अनूपपुर: 108 दंडवत प्रणाम कर लगा रहे मां नर्मदा परिक्रमा, 85 दिनों में मात्र साढ़े तीन किमी की यात्रा

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अनूपपुर: 108 दंडवत प्रणाम कर लगा रहे मां नर्मदा परिक्रमा, 85 दिनों में मात्र साढ़े तीन किमी की यात्रा


अनूपपुर, 05 जून (हि.स.)। मध्य प्रदेश के अनूपपुर जिले की धार्मिक एवं आध्यात्मिक पवित्र नगरी अमरकंटक में एक साधक की कठिन तपस्या और अटूट श्रद्धा का अद्भुत दृश्य श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। मां नर्मदा परिक्रमा के कठिन संकल्प के साथ निकले दंडवत महाराज वनमार्ग एवं दुर्गम रास्तों से गुजरते हुए दंडवत प्रणाम कर अपनी यात्रा आगे बढ़ा रहे हैं।

उनकी इस कठिन साधना, त्याग और हठयोग को देखकर लोग आश्चर्यचकित होने के साथ-साथ श्रद्धा से नतमस्तक हो रहे हैं। 5 मार्च को अमरकंटक के माई की बगिया से दंडवत नर्मदा परिक्रमा प्रारंभ की थी। जो शुक्रवार 5 जून को कपिला संगम तक पहुचे हैं। 85 दिनों की कठिन साधना के बाद भी वह मात्र लगभग साढ़े तीन किलोमीटर की दूरी ही तय कर सके।

दंडवत महाराज परिक्रमा के दौरान एक बार में 108 दंडवत प्रणाम करते हैं। प्रत्येक दंडवत के साथ वे मां नर्मदा का स्मरण करते हुए लगभग साढ़े सात फुट आगे बढ़ते हैं और फिर पुनः दंडवत लगाकर यात्रा जारी रखते हैं। यह क्रम लगातार चलता रहता है। उनकी दंडवत परिक्रमा यात्रा प्रतिदिन प्रातः 5 बजे से प्रारंभ होकर सायं 6 बजे तक अनवरत चलती रहती है। यात्रा के दौरान वे मौन व्रत का पालन करते हैं तथा किसी से बातचीत नहीं करते। श्रद्धालु जो भी फलाहार या अन्य सामग्री श्रद्धापूर्वक अर्पित करते हैं, उसे स्वीकार कर लेते हैं, किंतु स्वयं किसी से कुछ नहीं मांगते। उनकी यह साधना अटूट आस्था, अनुशासन और पूर्ण समर्पण का परिचायक है।

दंडवत महाराज रायसेन जिले के उदयपुरा क्षेत्र के समीप स्थित एक आश्रम से जुड़े हुए हैं तथा वैष्णव संप्रदाय से दीक्षित हैं। उन्होंने 5 मार्च 2026 को मां नर्मदा की माई की बगिया से दंडवत नर्मदा परिक्रमा प्रारंभ की थी। आश्चर्यजनक रूप से 85 दिनों की कठिन साधना के बाद भी वह मात्र लगभग साढ़े तीन किलोमीटर की दूरी ही तय कर सके हैं।

जब उनसे उनकी यात्रा की अवधि के संबंध में पूछा गया तो उन्होंने संक्षिप्त उत्तर दिया, “यह तो मां ही जाने।” जानकारों का अनुमान है कि इस प्रकार की दंडवत नर्मदा परिक्रमा पूर्ण होने में लगभग 13 से 14 वर्ष का समय लग सकता है। वनांचल मार्ग पर उनकी कठिन तपस्या देखने के लिए राहगीर रुक जाते हैं। अनेक श्रद्धालु उन्हें प्रणाम कर आशीर्वाद प्राप्त करते हैं, जबकि कुछ लोग इस दुर्लभ साधना को अपने मोबाइल कैमरों में कैद करते दिखाई देते हैं। तप, त्याग, साधना और समर्पण का यह दृश्य लोगों को सनातन धर्म की महान आध्यात्मिक परंपरा की याद दिला रहा है।

नर्मदा परिक्रमा को सनातन धर्म में अत्यंत पुण्यदायी एवं कठिन साधनाओं में से एक माना जाता है। श्रद्धालु मां नर्मदा के दोनों तटों की परिक्रमा कर अपनी श्रद्धा अर्पित करते हैं, किंतु दंडवत प्रणाम करते हुए परिक्रमा करना अत्यंत दुर्लभ और कठिन तपस्या मानी जाती है। दंडवत महाराज का यह संकल्प केवल शारीरिक धैर्य ही नहीं, बल्कि मानसिक दृढ़ता और ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण का भी प्रतीक है।

विशेष बात यह है कि दंडवत महाराज इस कठिन यात्रा में पूर्णतः अकेले हैं। उनके साथ कोई सहयोगी या सेवक नहीं है। उनके पास केवल एक बैग, एक डंडा तथा मां नर्मदा के पवित्र जल से भरा कमंडल ही है। यही उनकी समस्त सामग्री है। मां नर्मदा ही उनका सहारा, आश्रय और शक्ति का स्रोत हैं। अत्यंत विनम्र, सहज और सरल स्वभाव के दंडवत महाराज के चेहरे पर सदैव संतोष और श्रद्धा का भाव दिखाई देता है। मां नर्मदा के प्रति उनकी अटूट आस्था और अडिग विश्वास ही उनकी इस कठिन साधना का सबसे बड़ा संबल है।

स्थानीय नागरिकों का कहना है कि आधुनिक युग में जहां सुविधाओं की चाहत निरंतर बढ़ रही है, वहीं इस प्रकार की तपस्या समाज को आत्मसंयम, त्याग, धैर्य और भक्ति का संदेश देती है। अमरकंटक जैसी तपोभूमि में साधु-संतों की ऐसी साधनाएं सदियों पुरानी आध्यात्मिक परंपरा को आज भी जीवंत बनाए हुए हैं।

श्रद्धालुओं का मानना है कि मां नर्मदा के प्रति दंडवत महाराज की यह अनन्य भक्ति और कठिन साधना समाज में आध्यात्मिक चेतना का संचार कर रही है। उनकी यह यात्रा आस्था, संकल्प और साधना का ऐसा प्रेरणादायी उदाहरण है, जो हर किसी को प्रभावित और प्रेरित कर रहा है।

हिन्दुस्थान समाचार / राजेश शुक्ला

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