ज्ञात का कथन करना ही अनुवाद: प्रो. चारण
जोधपुर, 21 मई (हि.स.)। भारतीय ज्ञान परम्परा में अनुवाद की परम्परा बहुत समृद्ध एवं प्राचीन है। प्रत्येक भाषा की अपनी एक संस्कृति होती है। अनुवाद शब्द का नहीं बल्कि उस भाषा मे समाहित सांस्कृतिक तत्व को होता है इसलिए अनुवादक का कर्तव्य है कि वो भाषा की सांस्कृतिक सुन्दरता को सदैव बनाये रखे। यह विचार ख्यातनाम कवि-आलोचक प्रोफेसर (डॉ.) अर्जुनदेव चारण ने साहित्य अकादमी एवं जेएनवीयू के राजस्थानी विभाग द्वारा गुरुवार को आयोजित तीन दिवसीय राष्ट्रीय डोगरी-राजस्थानी अनुवाद कार्यशाला के उदघाटन सत्र मे बतौर अध्यक्षीय उद्बोधन में व्यक्त किये। उन्होंने कहा कि ज्ञात का कथन करना ही अनुवाद है।
राजस्थानी विभागाध्यक्ष एवं अनुवाद कार्यशाला के संयोजक गजेसिंह राजपुरोहित ने बताया कि इस अवसर मुख्य अतिथि जय नारायण व्यास विश्वविद्यालय के कुलगुरू प्रोफेसर (डॉ.) पवन कुमार शर्मा ने कहा कि भाषा मनुष्य के मन की अनेकानेक विविध भावनाओं को व्यक्त करने का माध्यम है लेकिन जो बात अपनी मातृभाषा के मार्फत जितनी सुन्दरता एवं सटीकता से व्यक्त की जा सकती है वो किसी भी अन्य सीखी हुई भाषा में संभव नहीं है। डोगरी भाषा के ख्यातनाम कवि-आलोचक पद्मश्री डॉ.मोहनसिंह ने बतौर मुख्य वक्ता डोगरी एवं राजस्थानी भाषा के संबंधो को विस्तार से उजागर करते हुए कहा कि इनका सांस्कृतिक संबंध अद्भुत है।
कार्यशाला संयोजक गजेसिंह राजपुरोहित ने तीन दिवसीय राष्ट्रीय डोगरी-राजस्थानी अनुवाद कार्यशाला की विगतवार जानकारी देते हुए साहित्य अकादमी के सहयोग एवं विश्वास के प्रति आभार जताया। ज्ञातव्य है कि अनुवाद कार्यशाला में डोगरी रचनाकार सरिता खजूरिया, सुषमा रानी राजपूत, राजस्थानी रचनाकार मधु आचार्य, प्रकाशदान चारण, नंदू राजस्थानी, सूर्यकरण सरोज एवं गजेसिंह राजपुरोहित सहभागिता निभा रहे है। कार्यक्रम में राजस्थानी के युवा रचनाकार डॉ. स्वरूपसिंह भाटी रचित राजस्थानी कृति सायांजी झूलां: व्यक्तित्व अर कृत्तित्व का अतिथियों द्वारा लोकार्पण किया गया। उद्घाटन सत्र का संचालन गजेसिंह राजपुरोहित ने किया।
हिन्दुस्थान समाचार / सतीश

