तीज के रंग में रंगेगी गुलाबी नगरी: 15 अगस्त को निकलेगी ऐतिहासिक शाही सवारी

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तीज के रंग में रंगेगी गुलाबी नगरी: 15 अगस्त को निकलेगी ऐतिहासिक शाही सवारी


तीज के रंग में रंगेगी गुलाबी नगरी: 15 अगस्त को निकलेगी ऐतिहासिक शाही सवारी


जयपुर, 14 अगस्त (हि.स.)। गुलाबी नगरी में लोक आस्था, राजसी परंपरा और राजस्थान की समृद्ध लोक संस्कृति का पर्व तीज इस बार 15 और 16 अगस्त को खास रंग में नजर आएगा। 15 अगस्त को सिंजारा मनाया जाएगा और इसी दिन शाम को तीज माता की ऐतिहासिक शाही सवारी निकलेगी। सिटी पैलेस से निकलकर त्रिपोलिया गेट, छोटी चौपड़ और गणगौरी बाजार होते हुए सवारी तालकटोरा स्थित पौंड्रिक पार्क पहुंचेगी। वहीं 15 और 16 अगस्त को पौंड्रिक पार्क में तीज मेले का आयोजन होगा।

तीज के चलते परकोटे के बाजारों में घेवर, लहरिया, मेहंदी, चूड़ियों और श्रृंगार सामग्री की खरीदारी के लिए रौनक बढ़ गई है। बड़ी चौपड़, जौहरी बाजार और बापू बाजार में पचरंगी, मोठड़ा और गोटा-पत्ती वर्क वाले लहरियों की मांग बनी हुई है। महिलाओं के लिए बाग-बगीचों और पार्कों में झूले सजाए जा रहे हैं, जहां सावन के लोकगीत और मल्हार उत्सव की रंगत बढ़ाएंगे।

इतिहासकार जितेंद्र सिंह शेखावत के अनुसार जयपुर की स्थापना के साथ ही 1727 में महाराजा सवाई जयसिंह द्वितीय ने तीज माता की सवारी को सार्वजनिक और भव्य रूप में निकालने की परंपरा शुरू की थी। तीज माता की प्रतिमा सिटी पैलेस में विराजमान रहती है और वर्ष में तृतीया तीज तथा चतुर्थी यानी बूढ़ी तीज के अवसर पर ही बाहर आती है।

इस बार सवारी से पहले सिटी पैलेस की जनानी ड्योढ़ी में पूर्व राजपरिवार की महिलाएं धार्मिक अनुष्ठान करेंगी। इसके बाद सिटी पैलेस से सवारी रवाना होकर त्रिपोलिया गेट पहुंचेगी, जहां पूर्व राजपरिवार के महाराजा सवाई मान सिंह द्वितीय के वंशज सवाई पद्मनाभ सिंह तीज माता के दर्शन कर पहली आरती करेंगे। इसके बाद सवारी छोटी चौपड़ और गणगौरी बाजार होते हुए पौंड्रिक पार्क पहुंचेगी।

शाही सवारी का प्रमुख आकर्षण करीब 400 किलो वजन की चांदी की पालकी होगी, जिसमें तीज माता विराजमान होंगी। पालकी को आठ कंधेदार उठाकर चलेंगे। सवारी में घोड़े और ऊंट भी शामिल होंगे।

इस बार प्रदेशभर से आए करीब 175 लोक कलाकार राजस्थानी संस्कृति की जीवंत झांकी पेश करेंगे। कच्ची घोड़ी, गैर, कालबेलिया, चरी-घूमर, चंग-ढप, मांगणियार गायन, भपंग, रावणहत्था, कठपुतली और बहुरूपिया जैसी लोक कलाओं की प्रस्तुतियां होंगी। मुस्लिम कलाकार भी प्रस्तुतियों के जरिए सांप्रदायिक सौहार्द का संदेश देंगे।

ड्रोन से पुष्पवर्षा के साथ शौर्य सेवा संगठन की बालिकाएं तलवारबाजी का प्रदर्शन कर महिला सशक्तीकरण और शौर्य का संदेश देंगी।

