एमडीएस विश्वविद्यालय में पीएचडी शोध प्रस्तावों की समीक्षा का प्रथम चरण पूरा
अजमेर, 23 जून(हि.स.)। महर्षि दयानन्द सरस्वती विश्वविद्यालय, अजमेर में पीएचडी प्रवेश परीक्षा-2025 के अंतर्गत चयनित शोधार्थियों के शोध-सार के मूल्यांकन के लिए आयोजित रिसर्च रजिस्ट्रेशन कमेटी (आरआरसी) की बैठकों का प्रथम चरण सफलतापूर्वक सम्पन्न हो गया। विश्वविद्यालय के 28 विषयों में से 22 विषयों के 275 शोधार्थियों के शोध प्रस्तावों की समीक्षा देशभर से आमंत्रित प्रतिष्ठित विषय विशेषज्ञों द्वारा की गई। इस प्रक्रिया में शोध की गुणवत्ता, मौलिकता, भारतीय ज्ञान प्रणाली, नीतिगत उपयोगिता तथा सामाजिक प्रासंगिकता के विभिन्न आयामों का गहन परीक्षण किया गया। विशेषज्ञों ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 की भावना के अनुरूप शोध को समाज, प्रशासन, शिक्षा, पर्यावरण और स्थानीय विकास की चुनौतियों के समाधान से जोड़ने की आवश्यकता पर विशेष बल दिया। विश्वविद्यालय प्रशासन के अनुसार शोध पंजीकरण प्रक्रिया का दूसरा चरण 22 जुलाई से 29 जुलाई 2026 तक आयोजित किया जाएगा।
कुलगुरु प्रो सुरेश कुमार अग्रवाल के अनुसार रिसर्च रजिस्ट्रेशन कमेटी की बैठकों के अनुवर्तन में विशेषज्ञों ने स्पष्ट रूप से कहा कि वर्तमान समय में केवल सैद्धांतिक शोध पर्याप्त नहीं है, बल्कि ऐसा अनुसंधान समय की मांग है जो समाज, शासन व्यवस्था, शिक्षा, पर्यावरण तथा स्थानीय आवश्यकताओं के व्यावहारिक समाधान प्रस्तुत कर सके। उन्होंने शोधार्थियों को भारतीय ज्ञान परम्परा, स्थानीय संसाधनों तथा लोक-अनुभव को आधुनिक शोध पद्धतियों के साथ समन्वित करने की सलाह दी, ताकि अनुसंधान के निष्कर्ष नीति निर्माण और प्रशासनिक क्रियान्वयन में उपयोगी सिद्ध हो सकें। विशेषज्ञों ने इस बात पर भी बल दिया कि विश्वविद्यालयों में होने वाले शोध का वास्तविक उद्देश्य केवल शैक्षणिक उपाधि प्राप्त करना नहीं, बल्कि समाज और राष्ट्र के समग्र विकास में योगदान देना होना चाहिए। उनका मत था कि जब शोध के निष्कर्ष जनसरोकारों और विकासात्मक आवश्यकताओं से जुड़ते हैं, तभी उसकी सार्थकता सिद्ध होती है।
बैठकों में प्रस्तुत शोध प्रस्तावों में ग्रामीण विकास, पर्यावरण संरक्षण, जल प्रबंधन, महिला सशक्तीकरण, शिक्षा सुधार, सांस्कृतिक विरासत संरक्षण, लोकज्ञान, डिजिटल नवाचार तथा सतत विकास जैसे विषय प्रमुख रूप से शामिल रहे। विशेषज्ञों ने इन विषयों को समकालीन चुनौतियों के समाधान की दिशा में अत्यंत महत्वपूर्ण बताते हुए शोधार्थियों को अंतःविषयक दृष्टिकोण अपनाने और स्थानीय समस्याओं पर आधारित नवाचारपूर्ण शोध को प्रोत्साहित करने की सलाह दी।
कुलगुरु प्रो अग्रवाल ने बताया कि समीक्षा प्रक्रिया के दौरान भारतीय ज्ञान प्रणाली (आईकेएस) को समकालीन अनुसंधान की एक महत्वपूर्ण दिशा के रूप में रेखांकित किया गया। विशेषज्ञों ने कहा कि आयुर्वेद, पर्यावरणीय संतुलन, सामुदायिक जीवन, नैतिक प्रशासन, लोक विज्ञान तथा पारंपरिक ज्ञान जैसे क्षेत्रों में शोध की व्यापक संभावनाएं निहित हैं।
शोध प्रस्तावों के मूल्यांकन के लिए विभिन्न विश्वविद्यालयों एवं संस्थानों से प्रतिष्ठित विशेषज्ञों ने भागीदारी निभाई। इनमें प्रो. हीरणमई यादव (केंद्रीय विश्वविद्यालय, गुजरात), प्रो. राज किशोर (दिल्ली विश्वविद्यालय), प्रो. मिथुन (दिल्ली विश्वविद्यालय), प्रो. रवि प्रकाश टेकचंदानी (दिल्ली विश्वविद्यालय), प्रो. रवीन्द्र गुप्ता (दिल्ली विश्वविद्यालय), प्रो. अनुभव वार्ष्णेय (राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर), प्रख्यात संतूर वादक प्रो. वर्षा अग्रवाल (विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन) तथा प्रो. पी.सी. अग्रवाल (एनसीईआरटी, नई दिल्ली) प्रमुख रूप से शामिल रहे। विशेषज्ञों ने शोधार्थियों को गुणवत्ता, मौलिकता और सामाजिक उपयोगिता के उच्च मानकों को अपनाने के लिए प्रेरित किया।
विश्वविद्यालय प्रशासन के अनुसार शोध पंजीकरण प्रक्रिया का दूसरा चरण 22 जुलाई से 29 जुलाई 2026 तक आयोजित किया जाएगा। इस चरण में सामाजिक विज्ञान संकाय के छह विषयों—राजनीति विज्ञान, लोक प्रशासन, भूगोल, समाजशास्त्र, अर्थशास्त्र तथा इतिहास—के 215 शोधार्थियों के शोध प्रस्तावों की समीक्षा की जाएगी। आगामी चरणों में भी मूल्यांकन राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020, भारतीय ज्ञान प्रणाली तथा सामाजिक उपयोगिता के मानकों को आधार बनाकर किया जाएगा।
निदेशक शोध प्रो सुब्रतो दत्ता ने बताया कि यदि अनुसंधान प्रक्रिया में सुझाए गए मानकों और अनुशंसाओं को प्रभावी रूप से अपनाया गया तो विश्वविद्यालयों में होने वाला शोध केवल डिग्री प्राप्ति तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि क्षेत्रीय विकास, नीति निर्माण, सुशासन और सामाजिक परिवर्तन का सशक्त माध्यम बन सकेगा।
---------------
हिन्दुस्थान समाचार / संतोष

