अनूपपुर: भाई की आंखों की रोशनी गई तो बहन ने जीवन कर दिया समर्पित

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अनूपपुर: भाई की आंखों की रोशनी गई तो बहन ने जीवन कर दिया समर्पित


18 साल से आंगनवाड़ी में सेवा कर रही मीना ने नहीं की शादी, भाई की देखरेख को बनाया जीवन का उद्देश्य

अनूपपुर , 28 अगस्त (हि.स.)। मध्य प्रदेश के अनूपपुर जिले के अमरकंटक में रक्षाबंधन पर्व भाई-बहन के अटूट प्रेम और समर्पण का पर्व है। इस रिश्ते की मिसाल पेश करने वाली एक बहन की कहानी सामने आई है, जिसने अपने दृष्टिबाधित भाई की देखरेख और परिवार की जिम्मेदारियों के लिए अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया। वार्ड क्रमांक 9 की आंगनवाड़ी कार्यकर्ता मीना सोनवानी (43) ने भाई मुन्नालाल सोनवानी (51) की आंखों की रोशनी जाने के बाद उनकी जिम्मेदारी संभाली और आज तक विवाह नहीं किया।

पढ़ाई के दौरान कमजोर हुई आंखों की रोशनी

मुन्नालाल जब कक्षा दसवीं में पढ़ते थे, तब उन्हें आंखों से कम दिखाई देने की शिकायत शुरू हुई। इसके बावजूद उन्होंने किसी तरह 12वीं तक पढ़ाई पूरी की, लेकिन इसके बाद उनकी आंखों की रोशनी पूरी तरह चली गई। परिवार ने इलाज के लिए चेन्नई सहित देश के कई बड़े नेत्र अस्पतालों के चक्कर लगाए। चिकित्सकों ने जांच के बाद बताया कि आंख की नस सूख जाने के कारण अब उनकी दृष्टि लौटना संभव नहीं है।

भाई का विवाह कराया, परिवार भी संभाला

भाई की स्थिति को देखते हुए मीना ने उनके साथ जीवनभर खड़े रहने का निर्णय लिया। उन्होंने न केवल भाई की देखरेख की बल्कि उनका विवाह भी कराया। वर्तमान में मुन्नालाल के एक बेटा और एक बेटी हैं। बेटी कक्षा 12वीं में तथा बेटा कक्षा 9वीं में अध्ययनरत है। परिवार में माता-पिता भी साथ रहते हैं। पिता हिंडालको कंपनी से सेवानिवृत्त हो चुके हैं। एक अन्य बहन का विवाह हो चुका है।

कहा- जिम्मेदारियों के बीच शादी के बारे में सोचने का समय ही नहीं मिला

मीना सोनवानी ने एमए और बीएड तक शिक्षा प्राप्त की है। वर्ष 2008 से वह अमरकंटक में आंगनवाड़ी कार्यकर्ता के रूप में सेवाएं दे रही हैं। विवाह नहीं करने के सवाल पर वह सहजता से कहती हैं कि परिवार और भाई की जिम्मेदारियों में इतना समय निकल गया कि अपने विवाह के बारे में सोचने का अवसर ही नहीं मिला।

मीना के लिए रक्षाबंधन केवल भाई की कलाई पर राखी बांधने का दिन नहीं, बल्कि उस रिश्ते के प्रति निभाई गई जिम्मेदारी की याद भी है। भाई की आंखों की रोशनी भले ही चली गई, लेकिन बहन का यह समर्पण उनके जीवन में आज भी उम्मीद और सहारे की रोशनी बना हुआ है।

हिन्दुस्थान समाचार / राजेश शुक्ला

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