पांडुलिपि करती हैं हमारे पुरातन ज्ञान को नवीन ज्ञान से जोड़ने के सेतु के रूप में कार्य

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पांडुलिपि करती हैं हमारे पुरातन ज्ञान को नवीन ज्ञान से जोड़ने के सेतु के रूप में कार्य


जयपुर, 13 अप्रैल (हि.स.)। संस्कृति मंत्रालय, ज्ञान भारतम् मिशन भारत सरकार से संबद्ध क्लस्टर केन्द्र विश्वगुरुदीप आश्रम शोध संस्थान, जयपुर एवं पण्डित मोतीलाल जोशी प्राच्य विद्या अनुसंधान केन्द्र, शाहपुरा बाग के संयुक्त तत्त्वावधान में 21 दिवसीय (120 घण्टे) लिपि प्रशिक्षण कार्यशाला का शुभारंभ महामंडलेश्वर स्वामी ज्ञानेश्वर पुरी जी महाराज ( उपाध्यक्ष एवं समन्वयक - विश्वगुरुदीप आश्रम शोध संस्थान ) के सान्निध्य में साेमवार को राजस्थान शिक्षक प्रशिक्षण विद्यापीठ, शाहपुरा बाग, जयपुर में किया गया।

कार्यशाला के उद्घाटन सत्र का शुभारंभ दीप प्रज्वलन एवं अतिथियों के माल्यार्पण एवं स्वागत के साथ किया गया। कार्यक्रम के अंतर्गत संस्था सचिव डॉ राजकुमार जोशी जी ने अपने स्वागत संबोधन में पांडुलिपियों के महत्व को समझाते हुए भावी शोध कार्य हेतु इनके संरक्षण एवं संवर्धन को आवश्यक बताया। इसी श्रृंखला में जयप्रकाश शर्मा (लिपि एवं पाण्डुलिपि विशेषज्ञ ) ने इस कार्यशाला की आगामी रूपरेखा प्रस्तुत करते हुए बताया कि लिपि प्रशिक्षण की यह कार्यशाला न केवल शैक्षिक दृष्टि से अपितु व्यावहारिक दृष्टि से भी अत्यंत आवश्यक हैं। पांडुलिपि हमारे पुरातन ज्ञान को नवीन ज्ञान से जोड़ने के सेतु के रूप में कार्य करती हैं ।उन्होंने ये भी बताया कि पांडुलिपियों का अध्ययन करने की सही विधि क्या है और उसे किस प्रकार से उपयोग करना चाहिए। उन्होंने ये भी बताया कि गत 1 माह में ही राजस्थान में लगभग 13 लाख पांडुलिपियों का सर्वे हो चुका हैं।

इस अवसर पर संस्था सचिव डॉ राजकुमार जोशी एवं विद्यापीठ प्राचार्य डॉ मनीषा शर्मा एवं विभागाध्यक्षा डॉ सुभद्रा जोशी का भी विश्वगुरुदीप आश्रम शोध संस्थान, जयपुर की तरफ से सर्टिफिकेट एवं पुस्तक प्रदान कर सम्मान भी किया गया। इस अवसर पर डॉ संतोष शर्मा (प्रवक्ता,राधागोविंद राजकीय महाविद्यालय,कंवर नगर)ने अपने अतिथि संबोधन में इस कार्यशाला का शैक्षिक महत्व स्पष्ट करते हुए वर्तमान परिप्रेक्ष्य में इसे भारतीय ज्ञान परम्परा का एक महत्वपूर्ण भाग बताया। कार्यक्रम की अंतिम कड़ी में विद्यापीठ प्राचार्य डॉ मनीषा शर्मा ने अपने धन्यवाद ज्ञापन में कार्यशाला की सराहना करते हुए इसे ज्ञान पथ का एक प्राथमिक कदम बताया। उन्होंने ये भी बताया कि पांडुलिपिया के माध्यम से हमारे समृद्ध प्राचीन ज्ञान को पुनः प्रतिष्ठित किया जा सकता हैं। अतः पांडुलिपियों का संरक्षण एवं संवर्धन वर्तमान की आवश्यकता हैं ताकि हमारा देश पुनः विश्वगुरु के रूप में अपनी पहचान बना सके। कार्यशाला के उद्घाटन सत्र में 98 प्रशिक्षणार्थियों ने ज्ञान भारतम् के सर्वे एप को डाउनलोड कराकर उनको प्रशिक्षित किया। जिससे ये अपने आस पास व सुदूर अंचलों में पाण्डुलिपियों की जानकारी एप के माध्यम से ज्ञान भारतम् तक पहुंचा सके।

कार्यक्रम के अंतर्गत मंच संचालन डॉ कविता भारद्वाज द्वारा किया गया। कार्यक्रम का समापन राष्ट्रगान के साथ किया गया।

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हिन्दुस्थान समाचार / राजीव

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