प्रशासनिक अनदेखी से पहचान खो रहा खलकाणी माता का गर्दभ मेला
जयपुर, 16 अक्टूबर (हि.स.)। राजस्थान की लोक परंपरा और ग्रामीण पशु व्यापार की पहचान खलकाणी माता का प्रसिद्ध गर्दभ मेला प्रशासनिक अनदेखी का शिकार हो रहा है। भावगढ़ बंध्या में लगने वाले इस मेले में नगर निगम ने इस बार सफाई तो करवा दी, लेकिन पशुपालकों और व्यापारियों के लिए पेयजल, रोशनी और सुरक्षा के इंतजाम नहीं किए। इससे दूर-दराज से पशु लेकर पहुंचे व्यापारियों को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। वहीं, मेला स्थल की खाली जमीन पर अतिक्रमण की आशंका भी बढ़ रही है।
मेले में खरीदारी के लिए उत्तर प्रदेश से आए व्यापारियों का कहना है कि यहां सुरक्षा की कोई व्यवस्था नहीं है। उनका आरोप है कि पिछले पांच साल से नगर निगम की ओर से पशुओं की रवन्ना भी नहीं काटी जा रही है। इसके कारण पशु लेकर लौटते समय कानोता, बस्सी और भरतपुर क्षेत्र में पुलिस की ओर से परेशानी का सामना करना पड़ता है। व्यापारियों ने प्रशासन से व्यवस्था सुधारने की मांग की है।
मेले में पशुओं को वाहनों से उतारने और चढ़ाने के लिए उचित पेड़ा नहीं होने से पशुपालकों को परेशानी होती है। उन्हें सड़क पर वाहन खड़े कर तालाब की पाल पर पशुओं को उतारना पड़ता है। पहले मेला मैदान और सड़क के दूसरी ओर मिट्टी के टीले थे, जहां आसानी से पशुओं को उतारा जाता था। पशुपालकों के अनुसार, मिट्टी माफिया ने इन टीलों को समतल कर दिया। इससे पशुओं को उतारने-चढ़ाने की समस्या और बढ़ गई है।
मेला स्थल की खाली जमीन पर धीरे-धीरे कब्जे होने की आशंका जताई जा रही है।
खलकाणी माता मानव सेवा संस्थान के संरक्षक व पूर्व जागीरदार ठाकुर उम्मेद सिंह राजावत का कहना है कि सरकार को मेला स्थल के चारों ओर तारबंदी या चारदीवारी करवानी चाहिए, ताकि जमीन को अतिक्रमण से बचाया जा सके।
राजावत ने बताया कि वर्ष 1996 से यह मेला पर्यटन मेलों में शामिल है। मेले में सांस्कृतिक कार्यक्रमों के आयोजन के लिए विभाग की ओर से राशि भी स्वीकृत है, लेकिन पिछले पांच-छह साल से कार्यक्रम नहीं हो रहे हैं। वर्ष 2019 में तत्कालीन पार्षद मोहनलाल मीणा के प्रयासों से तीन दिन सांस्कृतिक कार्यक्रम हुए थे। इसके बाद से आयोजन बंद हैं।
खलकाणी माता का गर्दभ मेला अपनी अनूठी पहचान के लिए प्रसिद्ध है। वर्ष 1996 के बाद मेले में गधों के साथ घोड़े भी आने लगे। समय के साथ घोड़ों की संख्या और उनके खरीदार बढ़े हैं। अब गधों की तुलना में घोड़े-घोड़ियां अधिक नजर आते हैं। मेले में दस हजार रुपये से लेकर 40 लाख रुपये तक कीमत के घोड़े पहुंचते हैं। कई पशुपालक भारी खर्च उठाकर अपने घोड़े-घोड़ियों को केवल मेले में शामिल कराने के लिए लाते हैं। पशुपालकों का कहना है कि समय रहते मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध नहीं कराई गईं तो मेले की पारंपरिक पहचान और रौनक प्रभावित हो सकती है।
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हिन्दुस्थान समाचार / राजेश

