शिक्षा को ज्ञान, संस्कार एवं सामाजिक सरोकार से जोड़ें : हनुमान सिंह राठौड़
अजमेर, 07 अगस्त(हि.स.)। महर्षि दयानंद सरस्वती विश्वविद्यालय, अजमेर का 39वें स्थापना दिवस समारोह के अंतर्गत सात दिनों तक चले विविध शैक्षणिक, सांस्कृतिक एवं वैचारिक आयोजनों का समापन शुक्रवार को स्वराज सभागार में आयोजित गरिमामय समारोह के साथ हुआ, जिसमें राजस्थान माध्यमिक शिक्षा बोर्ड के अध्यक्ष एवं प्रख्यात चिंतक हनुमान सिंह राठौड़ मुख्य अतिथि एवं मुख्य वक्ता तथा कुलगुरु प्रो. सुरेश कुमार अग्रवाल अध्यक्ष के रूप में उपस्थित रहे।
मुख्य अतिथि हनुमान सिंह राठौड़ ने भारतीय शिक्षा दर्शन की मूल आत्मा को रेखांकित करते हुए कहा कि किसी भी समाज की वास्तविक प्रगति केवल तकनीकी उपलब्धियों या आर्थिक विकास से नहीं, बल्कि उसके नागरिकों के चरित्र, अनुशासन और सांस्कृतिक चेतना से मापी जाती है। उन्होंने भारतीय ज्ञान परंपरा के अनेक उदाहरणों के माध्यम से स्पष्ट किया कि भारत ने विश्व को केवल ज्ञान नहीं दिया, बल्कि ऐसा जीवन-दर्शन दिया जिसमें सह-अस्तित्व, नैतिकता, आत्मसंयम, संवाद और लोककल्याण सर्वोच्च मूल्य रहे हैं। उन्होंने युवाओं के समक्ष उपस्थित वैचारिक चुनौतियों, डिजिटल युग के प्रभाव, सामाजिक संवाद की कमी तथा बदलते पारिवारिक परिवेश पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार उपलब्ध कराना नहीं, बल्कि उत्तरदायी, संवेदनशील और चरित्रवान नागरिक तैयार करना है। उन्होंने कहा कि भारतीय परंपरा में शिक्षा का अर्थ मनुष्य के भीतर निहित श्रेष्ठता का विकास है। यदि शिक्षा से विनम्रता, अनुशासन, सामाजिक उत्तरदायित्व और नैतिक विवेक विकसित नहीं होता तो उसका उद्देश्य अधूरा रह जाता है। उन्होंने विशेष रूप से शिक्षकों से आग्रह किया कि वे पाठ्यक्रम तक सीमित न रहें, बल्कि विद्यार्थियों के साथ सतत संवाद स्थापित करें, क्योंकि आज की सबसे बड़ी चुनौती ज्ञान का अभाव नहीं, बल्कि संवादहीनता है। उनका मत था कि परिवार, विद्यालय और विश्वविद्यालय यदि संवाद की संस्कृति विकसित करें तो अनेक सामाजिक और वैचारिक विकृतियों को प्रारम्भिक स्तर पर ही रोका जा सकता है।
समारोह की अध्यक्षता करते हुए कुलगुरु प्रो. सुरेश कुमार अग्रवाल ने स्थापना दिवस को मात्र 39 वर्षों की कालगणना नहीं, बल्कि विश्वविद्यालय की सामूहिक चेतना, आत्ममंथन और भविष्य के संकल्प का उत्सव बताया। उन्होंने कहा कि पिछले सात दिनों की पूरी यात्रा अंधकार से प्रकाश, सामान्यता से उत्कृष्टता, औपचारिकता से सृजनशीलता और संभावनाओं से उपलब्धियों की ओर अग्रसर होने की यात्रा रही। उनका कहना था कि किसी विश्वविद्यालय का वास्तविक निर्माण केवल भवनों और संसाधनों से नहीं होता, बल्कि उसकी कार्यसंस्कृति, मूल्य-व्यवस्था और सामूहिक दायित्वबोध से होता है। प्रो.