स्त्री ऋषियों ने रची हैं वेदों की कई ऋचाएं -मेवाड़ फेस्ट

स्त्री ऋषियों ने रची हैं वेदों की कई ऋचाएं -मेवाड़ फेस्ट
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स्त्री ऋषियों ने रची हैं वेदों की कई ऋचाएं -मेवाड़ फेस्ट


उदयपुर, 31 मार्च (हि. स.)। वेद की हर ऋचा को रचनेवाले ऋषि का नाम उसमें दर्ज है और ऋषि एक-दो नहीं पच्चीसों हैं, जिनमें दर्जनों नारियां है। वेदों की रचना में स्त्रियों की महत्वपूर्ण भूमिका है, यह स्त्री ऋषियों की ऋचाओं को पढ़कर जाना जा सकता है।

यह संवाद उदयपुर में चल रहे मेवाड़ टॉक फेस्ट के दूसरे और अंतिम दिन ‘बंगाल 1947’ फिल्म की स्क्रीनिंग के दौरान फ़िल्म के कथानक में सामने आया। इसके बाद यह चर्चा का विषय बना और स्क्रीनिंग के दौरान फ़िल्म निर्माताओं ने इस पर वृहद अध्ययन की आवश्यकता बताई।

फिल्म में यह भी बताया गया कि यदि प्राचीन काल में छुआछूत या जातिभेद होता तो प्रभु श्रीराम शबरी के झूठे बेर नहीं खाते। इसी प्रकार एक संवाद में यह भी बताया गया कि शंकराचार्य और मंडन मिश्र के बीच हुए शास्त्रार्थ की न्यायाधीश स्वयं मंडन मिश्र की पत्नी उभय भारती थीं, जो प्राचीन काल में महिलाओं में उच्च शिक्षा का साक्षात प्रमाण है।

दर्शकों ने लेखक-निर्देशक आकाशादित्य लामा व अभिनेता अंकुर अरवम के साथ संवाद किया और फिल्म की विषयवस्तु और निर्माण के बारे में प्रश्न पूछे। आयोजकों की तरफ से दोनों का अभिनंदन किया गया। इस मौके पर फेस्ट के संरक्षक मदन मोहन टांक, राजेन्द्र ललवानी, विनय कटारिया, श्रद्धा मुर्डिया, डॉ. कमलेश शर्मा, विकास छाजेड़, रुचि श्रीमाली, संदीप राठौड़, आरजे समय, कुलदीप राव, दीपक शर्मा, नरेश कुमार यादव, हेमंत जोशी, डॉ. सुनील खटीक, दर्शन कोटिया, कनन राठौड, ऐश्वर्या, जयराज सोलंकी सहित बड़ी संख्या में प्रबुद्धजन और युवा मौजूद थे।

फिल्म के लेखक व निर्देशक आकाशादित्य लामा ने बताया कि यह फिल्म बंगाल के ऐतिहासिक विभाजन के दौर में एक प्रेम कहानी पर आधारित है। उन्होंने बताया कि पिछले साल शूटिंग के दौरान यह फ़िल्म ‘शबरी का मोहन‘ का नाम से बनाई जा रही थी, लेकिन फिल्म की विषयवस्तु को देखते हुए इसका नाम बदल कर ‘बंगाल-1947‘ रखा गया। उन्होंने बताया कि अखिल भारतीय रिलीज से पहले प्रतिष्ठित बंगाल इंटरनेशनल फ़िल्म फेस्टिवल कोलकाता के लिए उनकी फिल्म का चयन होना उनके और उनकी पूरी टीम के लिए खुशी और गर्व का एक मौका है।

उन्होंने बताया कि ‘बंगाल 1947’ के प्रोड्यूसर सतीश पांडे एवं ऋषभ पांडे हैं। यह फिल्म बंगाल विभाजन के दर्द एवं बंग समुदाय के रहन-सहन, वेशभूषा और रीति रिवाजों के साथ बनाई गई है। जिसकी शूटिंग बस्तर की सुंदर वादियों में चित्रकूट, कांगेर घाटी जगदलपुर एवं परलकोट क्षेत्र के प्राकृतिक दृश्यों के बीच की गई है। वहीं बस्तर क्षेत्र के कई बंग बाहुल्य गांव, इंदिरा कला संगीत विश्विद्यालय, खैरागढ़ महल, कवर्धा, छुईखड़ान और गंडई में भी इस फ़िल्म क़ी शूटिंग हुई है। इस फ़िल्म में छत्तीसगढ़ से ओंकारदास मानिकपुरी उर्फ नत्था, ‘बचपन का प्यार’ गीत से सोशल मीडिया में चर्चित हुए सहदेव दिरदो, रायगढ़ के स्थापित कलाकार डॉ. योगेंद्र चौबे के अलावा अंकुर अरवम, सुरभि श्रीवास्तव, डॉ अनिल रस्तोगी आदित्य लाखिया, विक्रम सहित कई प्रमुख कलाकारों ने विविध और चुनौतीपूर्ण भूमिकाएं निभाई है।

हिन्दुस्थान समाचार/सुनीता/ईश्वर

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