मैं’ से ‘हम’ की यात्रा ही भारत के चिंतन का मूल भाव : हनुमान सिंह राठौड़
उदयपुर, 13 सितम्बर (हि.स.)। भारत को केवल राजनीतिक या भौगोलिक इकाई के रूप में नहीं, बल्कि एक जीवंत सांस्कृतिक चेतना के रूप में समझने की आवश्यकता है। भारतीय चिंतन व्यक्ति तक सीमित नहीं है, बल्कि परिवार, समाज और संपूर्ण विश्व को एक इकाई के रूप में देखने की दृष्टि देता है। ‘मैं’ से ‘हम’ की यात्रा ही भारतीय चिंतन का मूल भाव है।
यह बात माध्यमिक शिक्षा बोर्ड के अध्यक्ष हनुमान सिंह राठौड़ ने कही। वे पाथेय कण संस्थान, विश्व संवाद केंद्र एवं रवींद्रनाथ टैगोर आयुर्विज्ञान महाविद्यालय, उदयपुर के संयुक्त तत्वावधान में हस्तीमल व्याख्यानमाला के अंतर्गत आयोजित ‘हम भारत के लोग’ विषयक व्याख्यान कार्यक्रम को संबोधित कर रहे थे।
कार्यक्रम की अध्यक्षता पाथेय कण संस्थान के अध्यक्ष एवं हरिदेव जोशी पत्रकारिता विश्वविद्यालय के कुलगुरु प्रो. नंदकिशोर पांडे ने की। रवीन्द्रनाथ टैगोर आयुर्विज्ञान महाविद्यालय उदयपुर के प्राचार्य एवं नियंत्रक डॉ. राहुल जैन एवं विश्व संवाद केंद्र उदयपुर के अध्यक्ष कमल प्रकाश रोहिला भी मंचासीन रहे।
मुख्य वक्ता हनुमान सिंह राठौड़ ने ‘हम भारत के लोग’ विषय पर अपने व्याख्यान में भारत की राष्ट्रीय पहचान, भारतीय चिंतन परंपरा और ‘मैं’ से ‘हम’ बनने की यात्रा पर विस्तार से विचार व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि आज दुनिया के सामने यह प्रश्न महत्वपूर्ण बन गया है कि ‘हम कौन हैं?’ राष्ट्रीय पहचान को लेकर जिस प्रकार का संकट दिखाई दे रहा है, उस पर गंभीर चिंतन की आवश्यकता है। भारत के संदर्भ में भी विचार करना होगा कि ‘मैं’ से ‘हम’ कैसे बने और ‘हम’ की अनुभूति का आधार क्या है।
भारतीय दर्शन का उल्लेख करते हुए राठौड़ ने उपनिषदों का उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि उपनिषद संसार में दिखाई देने वाली प्रत्येक वस्तु में ईश्वर के अंश को देखने की दृष्टि प्रदान करते हैं। त्यागपूर्ण जीवन और समष्टि के प्रति संवेदनशीलता से ही ‘मैं’ से ‘हम’ की यात्रा प्रारंभ होती है।उन्होंने कहा कि भारत का चिंतन केवल व्यक्ति तक सीमित नहीं है, बल्कि परिवार, समाज और संपूर्ण विश्व को एक इकाई के रूप में देखने की दृष्टि देता है। भारत में कुटुंब भाव इसी चिंतन का परिणाम है। त्याग और अपनत्व से परिवार का निर्माण होता है और यही भावना आगे बढ़कर ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ के रूप में संपूर्ण विश्व को अपना परिवार मानने की प्रेरणा देती है।
राठौड़ ने कहा कि भारतीय परंपरा में मनुष्य ही नहीं, बल्कि सभी प्राणियों के प्रति संवेदना का भाव दिखाई देता है। जीवों के प्रति सम्मान तथा परिवार और समाज में पशु-पक्षियों के प्रति संवेदनशीलता जैसे उदाहरण बताते हैं कि भारतीय जीवन-दृष्टि में समस्त सृष्टि के प्रति आत्मीयता का भाव रहा है। वेद और उपनिषद ने इसी व्यापक दृष्टिकोण को समाज के सामने रखा है।
उन्होंने कहा कि जो केवल स्वयं के लिए सोचता और स्वयं के लिए जीता है, वह समाज और मानवता के प्रति अपने दायित्व से विमुख हो जाता है। विभिन्न विचारधाराओं का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि दुनिया को विभिन्न वर्गों और समूहों में बांटने वाली प्रवृत्तियों के विपरीत भारतीय चिंतन समस्त संसार के कल्याण की भावना को सामने रखता है। उन्होंने कहा कि ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’, ‘प्राणियों में सद्भावना हो’ और ‘विश्व का कल्याण हो’ जैसी भावनाएं भारतीय जीवन-दर्शन की व्यापकता को दर्शाती हैं। जो व्यक्ति केवल अपने समूह या अपने हित की चिंता करता है, वह ‘हम’ के भाव को विकसित नहीं कर सकता। ‘हम’ का भाव तभी विकसित होगा, जब व्यक्ति पूरे समाज और विश्व के हित के बारे में चिंतन करेगा।
