जबलपुर : अशोक सिंघल की जन्म शताब्दी पर जबलपुर में भव्य आयोजन, राम मंदिर को बताया सांस्कृतिक स्वाभिमान का प्रतीक

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जबलपुर : अशोक सिंघल की जन्म शताब्दी पर जबलपुर में भव्य आयोजन, राम मंदिर को बताया सांस्कृतिक स्वाभिमान का प्रतीक


जबलपुर, 02 अक्टूबर (हि.स.)। श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन से जुड़े प्रमुख नेता और विश्व हिंदू परिषद के मार्गदर्शक रहे श्रद्धेय अशोक सिंघल की जन्म शताब्दी वर्ष के अवसर पर विश्व हिंदू परिषद, महाकौशल प्रांत की ओर से शुक्रवार को मानस भवन, राइट टाउन में भव्य कार्यक्रम आयोजित किया गया। कार्यक्रम में संत-महात्माओं, विहिप पदाधिकारियों, कार्यकर्ताओं और बड़ी संख्या में आमजन ने भाग लिया।

कार्यक्रम का शुभारंभ भगवान श्रीराम की पूजा-अर्चना और दीप प्रज्ज्वलन से हुआ। इस अवसर पर अखिलेश्वरानंद महाराज, कालीनंद महाराज और पागलानंद महाराज सहित संत समाज की उपस्थिति रही।

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रांत संघचालक डॉ. प्रदीप दुबे रहे। मुख्य वक्ता विश्व हिंदू परिषद के केंद्रीय मंत्री अशोक तिवारी ने अशोक सिंघल के आध्यात्मिक व्यक्तित्व, संगठनात्मक भूमिका, सेवा कार्यों और सामाजिक समरसता के प्रयासों को स्मरण किया।

विशिष्ट अतिथियों में राज्यसभा सांसद सुमित्रा वाल्मीक, जबलपुर महापौर जगत बहादुर सिंह, ग्लोबल ग्रुप के चेयरमैन सौरभ बड़ेरिया और विहिप के क्षेत्र संगठन मंत्री राजाराम शामिल रहे। विहिप के प्रांत अध्यक्ष सुनील भागचंदानी, प्रांत मंत्री उमेश माधव मिश्र और प्रांत संगठन मंत्री जितेंद्र वर्मा सहित अनेक पदाधिकारी एवं कार्यकर्ता उपस्थित रहे।

मुख्य वक्ता अशोक तिवारी ने कहा कि अशोक सिंघल मूलतः आध्यात्मिक व्यक्तित्व थे। उन्होंने अपनी आध्यात्मिक साधना को समाज और राष्ट्र के कार्य से जोड़ा तथा संगठन के माध्यम से व्यापक सांस्कृतिक और धार्मिक चेतना जगाने का प्रयास किया।

उन्होंने कहा कि दिल्ली प्रांत प्रचारक के रूप में सिंघल ने संघ कार्यकर्ताओं को सेवा कार्यों से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। आगे चलकर सेवा कार्यों का विस्तार सेवा भारती जैसे संगठनों के माध्यम से हुआ। ग्रामीण और दुर्गम क्षेत्रों में शिक्षा पहुंचाने के लिए एकल विद्यालय की अवधारणा को आगे बढ़ाने में भी उनकी भूमिका रही।

अशोक तिवारी ने कहा कि अशोक सिंघल सामाजिक समरसता को विशेष महत्व देते थे। उन्होंने समाज के वंचित और शोषित वर्गों के ऐतिहासिक योगदान को सामने लाने के प्रयास किए।

उन्होंने 1989 में श्रीराम जन्मभूमि शिलान्यास के अवसर पर अनुसूचित वर्ग से आने वाले कामेश्वर चौपाल से प्रथम ईंट रखवाए जाने का उल्लेख करते हुए इसे सामाजिक समरसता का संदेश बताया।

मुख्य वक्ता ने कहा कि अशोक सिंघल ने श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन के साथ अविरल एवं निर्मल गंगा, रामसेतु और गो-रक्षा जैसे विषयों से जुड़े आंदोलनों में भी भूमिका निभाई। युवाओं को संगठन से जोड़ने के लिए बजरंग दल तथा महिलाओं की सहभागिता बढ़ाने के लिए मातृशक्ति और दुर्गा वाहिनी जैसे संगठनात्मक आयामों को मजबूत करने में भी उनका योगदान रहा।

उन्होंने कहा कि अशोक सिंघल भारतीय संस्कृति और वैदिक ज्ञान के प्रति समर्पित थे। बीएचयू में वैदिक साइंस रिसर्च की स्थापना के लिए उन्होंने प्रयास किए। गो-सेवा और भारतीय परंपराओं के प्रति उनकी आस्था उनके निजी जीवन में भी दिखाई देती थी।

अशोक तिवारी ने कहा कि बड़े संगठनात्मक दायित्वों के बावजूद अशोक सिंघल का जीवन सादगीपूर्ण रहा। वे अपने विचारों को सार्वजनिक मंचों पर निर्भीकता से रखते थे। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय मीडिया संस्थानों के समक्ष भारतीय संस्कृति और अपने विचारों को स्पष्ट रूप से रखने का भी उल्लेख किया।

अशोक तिवारी ने कहा कि राम जन्मभूमि मंदिर केवल एक ढांचा नहीं है, बल्कि समाज के स्वाभिमान और भगवान श्रीराम के जीवन मूल्यों की पुनर्स्थापना का प्रतीक है। उनके अनुसार राम जन्मभूमि आंदोलन ने समाज में आत्मगौरव, सांस्कृतिक चेतना और अपनी परंपराओं के प्रति सम्मान की भावना को मजबूत किया।

उन्होंने कहा कि अशोक सिंघल ने आध्यात्मिकता, संगठन, सेवा, सामाजिक समरसता और सांस्कृतिक जागरण को अपने जीवन के कार्यों से जोड़ा। उनका जीवन और कार्य आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का विषय रहेगा।

कार्यक्रम के अंत में संत-महात्माओं और अतिथियों का सम्मान किया गया। कार्यक्रम में विहिप के क्षेत्र, प्रांत, विभाग, जिला, प्रखंड और खंड स्तर के पदाधिकारियों-कार्यकर्ताओं के साथ मातृशक्ति, दुर्गावाहिनी तथा बड़ी संख्या में आमजन मौजूद रहे।

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हिन्दुस्थान समाचार / विलोक पाठक

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