छोटी चौपड़ पर तीज माता की महाआरती होगी। यहां जेल बैंड और आरएसी बैंड की प्रस्तुतियां होंगी तथा जयपुर व्यापार महासंघ की ओर से पुष्पवर्षा की जाएगी। इसके बाद सवारी पौंड्रिक पार्क पहुंचेगी, जहां कला मेले में राजस्थान की लोक कला और संस्कृति के विभिन्न रंग देखने को मिलेंगे।

पर्यटन विभाग की ओर से शाही सवारी का सीधा प्रसारण शहर में 13 प्रमुख स्थानों पर लगाई गई एलईडी स्क्रीन पर किया जाएगा। इनमें अजमेरी गेट, न्यू गेट, सरावगी मेंशन, मोती डूंगरी, त्रिमूर्ति सर्किल, रामबाग सर्किल, एसएमएस स्टेडियम, महाराजा कॉलेज, बिड़ला मंदिर, राजस्थान विश्वविद्यालय, राजस्थान कॉलेज, ओटीएस चौराहा और जवाहर सर्किल गेट शामिल हैं।

पर्यटन विभाग सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर भी सवारी का लाइव प्रसारण करेगा। राजस्थान फाउंडेशन की पहल पर विदेशों में मौजूद सरकारी स्क्रीन और डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से प्रवासी राजस्थानी भी इस आयोजन से जुड़ सकेंगे।

15 और 16 अगस्त को पौंड्रिक पार्क में तीज मेले का आयोजन होगा। मेला सुबह 11:30 बजे से रात 9:30 बजे तक चलेगा। मेले में प्रवेश महिलाओं के लिए रहेगा और राजस्थान की लोक संस्कृति, पारंपरिक कला व हस्तशिल्प की झलक देखने को मिलेगी। आयोजन में 150 से अधिक लोक कलाकारों के शामिल होने की जानकारी है।

देशी-विदेशी पर्यटकों के लिए भी विशेष व्यवस्था की गई है। विदेशी पर्यटक त्रिपोलिया गेट के सामने स्थित हिंद होटल की छत और बरामदों से शाही सवारी देख सकेंगे। जयपुर की ऐतिहासिक हवेलियों, झरोखों और अटारियों से भी तीज माता की जय-जयकार के बीच सवारी का स्वागत होगा।

इसके अलावा तीज के अवसर पर शहर के मंदिरों में भी विशेष आयोजन होंगे। ठाकुरजी को लहरिया पोशाक धारण कराई जाएगी और घेवर का भोग लगाया जाएगा। गोविंददेवजी मंदिर में 10 से 28 अगस्त तक हिंडोलोत्सव चल रहा है। इस दौरान ठाकुरजी और श्री राधारानी को सोने-चांदी के नक्काशीदार हिंडोलों में विराजमान कर विशेष लड्डू भोग लगाया जा रहा है।

मंदिर का ऐतिहासिक हिंडोला करीब 200 किलो वजन का और 100 वर्ष से अधिक पुराना बताया जाता है। पूर्व राजपरिवार की ओर से भेंट किए गए इस सागवान की लकड़ी के हिंडोले पर शुद्ध चांदी की नक्काशी, राजस्थानी और जयपुर दरबारी शैली के बेल-बूटे तथा मयूर आकृतियां उकेरी गई हैं।

तीज पर जयपुर के पारंपरिक घेवर को भी नया और लग्जरी अंदाज मिला है। एक मिठाई निर्माता ने करीब 21 हजार रुपए कीमत का ‘स्वर्ण श्रृंगार घेवर’ तैयार किया है। इसमें खाने योग्य सोना, प्रीमियम ड्राई फ्रूट्स और ईरानी केसर का इस्तेमाल किया गया है। इस बार करीब 21 अलग-अलग फ्लेवर के घेवर तैयार किए गए हैं। नई पीढ़ी को ध्यान में रखते हुए पारंपरिक मिठाई में नए स्वाद और प्रीमियम सामग्री का प्रयोग किया गया है। लॉन्च के एक दिन में ही प्रीमियम घेवर के दो पीस बिकने की जानकारी है।

