चाक की रफ्तार बरकरार: लेकिन बाजार में घट रही माटी के दीयों की मांग

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चाक की रफ्तार बरकरार: लेकिन बाजार में घट रही माटी के दीयों की मांग


चाक की रफ्तार बरकरार: लेकिन बाजार में घट रही माटी के दीयों की मांग


चाक की रफ्तार बरकरार: लेकिन बाजार में घट रही माटी के दीयों की मांग


चाक की रफ्तार बरकरार: लेकिन बाजार में घट रही माटी के दीयों की मांग


जयपुर, 03 नवंबर (हि.स.)। दीपावली में अभी पांच-छह दिन बाकी हैं, लेकिन अजमेर रोड स्थित गजसिंहपुरा की गलियों में दीपोत्सव की तैयारी शुरू हो चुकी है। सुबह से देर रात तक यहां कुम्हारों के चाक घूम रहे हैं। मिट्टी गूंथने से लेकर दीयों को आकार देने और पकाने तक का काम तेजी से चल रहा है। कारीगरों के हाथों में हुनर और आंखों में इस बार अच्छी बिक्री की उम्मीद है। हालांकि, चाइनीज झालरों और बिजली की सजावटी लाइटों ने मिट्टी के दीयों का बाजार काफी प्रभावित किया है।

गजसिंहपुरा निवासी कानाराम प्रजापति बताते हैं कि उनके परिवार में चार पीढ़ियों से मिट्टी के बर्तन और दीये बनाने का काम हो रहा है। करीब दो महीने पहले ही दीपावली के लिए दीये बनाने का काम शुरू कर दिया था। हर दिन लगभग एक हजार दीये तैयार किए जा रहे हैं। इस बार दीपावली तक 50 से 60 हजार दीयों की बिक्री होने की उम्मीद है। पहले एक लाख तक दीये बिक जाते थे, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में मांग घटने से कारोबार प्रभावित हुआ है।

कानाराम के अनुसार पहले गजसिंहपुरा में करीब 20 से 25 परिवार मिट्टी के दीये और बर्तन बनाने के काम से जुड़े थे। अब महज पांच से सात परिवार ही इस पुश्तैनी काम को संभाल रहे हैं। मेहनत के अनुपात में आमदनी नहीं होने और मिट्टी से लेकर दीये तैयार करने व पकाने तक की लागत बढ़ने के कारण नई पीढ़ी इस काम से दूरी बना रही है। उनका कहना है कि माटी महंगी हुई है और मेहनत भी बढ़ी है, लेकिन बाजार में मांग पहले जैसी नहीं रही।

उन्होंने बताया कि पिछले कुछ वर्षों से स्वदेशी वस्तुओं को अपनाने का माहौल बना है। इससे इस बार मिट्टी के दीयों की बिक्री बढ़ने की उम्मीद है। दीपावली पर मिट्टी के दीये में तेल जलाना शुभ माना जाता है। ऐसे में लोगों को अपने घरों में मिट्टी के दीये जरूर जलाने चाहिए। उन्होंने सरकार से भी लुप्त होती माटी की कला और इससे जुड़े कारीगरों को बचाने के लिए प्रयास करने की अपील की।

कारीगरों का कहना है कि पहले दीपावली पर लोग बड़ी संख्या में मिट्टी के दीये खरीदकर घरों को रोशन करते थे, लेकिन अब सजावट के लिए बिजली की झालरों और चाइनीज लाइटों का चलन बढ़ गया है। इससे पारंपरिक दीयों की मांग घटी है। कुम्हारों की अपील है कि लोग दीपावली पर मिट्टी के दीये खरीदें, ताकि माटी की खुशबू के साथ पुश्तैनी कला और कारीगरों का रोजगार भी कायम रह सके। हालांकि अभी तक बिक्री ने रफ्तार नहीं पकड़ी है। दीपावली में कुछ दिन शेष हैं, ऐसे में उन्हें त्योहार के नजदीक आने के साथ अच्छी ग्राहकी की उम्मीद है।

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हिन्दुस्थान समाचार / दिनेश

Livevns.news Desk
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