सरकार से निराश पशुपालक अब भगवान श्रीराम की शरण में: जंगल बचाने की पीड़ा लेकर किया अयोध्या कूच

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सरकार से निराश पशुपालक अब भगवान श्रीराम की शरण में: जंगल बचाने की पीड़ा लेकर किया अयोध्या कूच


जयपुर, 17 अप्रैल (हि.स.)। पश्चिमी राजस्थान की तपती रेत से उठी पशुपालकों और किसानों की पीड़ा अब आस्था के द्वार तक पहुंचने जा रही है। तनोट माता मंदिर से 21 जनवरी को शुरू हुई ओरण-गोचर भूमि बचाने की पदयात्रा तीन माह का सफर तय कर जयपुर पहुंची है। सैकड़ों पशुपालक और किसान इस यात्रा के जरिए अपनी पारंपरिक जमीनों और जल स्रोतों को बचाने की मांग उठा रहे हैं, लेकिन लगातार मिल रहे आश्वासनों के बाद भी ठोस कार्रवाई नहीं होने से अब उन्होंने भगवान श्रीराम अयोध्या की शरण में जाने का निर्णय लिया है।

पद यात्रियों की मुख्य मांग ओरण देव वन, गोचर भूमि, तालाब, खड़ीन, आगोर और प्राचीन कुओं को राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज कराने की है। उनका कहना है कि ये संसाधन केवल जमीन का हिस्सा नहीं, बल्कि उनकी आजीविका, संस्कृति और आने वाली पीढ़ियों का आधार हैं।

ओरण बचाओ यात्री सुमेर सिंह और भोपाल सिंह ने बताया कि उन्होंने अपनी मांगों को लेकर प्रशासन और सरकार के सामने कई बार गुहार लगाई, लेकिन हर बार केवल आश्वासन ही मिला। तीन माह की इस लंबी यात्रा के बावजूद अब तक कोई ठोस निर्णय सामने नहीं आया है।

उन्होंने कहा कि सरकारी उदासीनता के कारण जैसलमेर जिले में लाखों पशुओं के लिए प्राकृतिक चारागाहों पर संकट गहराता जा रहा है। यदि समय रहते इन भूमि और जल स्रोतों को संरक्षित नहीं किया गया, तो पशुधन और ग्रामीण जीवन पर गंभीर असर पड़ेगा।

अब यह पदयात्रा जयपुर से अयोध्या के लिए रवाना होगी, जहां पदयात्री भगवान श्रीराम के समक्ष अपनी पीड़ा का ज्ञापन प्रस्तुत करेंगे। पद यात्रियों का कहना है कि जब शासन-प्रशासन से उम्मीद टूटने लगती है तो आस्था ही अंतिम सहारा बनती है।

उन्होंने कहा कि हम जंगल बचाने निकले हैं,क्योंकि यही हमारे जीवन का आधार है। जब हमारी बात सरकार तक नहीं पहुंची तो अब हम राम दरबार में अपनी फरियाद लेकर जाएंगे। पदयात्रियों ने चेतावनी दी है कि यदि अयोध्या यात्रा के बाद भी उनकी मांगों पर कार्रवाई नहीं होती है तो वे जैसलमेर लौटकर बड़े स्तर पर आंदोलन शुरू करेंगे। यह पदयात्रा अब केवल मांगों तक सीमित नहीं रही,बल्कि यह उस संघर्ष का प्रतीक बन गई है, जिसमें एक ओर विकास की दौड़ है और दूसरी ओर प्रकृति, परंपरा और आजीविका को बचाने की जंग है।

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हिन्दुस्थान समाचार / दिनेश

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