पर्यटन कारोबारी कृपाल सिंह शेखावत के अनुसार सिंजारा और तीज केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि राजस्थान की लोक संस्कृति, पारिवारिक रिश्तों, महिला उत्सव और जयपुर की राजसी विरासत का जीवंत प्रदर्शन हैं। इस बार शाही सवारी, लोक कलाकारों की प्रस्तुतियों, लहरिया-मेहंदी और झूलों के साथ एलईडी स्क्रीन, सोशल मीडिया लाइव स्ट्रीमिंग और विदेशों तक प्रसारण इसे आधुनिक डिजिटल मंच से भी जोड़ रहे हैं। इससे देशी-विदेशी पर्यटकों को जयपुर की सदियों पुरानी सांस्कृतिक विरासत को करीब से देखने का अवसर मिलेगा।

वहीं हरियाली तीज से एक दिन पहले शुक्रवार को जयपुर में सिंजारा पारंपरिक उल्लास के साथ मनाया गया। सावन की फुहारों के बीच गुलाबी नगरी लहरिये के रंग में रंगी नजर आई। महिलाओं ने मेहंदी रचाई, सोलह श्रृंगार किया और लहरिया परिधान पहनकर तीज के स्वागत की तैयारियां कीं। पीहर और ससुराल की ओर से नवविवाहिताओं व युवतियों को घेवर, मिठाई, चूड़ियां, नए वस्त्र और श्रृंगार सामग्री भेजी गई।

सिंजारा राजस्थान की ऐसी लोक परंपरा है, जो पीहर और ससुराल के बीच प्रेम, अपनापन और रिश्तों की मिठास को मजबूत करती है। परंपरा के अनुसार नवविवाहिता का पहला सिंजारा ससुराल से आता है, जबकि बाद के वर्षों में पीहर से बेटी के ससुराल सिंजारा भेजा जाता है। सुहागिनों ने माता पार्वती के गौरी स्वरूप की पूजा कर अखंड सौभाग्य और सुखी दांपत्य जीवन की कामना की।

सिंजारे और तीज को लेकर परकोटे के बाजारों में भी खास रौनक रही। बड़ी चौपड़, जौहरी बाजार और बापू बाजार में महिलाएं लहरिया साड़ी, सूट और दुपट्टे खरीदने पहुंचीं। इस बार पारंपरिक पचरंगी और मोठड़ा लहरिया के साथ आधुनिक डिजाइन तथा गोटा-पत्ती वर्क वाले लहरियों की मांग भी बनी हुई है। दुकानदारों के अनुसार तीज से पहले लहरिये की बिक्री में कई गुना तक बढ़ोतरी होती है।

घेवर, मेहंदी, चूड़ियों और सोलह श्रृंगार की सामग्री की दुकानों पर भी खरीदारों की भीड़ रही। खासकर नवविवाहिताओं के लिए सिंजारे के सामान की विशेष खरीदारी हुई।

सिंजारे के बाद शनिवार को तीज के मुख्य पर्व पर महिलाएं रंग-बिरंगे लहरिया परिधान और सोलह श्रृंगार के साथ बाग-बगीचों व पार्कों का रुख करेंगी। शहर के प्रमुख पार्कों और ऐतिहासिक बागों में पेड़ों पर झूले सजाए जा रहे हैं। महिलाएं झूला झूलते हुए सावन के लोकगीत और मल्हार गाएंगी। इससे शहर में भक्ति, उमंग और लोक संस्कृति की रंगत और गहरी होगी।

समय के साथ सिंजारा मनाने के तौर-तरीके भी बदले हैं। पहले महिलाएं बाग-बगीचों में झूले झूलकर और लोकगीत गाकर पर्व मनाती थीं, जबकि अब होटल, क्लब और आयोजन स्थलों पर भी लहरिया उत्सव और किटी पार्टियां होने लगी हैं। इसके बावजूद मेहंदी, लहरिया, घेवर, झूले और सावन के गीत आज भी सिंजारे और तीज की पारंपरिक पहचान बने हुए हैं।

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हिन्दुस्थान समाचार / दिनेश

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