जब स्वाधीनता सेनानी ने परिचय पत्र के लिए 50 रुपये रख दिए थे कलेक्टर की मेज पर





उदयपुर, 25 जनवरी (हि.स.)। हमने ऐसी आजादी की कल्पना नहीं की थी। हमारी कल्पना ऐसी आजादी की थी जहां हर वर्ग को न्याय मिले। खासतौर पर गरीब-वंचित वर्ग को न्याय मिले। लेकिन, आज भ्रष्टाचार ने इतनी जड़ें जमा ली हैं कि न्याय तो दूर की बात है, छोटे-मोटे काम के लिए भी पैसे देने पड़ते हैं। भ्रष्टाचार से कोई अछूता नहीं है, यहां तक कि स्वाधीनता सेनानी होने के बावजूद उन्हें भी इस पीड़ा से गुजरना पड़ा।

यह पीड़ा है वयोवृद्ध स्वाधीनता सेनानी ललित मोहन शर्मा की। गणतंत्र दिवस से पूर्व विशेष चर्चा में उन्होंने अपने संस्मरण सुनाते हुए कहा कि भ्रष्टाचार के उनके साथ हुए वाकिये में उन्होंने कलेक्टर की मेज पर ही 50 रुपये रख दिए थे। इसके बाद तो आप सोच सकते हैं कि क्या हुआ होगा।

दरअसल, कुछ साल पहले राजस्थान सरकार से चिट्ठी आई कि सभी स्वाधीनता सेनानियों को ताम्रपत्र दिए जाएंगे। सभी को जयपुर में निर्धारित तारीख को बुलाया गया था। हालांकि, किसी की मृत्यु होने से कार्यक्रम स्थगित हो गया और बाद में ताम्रपत्र घर पर ही पहुंचा दिए गए थे। किन्तु इस दौरान एक परिचय पत्र कलेक्टर से लिया जाना था। वे तब माध्यमिक शिक्षा बोर्ड में कार्यरत थे। वे कलेक्ट्रेट गए और संबंधित कार्मिक से सम्पर्क किया, उस व्यक्ति ने चार बार टरका दिया। पांचवीं बार उसने बोला कि चाबी घर भूल आया हूं। उस वक्त परिचय पत्र लेने का विचार ही समाप्त हो गया, लेकिन लौटते वक्त कमरे के बाहर बाहर साफा पहने बैठे एक व्यक्ति ने कहा कि आप 50 का नोट टिकाओ। तब वे चौंके कि सरकार ने पत्र लिखा है कि परिचय पत्र प्राप्त करो, कलेक्टर को हमें परिचय पत्र देना है, उसके लिए भी 50 रुपये देने की बात हो रही है। उन्होंने इस व्यवस्था को सुधारने की ठान ली। सीधे कलेक्टर के पास पहुंचे। पर्ची भिजवाई। कलेक्टर ने अंदर बुलवा लिया। कलेक्टर से कहा कि बोर्ड में नौकरी करते हैं, इतना समय नहीं मिलता, आज पांचवीं बार आए हैं, लेकिन परिचय पत्र नहीं मिला, बाहर निकलने लगा तो एक आदमी ने कहा कि 50 रुपये दो, स्वाधीनता सेनानी ने कलेक्टर से कहा कि 50 रुपये की वहां कोई रसीद-वसीद तो मिलेगी नहीं, इसलिए यह 50 रुपये यहीं पर रखना उचित रहेगा और उन्होंने मेज पर 50 रुपये रख दिए। इसके बाद तो कलेक्टर को गुस्सा आना ही था। तुरंत उस कार्मिक को तलब किया। वह आया और उसने स्वाधीनता सेनानी को वहां देखा तो उसके पैर कांपने लग गए। कलेक्टर ने कहा कि अगले 5 मिनट में परिचय पत्र यहां आना चाहिए। ये यहीं बैठे हैं।

स्वाधीनता सेनानी शर्मा ने कहा कि जब सालों पहले उनके साथ यह घटना हो सकती है तो आज की स्थिति क्या होगी, कहने की जरूरत नहीं है और हम जैसे स्वाधीनता सेनानी सोचेंगे तो हमारी पीढ़ी का मन ही खराब होगा।

