आयुर्वेद विश्वविद्यालय : बाल पंचकर्म पाठ्यक्रम में करवाया प्रायोगिक कर्माभ्यास

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आयुर्वेद विश्वविद्यालय : बाल पंचकर्म पाठ्यक्रम में करवाया प्रायोगिक कर्माभ्यास


जोधपुर, 1 दिसंंंबरर (हि.स.)। डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन राजस्थान आयुर्वेद विश्वविद्यालय में स्नातकोत्तर कौमारभृत्य विभाग द्वारा संचालित एक माह का सेमी ऑनलाइन बाल पंचकर्म पाठ्यक्रम शुरू किया गया था। जिसके अंतर्गत ऑफलाइन हैंड्स ऑफ ट्रेनिंग के क्रम में मुख्य वक्ता डॉ चन्द्रांशु शुक्ला ने प्रतिभागियों को विभिन्न पंचकर्म क्रियाओं के बारे मे बताया।

कुलगुरू गोविंद सहाय शुक्ल ने बताया कि पत्र पिंड स्वेद की पोटली में किन औषधियों का चयन करना चाहिए एवं किस प्रकार से पोटली को बनाना चाहिए एवं उसका उपयोग दोषों की तर तम कल्पना के आधार पर वैद्य को युक्ति प्रकार करना चाहिए, बालकों में इस प्रकार के स्वेदन करते समय उनके व्यापदों के निराकरण की चिकित्सा भी वैद्य को पता होना चाहिए, स्वेदन से मुख्यता डीहाइड्रेशन होने से बालक को बचाना चाहिए।

वैद्य चन्द्रांशु ने प्रतिभागियों को उपनाह कर्म के बारे में भी हैंड्स ऑफ ट्रेनिंग दिया। कार्यक्रम के अंतर्गत द्वितीय सेशन में डॉ चन्द्रांशु ने प्रतिभागियों को सेमिनार हॉल में वमन और विरेचन पर व्याख्यान दिया और बताया कि आज जब जीवनशैली और पर्यावरणीय कारकों के कारण बच्चों के स्वास्थ्य से संबंधित समस्याएं, जैसे रोग प्रतिरोधक क्षमता में कमी, पाचन संबंधी विकार,बाल पंचकर्म चिकित्सा से न्यूरोमोटर डिजिज जैसे सेरेब्रल पालिसी, डीएमडी, आटिज्म, एडीएचडी आदि व्याधियों में लाभ मिलता है और न्यूरो-डेवलपमेंटल की चुनौतियां दिनोदिन बढ़ रही हैं, तब बालपंचकर्म की पद्धतियाँ एक आशा की किरण के रूप में सामने आती हैं।

कार्यक्रम में पीजीआईए के निदेशक प्रोफेसर चंदन सिंह ने डॉ चन्द्रांशु का साफा एवं शॉल पहनाकर अभिनंदन किया। पाठ्यक्रम समन्वयक एवं विभागाध्यक्ष प्रोफेसर (डॉ.) हरीश कुमार सिंघल ने डॉ चन्द्रांशु का अभिनंदन किया। अंत में बाल पंचकर्म सर्टिफिकेट कोर्स के कोर्स कोआर्डिनेटर डॉ दिनेश कुमार राय ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया।

हिन्दुस्थान समाचार / सतीश

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