मप्र में यूसीसी पर सियासत तेज, उमंग सिंघार का सरकार पर हमला, कहा-“आदिवासी अस्मिता से समझौता नहीं”

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मप्र में यूसीसी पर सियासत तेज, उमंग सिंघार का सरकार पर हमला, कहा-“आदिवासी अस्मिता से समझौता नहीं”


भोपाल, 11 अप्रैल (हि.स.)। मध्य प्रदेश में समान नागरिक संहिता (यूसीसी) को लेकर सियासी बहस तेज हो गई है। विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने इस मुद्दे पर कड़ा रुख अपनाते हुए कहा है कि यूसीसी के नाम पर आदिवासी समाज की पहचान, परंपराओं और संवैधानिक अधिकारों से कोई समझौता स्वीकार नहीं किया जाएगा।

नेता प्रतिपक्ष सिंघार ने शनिवार काे अपने बयान में कहा कि भारत जैसे विविधताओं वाले देश में एक समान कानून थोपना सामाजिक संतुलन को बिगाड़ सकता है। आदिवासी समाज सदियों से अपनी विशिष्ट परंपराओं, सामाजिक ढांचे और सांस्कृतिक पहचान के साथ जीवन जीता आया है। ऐसे में एकरूप कानून लागू करना उनकी अस्मिता के खिलाफ है।

उन्होंने कहा कि अनुच्छेद 44 के तहत यूसीसी को नीति निदेशक तत्व में रखा गया था, न कि बाध्यकारी कानून के रूप में। संविधान निर्माताओं ने भी माना था कि इस विषय पर व्यापक सहमति जरूरी है। सिंघार ने आरोप लगाया कि भारतीय जनता पार्टी की सरकार बिना पर्याप्त संवाद और लोकतांत्रिक प्रक्रिया के इसे लागू करने की दिशा में बढ़ रही है।

आदिवासी अधिकारों पर असर की आशंका

नेता प्रतिपक्ष ने कहा कि आदिवासी समाज के विवाह, उत्तराधिकार और भूमि से जुड़े पारंपरिक नियम उनकी पहचान का हिस्सा हैं। पांचवीं और छठी अनुसूची उन्हें सांस्कृतिक स्वायत्तता प्रदान करती हैं। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि यूसीसी को बिना किसी छूट के लागू किया गया, तो यह संविधान की मूल भावना के खिलाफ होगा। सिंघार ने सरकार के ‘समानता’ के तर्क पर सवाल उठाते हुए कहा कि समानता का अर्थ सभी पर एक जैसा कानून थोपना नहीं है, बल्कि हर समुदाय की विशिष्टता को सम्मान देते हुए न्याय सुनिश्चित करना है। उन्होंने यह भी कहा कि इस मुद्दे पर न आदिवासी संगठनों से चर्चा की गई, न पंचायतों और न ही सामाजिक-धार्मिक समूहों से राय ली गई।

सरकार से मांगा स्पष्ट जवाब

सिंघार ने सरकार से सीधा सवाल पूछा—क्या यूसीसी आदिवासी समुदायों पर लागू होगी? यदि नहीं, तो इसके लिए स्पष्ट सुरक्षा और गारंटी क्यों नहीं दी जा रही? उन्होंने मांग की कि आदिवासी समाज को यूसीसी के दायरे से बाहर रखा जाए और उनकी परंपराओं व अधिकारों की पूर्ण सुरक्षा सुनिश्चित की जाए।

विधानसभा में चर्चा की मांग

सिंघार ने अपील की कि इस संवेदनशील मुद्दे पर विधानसभा में विस्तृत चर्चा कर सभी समुदायों—धर्मों, जनजातियों और अल्पसंख्यकों—को विश्वास में लिया जाए। उन्होंने चेतावनी दी कि बिना सहमति लागू किया गया कोई भी कानून सामाजिक विभाजन को बढ़ा सकता है और देश की सांस्कृतिक विविधता के लिए खतरा बन सकता है।

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हिन्दुस्थान समाचार / नेहा पांडे

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