जैन साध्वी बनने के फैसले पर अड़ी 20 वर्षीय युवती, विरोध के बावजूद बनेगी संन्यासी

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जैन साध्वी बनने के फैसले पर अड़ी 20 वर्षीय युवती, विरोध के बावजूद बनेगी संन्यासी


इंदौर, 10 सितंबर (हि.स.)। मध्य प्रदेश के इंदौर में 20 वर्षीय युवती के जैन साध्वी बनने के फैसले को लेकर परिवार और युवती के बीच मतभेद का मामला मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की इंदौर खंडपीठ तक पहुंच गया। युवती श्वेतांबर जैन धर्म से प्रभावित होकर सांसारिक जीवन त्यागकर दीक्षा लेना चाहती है, जबकि उसके माता-पिता और रिश्तेदार इसके पक्ष में नहीं हैं। मामले की सुनवाई के बाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि बालिग नागरिक को अपनी पसंद के धर्म और जीवनशैली का पालन करने का संवैधानिक अधिकार है।

युवती ने मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय में दायर याचिका में बताया कि वह श्वेतांबर जैन धर्म से प्रभावित है और संन्यासी जीवन अपनाना चाहती है। वह जैन साध्वी के रूप में दीक्षा लेकर अपना जीवन धार्मिक मार्ग पर आगे बढ़ाना चाहती है। हालांकि, परिवार इस निर्णय का लगातार विरोध कर रहा है।

युवती की ओर से न्यायालय के समक्ष यह आशंका भी जताई गई कि परिवार के सामाजिक प्रभाव के चलते उसकी धार्मिक स्वतंत्रता, व्यक्तिगत आचरण और आवाजाही पर रोक लगाई जा सकती है। इसी को लेकर उसने न्यायालय से अपने अधिकारों की सुरक्षा की मांग की थी।

बालिग की पसंद में हस्तक्षेप नहीं कर सकता कोई

मामले की सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति संदीप एन. भट्ट ने कहा कि संविधान प्रत्येक बालिग नागरिक को अपनी पसंद के धर्म और जीवनशैली का पालन करने का अधिकार देता है। न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति की धार्मिक स्वतंत्रता में किसी को बाधा बनने की अनुमति नहीं दी जा सकती।

न्यायालय ने युवती को निर्देश दिया कि यदि उसे अपने अधिकारों की रक्षा के लिए आवश्यकता महसूस होती है तो वह स्थानीय पुलिस अधीक्षक और थाना प्रभारी को आवेदन दे सकती है। पुलिस को ऐसे आवेदन पर नियमानुसार तत्काल कार्रवाई करने के निर्देश दिए गए हैं।

माता-पिता की भावनाओं पर जताई सहानुभूति

सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति भट्ट ने युवती के माता-पिता की पीड़ा और भावनाओं के प्रति पूर्ण सहानुभूति व्यक्त की। हालांकि न्यायालय ने साथ ही कहा कि माता-पिता की भावनाओं का सम्मान अपनी जगह है, लेकिन कानूनन किसी बालिग व्यक्ति की धार्मिक स्वतंत्रता में हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता। बालिग नागरिक को प्राप्त अधिकारों से समझौता नहीं किया जा सकता।

बताया गया है कि मध्य प्रदेश में पहले भी कम उम्र के युवक-युवतियों ने परिवार की सहमति से जैन दीक्षा ग्रहण की है। कुछ मामलों में परिवार के सदस्यों ने एक साथ भी दीक्षा ली है। ऐसे में इंदौर की 20 वर्षीय युवती का मामला इसलिए चर्चा में है क्योंकि वह स्वयं दीक्षा लेने के लिए तैयार है, जबकि उसके परिवार के सदस्य उसके निर्णय का विरोध कर रहे हैं।

उच्च न्यायालय के रुख के बाद अब युवती के लिए जैन साध्वी बनने की दिशा में आगे बढ़ने का रास्ता खुल गया है। वहीं, परिवार के विरोध के बावजूद बालिग की धार्मिक स्वतंत्रता और व्यक्तिगत पसंद को लेकर न्यायालय की टिप्पणी इस मामले का अहम पक्ष बन गई है।

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हिन्दुस्थान समाचार / राजू विश्वकर्मा

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