अग्रवाल ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि विश्वविद्यालय तब नहीं गिरते जब संसाधन कम होते हैं, बल्कि तब कमजोर पड़ते हैं जब उनके हितधारक अपने मूल्यों और दायित्वों से विमुख हो जाते हैं। उन्होंने विश्वविद्यालय परिवार का आह्वान किया कि प्रत्येक शिक्षक, अधिकारी, कर्मचारी और विद्यार्थी स्वयं को संस्थान की प्रगति का सक्रिय भागीदार मानते हुए उत्कृष्टता की संस्कृति विकसित करे। उन्होंने कहा कि आने वाला समय विश्वविद्यालय के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 का प्रभावी क्रियान्वयन, राष्ट्रीय प्रत्यायन (नेक) की तैयारी, शिक्षकों एवं कर्मचारियों की भर्ती प्रक्रिया, शैक्षणिक गुणवत्ता में सुधार और अनुसंधान संस्कृति को सुदृढ़ करना विश्वविद्यालय की प्रमुख प्राथमिकताएँ होंगी। इन लक्ष्यों की प्राप्ति केवल प्रशासनिक प्रयासों से नहीं, बल्कि सम्पूर्ण विश्वविद्यालय समुदाय की सहभागिता से संभव होगी।
कुलगुरु ने शिक्षकों से विशेष आग्रह किया कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता के इस युग में पारंपरिक अध्यापन पर्याप्त नहीं रहेगा। विद्यार्थियों को वही शिक्षक आकर्षित कर पाएगा जो उन्हें पाठ्यपुस्तक से आगे ले जाकर आलोचनात्मक चिंतन, रचनात्मकता, जिज्ञासा और समस्या-समाधान की क्षमता विकसित करने में सक्षम होगा। उन्होंने कहा कि यदि कक्षा में वही जानकारी उपलब्ध कराई जाएगी जो कृत्रिम बुद्धिमत्ता सहज उपलब्ध करा सकती है, तो शिक्षक की भूमिका सीमित हो जाएगी। इसलिए प्रत्येक कक्षा संवाद, नवाचार और बौद्धिक विमर्श का केंद्र बननी चाहिए। विद्यार्थियों से संवाद करते हुए उन्होंने अध्ययन की नई संस्कृति विकसित करने का आह्वान किया। उनका कहना था कि विद्यार्थी यदि पूर्व तैयारी के साथ कक्षा में आएँ, प्रश्न पूछें, जिज्ञासाएँ रखें और शिक्षकों के साथ सक्रिय शैक्षणिक संवाद स्थापित करें, तभी उच्च शिक्षा अपने वास्तविक उद्देश्य को प्राप्त कर सकेगी।
कार्यक्रम का संचालन डॉ. सूरजमल राव ने करते हुए विगत सात दिनों मे आयोजित विभिन्न कार्यक्रमों का संक्षिप्त प्रतिवेदन प्रस्तुत करते हुए कहा कि विश्वविद्यालय का स्थापना दिवस केवल एक संस्थागत आयोजन नहीं, बल्कि समूचे विश्वविद्यालय परिवार का साझा उत्सव बना। कुलसचिव एवं वित्त नियंत्रक सुश्री नेहा शर्मा ने आभार व्यक्त किया। सप्तदिवसीय स्थापना दिवस समारोह के दौरान विश्वविद्यालय में विविध शैक्षणिक, सांस्कृतिक, वैचारिक एवं सामाजिक गतिविधियों का आयोजन हुआ, जिनके माध्यम से विद्यार्थियों, शोधार्थियों, शिक्षकों एवं कर्मचारियों की व्यापक भागीदारी सुनिश्चित हुई। समापन समारोह में संकायाध्यक्ष, विभागाध्यक्ष, आचार्यगण, अतिथि शिक्षक, अधिकारी, कर्मचारी, शोधार्थी एवं बड़ी संख्या में विद्यार्थियों की गरिमामयी उपस्थिति रही।
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हिन्दुस्थान समाचार / संतोष

