अजमेर नगर निगम में 36 साल का भाजपा वर्चस्व टूटा, कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी; निर्दलीयों के हाथ में सत्ता की चाबी

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अजमेर नगर निगम में 36 साल का भाजपा वर्चस्व टूटा, कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी; निर्दलीयों के हाथ में सत्ता की चाबी


अजमेर, 14 सितंबर (हि.स.)। अजमेर नगर निगम चुनाव 2026 के परिणामों ने शहर की राजनीति में बड़ा उलटफेर कर दिया है। पिछले 36 वर्षों से नगर निगम की सत्ता पर काबिज भाजपा इस बार बहुमत के आंकड़े से दूर रह गई, जबकि कांग्रेस ने शानदार प्रदर्शन करते हुए सबसे बड़ी पार्टी का दर्जा हासिल कर लिया। 80 वार्डों में कांग्रेस ने 37 सीटों पर जीत हासिल की, जबकि भाजपा 32 वार्डों तक सिमट गई। निर्दलीय प्रत्याशियों ने 11 वार्डों में जीत दर्ज कर चुनावी तस्वीर को त्रिकोणीय बना दिया। किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलने से अब नगर निगम का अगला बोर्ड बनाने की निर्णायक भूमिका निर्दलीय पार्षदों के हाथों में आ गई है।

अजमेर नगर निगम में भाजपा के लंबे समय से चले आ रहे बोर्ड के सामने इस चुनाव में सत्ता बचाने की चुनौती थी। पिछली बार भाजपा के 48 पार्षद जीतकर आए थे, जबकि कांग्रेस के खाते में केवल 18 सीटें थीं। एक सीट आरएलपी और 13 सीटें निर्दलीयों के पास थीं। इस बार भाजपा की सीटें घटकर 32 रह गईं, जबकि कांग्रेस ने 37 सीटों के साथ बढ़त बना ली। आंकड़ों के लिहाज से भाजपा को पिछली बार की तुलना में 16 सीटों का नुकसान हुआ है, वहीं कांग्रेस को 19 सीटों का फायदा मिला है। यह बदलाव केवल सीटों का अंतर नहीं, बल्कि अजमेर की शहरी राजनीति में बदलते जनादेश का संकेत भी माना जा रहा है।

नगर निगम में बहुमत के लिए 41 पार्षदों का समर्थन आवश्यक है। कांग्रेस 37 सीटों के साथ बहुमत से चार कदम दूर है, जबकि भाजपा को बोर्ड बनाने के लिए नौ पार्षदों का समर्थन जुटाना होगा। 11 निर्दलीय पार्षदों की मौजूदगी ने सत्ता की चाबी उनके हाथों में पहुंचा दी है। ऐसे में आने वाले दिनों में समर्थन जुटाने, राजनीतिक बातचीत और पार्षदों को अपने पक्ष में करने की कोशिशें तेज होने की संभावना है।

कांग्रेस की स्थिति इसलिए मजबूत मानी जा रही है क्योंकि वह भाजपा से पांच सीटें आगे है। कांग्रेस प्रवक्ता शैलेष गुप्ता ने दावा किया है कि अधिकांश निर्दलीय पार्षद कांग्रेस को समर्थन दे रहे हैं और पार्टी का बोर्ड बनने का रास्ता साफ है। हालांकि, अंतिम तस्वीर समर्थन के औपचारिक निर्णय और महापौर चुनाव की प्रक्रिया के बाद ही स्पष्ट होगी। भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने परंपरागत जनाधार को संभालने के साथ निर्दलीयों का समर्थन हासिल करना है।

अजमेर के परिणामों को भाजपा के लिए इसलिए भी बड़ा झटका माना जा रहा है, क्योंकि चुनाव में विधानसभा अध्यक्ष वासुदेव देवनानी और विधायक अनिता भदेल की प्रतिष्ठा भी दांव पर थी। भाजपा के कई पदाधिकारी और प्रमुख चेहरे अपने वार्डों में चुनाव हार गए। वार्ड 78 में भाजपा जिला मोर्चा अध्यक्ष एवं पूर्व पार्षद भारती श्रीवास्तव को कांग्रेस के हामिद खान ने 331 मतों से हराया। वार्ड 65 में भाजपा मंडल अध्यक्ष रचित कच्छावा को कांग्रेस के नौरत गुर्जर के हाथों 252 मतों से हार का सामना करना पड़ा। इन परिणामों ने यह सवाल खड़ा किया है कि क्या भाजपा का संगठनात्मक प्रभाव शहर के सभी हिस्सों में पहले जैसा नहीं रहा।

चुनाव में भाजपा से बगावत कर मैदान में उतरे प्रत्याशियों ने भी पार्टी के सामने चुनौती खड़ी की।

वार्ड 74 से भाजपा की बागी प्रत्याशी रूबी जैन ने निर्दलीय के रूप में जीत हासिल की। इसी तरह वार्ड 4 में कांग्रेस से भाजपा में आईं मोनिका जैन ने जीत दर्ज की, जबकि पूर्व मेयर और भाजपा छोड़ चुके धर्मेंद्र गहलोत की पत्नी हेमा गहलोत को हार मिली। वार्ड 59 में पूर्व सभापति सुरेंद्र सिंह शेखावत की पत्नी मधु शेखावत को कांग्रेस की बबीता चौहान ने पराजित किया। मधु शेखावत को महापौर पद की प्रबल दावेदार माना जा रहा था। इन उलटफेरों ने भाजपा के भीतर टिकट वितरण, स्थानीय समीकरणों और बागी उम्मीदवारों के प्रभाव को चर्चा में ला दिया है।

कांग्रेस के प्रदर्शन को केवल भाजपा विरोधी लहर के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा। 37 वार्डों में जीत यह संकेत देती है कि पार्टी ने शहर के विभिन्न क्षेत्रों में अपना जनाधार मजबूत किया है।

कांग्रेस कार्यकर्ताओं में परिणामों के बाद उत्साह देखने को मिला और जगह-जगह जश्न मनाया गया। पार्टी के लिए यह जीत लंबे समय बाद नगर निगम की सत्ता में वापसी का अवसर लेकर आई है। हालांकि, अब उसके सामने चुनावी जीत को स्थायी प्रशासनिक समर्थन में बदलने की चुनौती होगी।

अजमेर नगर निगम चुनाव का सबसे बड़ा राजनीतिक संदेश यही है कि इस बार जनता ने किसी एक दल को पूर्ण बहुमत नहीं दिया। भाजपा और कांग्रेस दोनों को निर्दलीयों की जरूरत पड़ सकती है। निर्दलीय पार्षदों की मांगें, उनके राजनीतिक झुकाव और समर्थन का निर्णय आने वाले बोर्ड की दिशा तय करेंगे। कांग्रेस का दावा है कि अधिकांश निर्दलीय उसके साथ हैं, लेकिन भाजपा भी सत्ता की दौड़ से बाहर नहीं है। ऐसे में अगले कुछ दिन अजमेर की राजनीति के लिए बेहद महत्वपूर्ण होंगे।

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हिन्दुस्थान समाचार / रोहित

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