भारत की ऐतिहासिक भूमिका पर प्रकाश डालते हुए राठौड़ ने कहा कि भारत ने दुनिया को शस्त्रों के माध्यम से प्रभावित नहीं किया, बल्कि ज्ञान, शिक्षा, संस्कृति, वेदों और अपने चरित्र के माध्यम से विश्व को प्रभावित किया है। भारत की सभ्यता ने लोगों को अपने चरित्र और आचरण के माध्यम से जोड़ा। भारत की यह परंपरा उसके ऋषियों और आचार्यों की देन है, जिन्होंने जीवन को कुटुंब भाव और मानवीय मूल्यों के साथ जीने का मार्ग दिखाया।
वर्तमान सामाजिक परिस्थितियों पर चिंता व्यक्त करते हुए राठौड़ ने कहा कि आज समाज को जाति, वर्ग और विभिन्न समूहों में बांटने वाली प्रवृत्तियां दिखाई दे रही हैं। संकुचित सोच के आधार पर समाज में विभाजन पैदा करने के प्रयास किए जा रहे हैं। ऐसी प्रवृत्तियों के प्रति सजग रहते हुए भारतीय दर्शन और सामाजिक समरसता के आधार पर ‘हम’ के भाव को मजबूत करना होगा।
राठौड़ ने संविधान सभा की बहसों का उल्लेख करते हुए कहा कि प्रत्येक नागरिक को संविधान सभा की चर्चाओं का अध्ययन करना चाहिए। स्वतंत्र भारत की पहचान, भाषा और राष्ट्र से जुड़े विषयों पर संविधान सभा में व्यापक विमर्श हुआ। राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत के निर्धारण से जुड़े प्रसंगों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि राष्ट्र के प्रति ‘मां’ का भाव और अपनत्व ही नागरिकों को ‘मैं’ से ‘हम’ की ओर ले जाता है। उन्होंने कहा कि भारत को केवल राजनीतिक या भौगोलिक इकाई के रूप में नहीं, बल्कि एक जीवंत सांस्कृतिक चेतना के रूप में समझने की आवश्यकता है। भारतीय दर्शन, समाज और संस्कृति के आधार पर व्यक्तिगत हितों से ऊपर उठकर समाज और राष्ट्र के प्रति ‘हम’ का भाव विकसित करने पर चिंतन करना होगा।
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे प्रोफेसर नंदकिशोर पांडे ने अध्यक्षीय उद्बोधन दिया और पाठ्यक्रम से संबंधित जानकारी प्रदान की। कार्यक्रम का शुभारंभ राष्ट्रगीत वंदे मातरम् एवं समापन राष्ट्रगान के साथ हुआ। अतिथिगण द्वारा भारत माता के चित्र के समक्ष पुष्पांजलि अर्पित की गई। नृत्य-सृष्टि समूह के कलाकारों द्वारा आराधना स्वरूप शास्त्रीय नृत्य की मनमोहक प्रस्तुति दी गई।
पाथेय कण संस्थान के सचिव महेंद्र सिंहल ने कार्यक्रम की प्रस्तावना रखते हुए पाथेय कण संस्थान की यात्रा और उसकी गतिविधियों की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि इस वर्ष पाथेय कण पत्रिका ने अपने सदस्यता के पुराने रिकॉर्ड को पीछे छोड़ते हुए 1 लाख 85 हजार सदस्य जोड़ने का गौरव प्राप्त किया है। पत्रिका के माध्यम से गांव-गांव तक जनजागरण के कार्य को आगे बढ़ाया गया। संस्थान द्वारा साहित्य, सामाजिक जागरण और राष्ट्रहित से जुड़े विषयों पर निरंतर कार्य किया जा रहा है।
कार्यक्रम के दौरान महर्षि दधीचि देहदान सम्मान समारोह भी आयोजित किया गया, जिसमें देहदान करने वाले व्यक्तित्वों के परिवारजनों एवं परिजनों का सम्मान किया गया। इस मौके पर पिछले वर्षों में देहदान करने वाले 15 परिवारों का सम्मान किया गया। साथ ही देहदान के लिए प्रोत्साहित करने वाली 2 संस्थाओं को भी सम्मानित किया गया। सम्मानित परिवारों एवं संस्थाओं को शॉल, अभिनंदन पत्र और स्मृति चिन्ह प्रदान किया गया। इस अवसर पर जिला चिकित्सालय अम्बामाता की प्रभारी डॉ नाजिमा व शरीर रचना विभाग की विभागाध्यक्ष डॉ श्वेता अस्थाना भी उपस्थित रहे। वर्ष 2025-26 में दिवंगत देहदानी रवि खमेसरा, पुष्पा देवी, मुरारी लाल अग्रवाल, सकु बाई, प्रह्लाद कुमार सुहालका, धर्मदेव चौबे, कुसुमबाई चावत, चन्द्रा खमेसरा, सुशीला जैन, संध्या नाहर, नाथू लाल चंडालिया, आशु लाल कुरडिया, बसंती लाल पगारिया, रोशन लाल हिरण व इला चक्रवर्ती के परिजनों का सम्मान किया गया।
उल्लेखनीय है कि हस्तीमल हिरण का जन्म राजसमंद के आमेट में हुआ। विद्यार्थी जीवन से ही उन्होंने संघ कार्यों से जुड़कर अपना जीवन राष्ट्रकार्य को समर्पित कर दिया। उदयपुर में प्रचारक के रूप में कार्य करते हुए उन्होंने संघ के विभिन्न दायित्वों का निर्वहन किया। वर्ष 2004 से 2015 तक अखिल भारतीय संपर्क प्रमुख रहे। अध्ययन, संगठन, आत्मीयता और सेवा उनके जीवन की प्रमुख विशेषताएं रहीं।
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हिन्दुस्थान समाचार / सुनीता

