दुर्गाबाड़ी में 15 से 20 अक्टूबर तक सजेगा बंगाल की संस्कृति का रंग

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दुर्गाबाड़ी में 15 से 20 अक्टूबर तक सजेगा बंगाल की संस्कृति का रंग


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जयपुर, 12 अक्टूबर (हि.स.)। बनीपार्क स्थित जयपुर दुर्गाबाड़ी में 15 से 20 अक्टूबर तक शारदीय दुर्गा पूजा का आयोजन बंगाली रीति-रिवाजों,धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक परंपराओं के अनुरूप किया जाएगा। पिछले 70 वर्षों से यहां दुर्गा पूजा का आयोजन हो रहा है। यह आयोजन जयपुर में बंगाली समाज की सांस्कृतिक विरासत और सामाजिक एकता का प्रतीक बन चुका है। इस बार भी दुर्गाबाड़ी परिसर में बंगाल की कला, शिल्प, संगीत, खान-पान और धार्मिक परंपराओं की झलक देखने को मिलेगी।

जयपुर दुर्गाबाड़ी एसोसिएशन के अध्यक्ष डॉ. सुदीप्तो सेन ने बताया कि बंगाल की दुर्गा पूजा को यूनेस्को ने अमूर्त सांस्कृतिक विरासत के रूप में मान्यता दी है। इसी विरासत को जयपुर में जीवंत करने के उद्देश्य से पूजा के दौरान पारंपरिक अनुष्ठानों के साथ सांस्कृतिक कार्यक्रम भी आयोजित किए जाएंगे।

दुर्गाबाड़ी की प्रमुख विशेषता वियतनाम से लाए गए उत्कृष्ट पत्थर से बनी मां दुर्गा की लगभग 16 फीट ऊंची स्थायी प्रतिमा है। जयपुर के कुशल शिल्पकारों ने इस भव्य प्रतिमा को तैयार किया था। यह प्रतिमा दुर्गाबाड़ी की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक धरोहर है। इसके साथ ही इस वर्ष बंगाल की पारंपरिक मिट्टी से बनी प्रतिमा का भी विधिवत पूजन किया जाएगा।

मिट्टी की प्रतिमा का निर्माण कोलकाता के प्रसिद्ध कुम्हार टोली से आए कारीगर दुर्गाबाड़ी परिसर में कर रहे हैं। बंगाल की परंपरा में मां दुर्गा की प्रतिमा बनाने के लिए गंगा की पवित्र मिट्टी का विशेष महत्व माना जाता है। समावेशी परंपरा के भाव के अनुरूप इस बार बंगाल से लाई गई गंगा की मिट्टी और राजस्थान की बालू को मिलाकर प्रतिमा तैयार की जा रही है। यह बंगाल और राजस्थान की सांस्कृतिक परंपराओं के संगम का प्रतीक होगी।

दुर्गा पूजा के लिए बंगाल से आए करीब 50 कुशल कारीगर भव्य प्रवेश द्वार और पंडाल तैयार कर रहे हैं। पंडाल की सजावट में बंगाल की पारंपरिक कला और शिल्प की झलक देखने को मिलेगी। पूजा के दौरान श्रद्धालुओं के लिए खिचड़ी, लबरा, टमाटर की चटनी और खीर सहित पारंपरिक बंगाली भोग-प्रसाद की व्यवस्था रहेगी। आयोजकों के अनुसार पूजा के दिनों में हजारों श्रद्धालुओं को प्रसाद वितरित किया जाएगा। संध्या आरती और श्रृंगार दर्शन के दौरान बंगाली महिलाएं पारंपरिक धुनुची नृत्य प्रस्तुत करेंगी। इस नृत्य में संगीत, लय और धार्मिक आस्था का संगम देखने को मिलेगा।

उन्हाेंने बताया कि 15 अक्टूबर को महाषष्ठी के अवसर पर मां दुर्गा के आगमन, बोधन, आमंत्रण और अधिवास के साथ उत्सव की शुरुआत होगी। 16 अक्टूबर को विधिवत पूजा-अर्चना, आरती, श्रृंगार दर्शन और पारंपरिक धार्मिक कार्यक्रम होंगे।

17 अक्टूबर को महासप्तमी पर पूजा, पुष्पांजलि और आरती के साथ संध्या में श्रृंगार दर्शन और धुनुची नृत्य होगा। इसी दिन रात 9 बजे विशेष अभिनंदन एवं सम्मान समारोह आयोजित किया जाएगा। 18 अक्टूबर को महाअष्टमी पर विशेष पूजा, पुष्पांजलि और अन्य पारंपरिक अनुष्ठान होंगे। श्रद्धालुओं के लिए भोग-प्रसाद की व्यवस्था भी रहेगी।

19 अक्टूबर को महानवमी की पूजा और विशेष आरती होगी। शाम को श्रृंगार दर्शन, धुनुची नृत्य और पारंपरिक बंगाली भोग-प्रसाद वितरण किया जाएगा। 20 अक्टूबर को विजयादशमी पर पारंपरिक सिंदूर उत्सव होगा। इस दौरान महिलाएं मां दुर्गा को सिंदूर अर्पित कर विदाई देंगी और एक-दूसरे को सिंदूर लगाकर सुख-समृद्धि की कामना करेंगी। इसके बाद मिट्टी की प्रतिमा का विसर्जन किया जाएगा।

आयोजकों ने बताया कि दुर्गाबाड़ी का यह आयोजन केवल धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित नहीं है, बल्कि बंगाल की कला, संस्कृति, खान-पान और सामाजिक समरसता को जयपुर में प्रस्तुत करने का अवसर भी है। इस दौरान शहर के श्रद्धालुओं, कला एवं संस्कृति प्रेमियों और आम नागरिकों का स्वागत किया जाएगा।

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हिन्दुस्थान समाचार / दिनेश

Livevns.news Desk
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