अजमेर की मुस्लिम महिला को सुप्रीम कोर्ट दी राहत, 20 हजार रुपए मिलेगा गुजारा भत्ता

अजमेर की मुस्लिम महिला को सुप्रीम कोर्ट दी राहत, 20 हजार रुपए मिलेगा गुजारा भत्ता


अजमेर, 22 सितम्बर(हि.स.)। अजमेर की मुस्लिम महिला को सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत मिली है। अजमेर के राणा नाहिद मामले पर सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया। निचली अदालत में लंबित मामले के निपटारे होने तक मुस्लिम महिला के पति शाहिद हुक चिस्ती को गुजरा भत्ता देना पड़ेगा। सुप्रीम कोर्ट ने 20 हजार रुपए प्रति माह गुजरा भत्ता देने का आदेश किया। जस्टिस एसके कौल, जस्टिस अभय एस ओका, जस्टिस विक्रम नाथ की तीन जजों की बेंच ने यह आदेश दिया। आगे सुप्रीम कोर्ट तय करेगा कि क्या मुस्लिम महिला का मामला फैमली कोर्ट में सुन सकता है या नहीं। याचिकाकर्ता मुस्लिम महिला के लिए सुप्रीम कोर्ट के वकील सुनील कुमार सिंह ने पैरवी की। मामले की अगली सुनवाई अभी तय नहीं।

जानकारी के अनुसार 08 मार्च 1998 को एक मुस्लिम महिला राणा नाहिद ने अजमेर के शाहिदुल हक चिश्ती से शादी की। 16 अक्टूबर 2000 को उस विवाह से एक बच्चे का जन्म हुआ। बाद में पति ने 23 अपैल 2005 को मुस्लिम परंपरागत तरीके से पत्नी को तलाक दे दिया। इसलिए 24 मार्च 2008 को पत्नी ने सीआरपीसी की धारा 125 के तहत फैमिली कोर्ट अजमेर में भरण-पोषण का वाद दायर किया। पत्नी द्वारा दावा की गई कुल राशि 8500 प्रति माह थी। 08 दिसम्बर 2008 को फैमिली कोर्ट ने मुस्लिम महिला (तलाक पर अधिकार का संरक्षण) अधिनियम 1986 के तहत आवेदन स्वीकार कर लिया और बेटे के लिए 2000 रुपए प्रति माह भरण पोषण वयस्क हो जाने तक और पत्नी के लिए तीन लाख रुपए एकमुश्त रखरखाव के रूप में तय कर दिए। बाद में राजस्थान उच्च न्यायालय ने 28 जुलाई 2010 को पति की पुनरीक्षण याचिका को स्वीकार कर लिया और पत्नी के पुनरीक्षण को खारिज कर दिया और मजिस्ट्रेट के समक्ष मुस्लिम महिला (तलाक पर अधिकार का संरक्षण) अधिनियम 1986 की धारा 3 के तहत एक आवेदन दायर करने का आदेश दिया। 08 सितम्बर 2014 को राजस्थान उच्च न्यायालय की खंडपीठ ने अंतरिम भरण पोषण को 2000 से 7000 रुपए तय किए। हालांकि पति ने 2018 से भरण-पोषण देना बंद कर दिया। 2011 में पत्नी ने सर्वाेच्च न्यायालय के समक्ष एक अपील दायर की, जिस पर खंडपीठ ने 18 जून 2020 को असहमतिपूर्ण राय दी और मामला बड़ी पीठ को भेजा गया। 22 सितम्बर 2022 को मामला सर्वाेच्च न्यायालय की तीन न्यायाधीशों की खंडपीठ के समक्ष सूचीबद्ध किया गया जिसमें न्यायमूर्ति संजय किशन कौल, न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति अभय एस ओका शामिल थे। मामले की लंबी सुनवाई के बाद पीठ ने पत्नी के पक्ष में फैसला सुनाया और अंतरिम गुजारा भत्ता के रूप में एक लाख रुपये देने का आदेश दिया। 20 हजार प्रति माह, जब तक कि मामला निचली अदालत में लंबित न हो। इस मामले में यह भी तय होगा कि अगर कोई फैमिली कोर्ट मुस्लिम पत्नी से जुड़े मामलों की सुनवाई कर सकता है। मामले की पैरवी अधिवक्ता सुनील कुमार सिंह ने की। मामले की अगली सुनवाई की तारीख तय नहीं है।

हिन्दुस्थान समाचार/संतोष

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