रद्धा और विश्वास के साथ कुलदेवी तथा मां दुर्गा की पूजा करनी चाहिए। धार्मिक मान्यता के अनुसार देवी की आराधना से जीवन के विभिन्न दोषों और बाधाओं से मुक्ति मिलती है।

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हिन्दुस्थान समाचार / दिनेश

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