वयोवृद्ध स्वाधीनता सेनानी ने आज की सरकारों से भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने की अपील की है। खास तौर से उन्होंने कहा कि शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में फैले भ्रष्टाचार पर तुरंत लगाम के लिए गंभीरता से विचार करना चाहिए। भ्रष्टाचार ने समाज के मध्यम व निचले तबके को परेशान कर रखा है।

स्वाधीनता सेनानी कहते हैं कि इस आजादी की कल्पना हमने नहीं की थी। उन्होंने 8 नौकरियां बदलीं, लेकिन गुलामी कहीं नहीं की। गलत काम कराने का दबाव होता तो जेब में इस्तीफा रखते थे। आज स्वतंत्रता भटक गई है। भ्रष्टाचारी को सख्त से सख्त सजा होनी चाहिए। न्याय नहीं मिल रहा।

वयोवृद्ध स्वाधीनता सेनानी ने कहा कि विजयी विश्व तिरंगा प्यारा, झण्डा ऊंचा रहे हमारा, शान न इसकी जाने पाए, चाहे जान भले ही जाए। इस गीत के भाव से हमने मातृभूमि के लिए खुद को समर्पित करने की ठान रखी थी। इसलिए पकड़े भी गए तो कभी माफी नहीं मांगी क्योंकि हम मां की आजादी के लिए काम कर रहे थे, कोई चोरी-डाका जैसा अपराध नहीं कर रहे थे।

इस दौरान वयोवृद्ध स्वाधीनता सेनानी ने 1942 के आंदोलन के दौरान प्रजामण्डल के पर्चे बांटने का किस्सा सुनाते हुए कहा कि वे अंगोछा पहन, गमछा गले में डालकर नहाने के बहाने कभी दूधतलाई जाते तो कभी पिछोला के गणगौर घाट जाते, इस दौरान समय पर्चे बांट देते थे। रंगनिवास पर पुलिसकर्मी लघुशंका कर रहा था, उसने वहां एक मकान में पर्चा देते हुए देख लिया। हमें पकड़ कर बिठा लिया गया, लेकिन हमने यह नहीं बताया कि कहां से लाते थे। हमारी आयु के अनुरूप जैसी मार हमें पड़नी चाहिए थी, पड़ी।

उन्होंने दूसरा किस्सा सुनाते हुए कहा कि कॉलेज में सीनियर छात्रों ने गुलाबबाग में लगी रानी विक्टोरिया की प्रतिमा पर कालिख लगाने की योजना बनाई। चूंकि वे छोटे थे इसलिए उनके ग्रुप में शामिल नहीं हो सकते थे, लेकिन गुपचुप के देखने जरूर पहुंच गए। सीनियर्स जब काम को अंजाम दे रहे थे तब पुलिस को पता चल गया और पुलिस आई। सीनियर्स तो भाग निकले लेकिन छोटे होने के कारण हम सरस्वती भवन लाइब्रेरी के पीछे घनी झाड़ियों में दुबक गए। उस दौरान तलाशी के दौरान एक सिपाही का डंडा सिर पर भी पड़ा जिसका निशान आज भी उनके सिर पर गवाही देता है। लेकिन, खून आने के बावजूद उन्होंने हिम्मत रखी और मुंह से आवाज नहीं निकलने दी, आवाज निकलती तो पकड़े जाते फिर और बुरे पिटते। घर लौटने पर भी असली बात नहीं बताई, यही कहा कि गिरने से चोट लग गई। अगले दिन इस काण्ड को लेकर हल्ला भी मचा, लेकिन उन्होंने चुप्पी साधे रखी। पांच-सात दिन तक देसी इलाज किया। किसी को बता भी नहीं सकते थे कि कैसे और क्यों लगी। यह मूर्ति आज भी गुलाबबाग में सरस्वती पुस्तकालय में संग्रहित है।

हिन्दुस्थान समाचार/ कौशल

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