सदियों से भारतीय किसान की आजीविका का आधार रहा है कृषि और पशुपालन : विशेषज्ञ कृष्ण मुरारी
बीकानेर, 19 मई (हि.स.)। स्वामी केशवानंद राजस्थान कृषि विश्वविद्यालय में आयोजित सात दिवसीय प्रशिक्षण में देश के विभिन्न राज्यों से आए 100 से अधिक किसानों और पशुपालकों ने वैज्ञानिक तरीकों से भेड़ एवं बकरी पालन करते हुए उद्यमिता विकास के गुर सीखे। सात दिवसीय प्रशिक्षण का मंगलवार को कृषि महाविद्यालय सभागार में समापन समारोह आयोजित किया गया।
समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में विशेषज्ञ कृष्ण मुरारी ने कहा कृषि और पशुपालन सदियों से भारतीय किसान की आजीविका का आधार रहा है। पशुपालकों को सरकार कई सुविधाएं दे रही हैं। खेती तथा पशुपालन के द्वारा आर्थिक सम्पन्नता लाई जा सकती है , बशर्ते पशुपालन के वैज्ञानिक ज्ञान को मूल्य संवर्धन से जोड़ते हुए नवाचार करने की दिशा में आगे बढ़ा जाए। इससे स्वरोजगार सृजन के साथ-साथ पलायन भी रुक सकेगा।
कुलगुरु प्रो राजेंद्र बाबू दुबे ने कहा कि बड़ी संख्या में पशुपालकों का प्रशिक्षण से जुड़ना दर्शाता है कि कृषि व पशुपालन के क्षेत्र में उद्यमिता विकास के माध्यम से स्वरोजगार की दिशा में किसानों का काफ़ी रूझान है। पशुपालन किसानों को जोखिम उठाने के लिए तैयार करता है। सीमांत किसानों के लिए यह प्रशिक्षण एक बेहतरीन अवसर है। इससे परम्परागत कार्य में युवाओं को कौशल विकास करने में मदद मिलेगी तथा वे रोजगार देने वाले बन सकेंगे।
डॉ दुबे ने कहा कि किसानों को खेती को लाभकारी बनाने के लिए समन्वित कृषि का मॉडल अपनाना होगा ।उन्होंने जैविक खेती की अपनाने का भी आव्हान किया।
डॉ विजय प्रकाश ने प्रशिक्षण की रुपरेखा से अवगत करवाया। उन्होंने बताया कि राजस्थान सहित उत्तर भारत के विभिन्न राज्यों से 103 प्रतिभागी प्रशिक्षण में शामिल हुए। प्रतिभागियों के लिए 28 विशेष सत्र आयोजित कर सैद्धांतिक व प्रायोगिक प्रशिक्षण दिए गए। समापन अवसर पर प्रगतिशील किसानों व पशुपालकों ने अपने अनुभव साझा किए।
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हिन्दुस्थान समाचार / राजीव

