तीर्थ को तीर्थ ही रहने दें, पर्यटक स्थल न बनाएं : शंकराचार्य स्वामी सदानंद सरस्वती
अनूपपुर, 06 अक्टूबर (हि.स.)। द्वारका-शारदा पीठाधीश्वर शंकराचार्य स्वामी सदानंद सरस्वती जी महाराज ने कहा है कि अमरकंटक सहित देश के धार्मिक और तीर्थ क्षेत्रों का विकास करते समय उनकी प्राचीन सभ्यता, संस्कृति, परंपरा और धार्मिक स्वरूप का विशेष ध्यान रखा जाना चाहिए। विकास के नाम पर ऐसी संरचनाओं का निर्माण नहीं होना चाहिए, जिससे तीर्थ की आध्यात्मिक पहचान प्रभावित हो। तीर्थ क्षेत्रों में विकास यात्रियों और श्रद्धालुओं की सुविधाओं तक सीमित रहना चाहिए। तीर्थ को तीर्थ ही रहने देना चाहिए, उसे केवल पर्यटक स्थल के रूप में विकसित नहीं किया जाना चाहिए।
शंकराचार्य पद पर आसीन होने के बाद पहली बार मध्य प्रदेश के अनूपपुर जिले की नर्मदा नगरी अमरकंटक पहुंचे स्वामी सदानंद सरस्वती ने बहुभाषी न्यूज एजेंसी हिन्दुस्थान समाचार से विशेष चर्चा में धर्म-अध्यात्म, सनातन संस्कृति, नर्मदा संरक्षण, पर्यावरण, गोसेवा, तीर्थ क्षेत्र के विकास, पर्यटन, युवाओं की भूमिका और वर्तमान सामाजिक परिस्थितियों सहित विभिन्न विषयों पर अपने विचार रखे।
'विकास के नाम पर विनाश की स्थिति नहीं बननी चाहिए'
अमरकंटक में प्रस्तावित नर्मदा लोक कॉरिडोर के संबंध में शंकराचार्य ने कहा कि अमरकंटक ही नहीं, देश के किसी भी तीर्थ स्थल के विकास में इस बात का ध्यान रखा जाना चाहिए कि विकास के नाम पर विनाश जैसी स्थिति उत्पन्न न हो। प्राचीन धार्मिक स्थलों की सभ्यता, संस्कृति और परंपराओं को नुकसान पहुंचाकर विकास नहीं किया जाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि नर्मदा उद्गम क्षेत्र की आध्यात्मिक गरिमा और धार्मिक स्वरूप को ध्यान में रखते हुए ही विकास कार्य किए जाने चाहिए। धार्मिक स्थलों की प्राचीन परंपराओं और संरचनाओं के साथ अनावश्यक छेड़छाड़ उचित नहीं है।
सभी धर्मों के प्रति समान दृष्टिकोण जरूरी
हिंदू मंदिरों और तीर्थ स्थलों की व्यवस्था में सरकारी हस्तक्षेप के सवाल पर शंकराचार्य स्वामी सदानंद सरस्वती ने कहा कि भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है। ऐसे में सभी धर्मों के प्रति समान दृष्टिकोण होना चाहिए।
उन्होंने कहा कि तीर्थ क्षेत्रों की धार्मिक पहचान बनाए रखने के लिए शराब, मांस-मदिरा जैसी गतिविधियों पर प्रतिबंध होना चाहिए। इससे धार्मिक और आध्यात्मिक वातावरण सुरक्षित रहेगा।
नर्मदा संरक्षण के लिए अलग विभाग और बजट की जरूरत
शंकराचार्य ने नर्मदा संरक्षण को सभी की जिम्मेदारी बताते हुए कहा कि नर्मदा को प्रदूषण से बचाने के लिए ठोस कदम उठाने होंगे। नालों और औद्योगिक इकाइयों से निकलने वाले दूषित जल का वैज्ञानिक तरीके से शोधन किया जाना चाहिए। बिना शोधन के किसी भी स्थिति में दूषित जल को नर्मदा में नहीं मिलने देना चाहिए। उन्होंने कहा कि नर्मदा संरक्षण के लिए राज्य सरकार को अलग से विभाग गठित करने के साथ पर्याप्त बजट की व्यवस्था करनी चाहिए।
गोसेवा और गोरक्षा के लिए अलग बजट की मांग
गो संरक्षण के विषय पर शंकराचार्य ने कहा कि राज्य सरकारों को गोरक्षा और गोसेवा के लिए विधिवत अलग बजट निर्धारित करना चाहिए। उन्होंने कहा कि गोसेवा और संरक्षण के लिए योजनाबद्ध तरीके से काम किए जाने की आवश्यकता है।
'संतों का काम राजनीति करना नहीं, राजनीति का शुद्धीकरण है'
संत समाज की भूमिका को लेकर शंकराचार्य ने कहा कि संत वह है, जो स्वयं सत्य की प्राप्ति के मार्ग पर चले और दूसरों को भी सनातन मार्ग पर चलने की प्रेरणा दे। संतों का कर्तव्य समाज को सही दिशा देना है।
उन्होंने कहा कि राजनीति में संतों की भूमिका राजनीति करने की नहीं, बल्कि राजनीति के शुद्धीकरण की होनी चाहिए। संतों को प्रत्यक्ष रूप से राजनीति में शामिल होने के बजाय सरकारों का मार्गदर्शन करना चाहिए।
सनातन बोर्ड की आवश्यकता बताई
सनातन बोर्ड की मांग पर शंकराचार्य स्वामी सदानंद सरस्वती ने कहा कि सनातन समाज की समस्याओं और धार्मिक हितों के लिए सनातन बोर्ड की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि सनातन बोर्ड बनने से सनातनियों की धार्मिक एवं सामाजिक समस्याओं को सरकार के समक्ष व्यवस्थित तरीके से रखा जा सकेगा।
शंकराचार्य ने कहा कि धार्मिक स्थलों के विकास की दिशा तय करते समय उनकी मूल आध्यात्मिक पहचान और परंपराओं को प्राथमिकता मिलनी चाहिए। अमरकंटक जैसे तीर्थों के विकास में सुविधा और संरक्षण के बीच संतुलन बनाए रखना आवश्यक है।
हिन्दुस्थान समाचार / राजेश शुक्ला

