भव सागर में तरण को पुस्तक का भव्य विमोचन

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भव सागर में तरण को पुस्तक का भव्य विमोचन


जयपुर, 19 मार्च (हि.स.)। कांवड़ यात्रा के आध्यात्मिक, अनुभूति-आधारित एवं आत्मचिंतन से जुड़े अनुभवों को शब्दों में पिरोती लेखक सतीश गौतम की पुस्तक “भव सागर में तरण को” का विमोचन गुरुवार को राजस्थान प्रौढ़ शिक्षण समिति, झालाना के सभागार में सम्पन्न हुआ। इस कार्यक्रम का आयोजन ग्रासरूट मीडिया फाउंडेशन द्वारा किया गया। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में वरिष्ठ रंगकर्मी गोपाल आचार्य उपस्थित रहे, जबकि अध्यक्षता संत योगी रमणनाथ ने की।

कार्यक्रम की शुरुआत भाल भूषण द्वारा बांसुरी पर प्रस्तुत भजन “मैली चादर ओढ़ के” से हुई, जिसने पूरे वातावरण को आध्यात्मिकता और भावपूर्ण ऊर्जा से सराबोर कर दिया।

अपने संबोधन में गोपाल आचार्य ने कहा कि कांवड़ यात्रा केवल बाहरी यात्रा नहीं, बल्कि एक गहन आंतरिक यात्रा भी है। उन्होंने कहा, “सबसे बड़ी यात्रा सांस की है और सच्ची कृति वही होती है जो पाठक को अपने साथ यात्रा पर ले जाए। उन्होंने यह भी कहा कि “प्रदर्शन से पहले दर्शन जरूरी है,” अर्थात अनुभव की गहराई ही किसी रचना को सार्थक बनाती है।

लेखक सतीश गौतम ने अपने विचार व्यक्त करते हुए बताया कि उन्होंने किशोरावस्था से कांवड़ यात्रा प्रारंभ की और लगभग 8000 किलोमीटर की यात्रा के अनुभवों को इस पुस्तक में संजोया है। उन्होंने इसे ऐसी अनुभूति बताया, जिसे पूरी तरह शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता, बल्कि महसूस किया जा सकता है। उन्होंने यह भी बताया कि व्यक्तिगत जीवन के गहरे अनुभव, विशेषकर पत्नी कुसुमलता के निधन के बाद, इस कृति का प्रकाशन उनके लिए एक भावनात्मक और आत्मिक पड़ाव रहा।

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हिन्दुस्थान समाचार / दिनेश

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