एक होली ऐसी भी जहां पानी बचाने के लिए नहीं लगाते रंग

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एक होली ऐसी भी जहां पानी बचाने के लिए नहीं लगाते रंग


बिश्रोई समाज करता है सामूहिक हवन, नहीं देखता होलिका दहन

जोधपुर, 28 फरवरी (हि.स.)। रंगों का पर्व होली अब भारत से निकलकर दुनिया के कोने कोने में मनाए जाने लगा है। बिश्नोई समाज के लोग होली पर होलिका दहन नहीं करते, ना ही रंग गुलाल का उपयोग करता है।

जनता जल नलकूप यूनियन राजस्थान के अध्यक्ष व विश्नोई समाज के युवा नेता सहीराम खीचड़ (भेड़) ने बताया कि समाज के उन्न्तीस नियम बने है। अधिकांश पर्यावरण संरक्षण से जुड़े हैं। पेड़ों को बचाने के लिए 363 लोगों ने अपनी जान दे दी थी। उनके अनुयायियों का मानना है कि होली दहन में लकडिय़ों का इस्तेमाल होता है और ज्वाला के दौरान सैकड़ों कीड़े पतंगे इस में गिर कर मर जाते हैं इसलिए समाज के लोग होली दहन के दौरान कहीं ज्वाला भी देखना पसंद नहीं करते हैं और ना ही कोई खुशी मनाते हैं।

दूसरे दिन सामूहिक हवन के बाद पाल बनाकर प्रसाद लेते हैं। इसके बाद सादा बाजरा का खिचड़ा बनाकर भोजन करते हैं। राजस्थान, पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र दिल्ली, गोवा सहित कई अन्य राज्यों में रहने वाला विश्नोई समाज इसी तरीके से होली मनाता है।

परंम्परा के अनुसार विश्नोई समाज के लोग खुद को प्रह्लाद पंथी मानते हैं। जब होली के दिन होली का भक्त प्रहलाद को लेकर चिंता में बैठती है तो उस समय बिश्नोई समाज प्रहलाद के जल जाने की आशंका को लेकर गमगीन हो जाता है लेकिन जैसे ही दूसरे दिन यानी रामा श्यामा को होलिका के जल जाने और प्रहलाद के बस जाने की खबर मिलती है तो खुशी में हवन आदि करते हैं।

हिन्दुस्थान समाचार / सतीश

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