अनूपपुर: धनगवां के जंगल में 12 दिनों से डेरा जमायें बैठे तीनों हाथी, 4 दिनों से नहीं हुई हलचल

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अनूपपुर: धनगवां के जंगल में 12 दिनों से डेरा जमायें बैठे तीनों हाथी, 4 दिनों से नहीं हुई हलचल


अनूपपुर: धनगवां के जंगल में 12 दिनों से डेरा जमायें बैठे तीनों हाथी, 4 दिनों से नहीं हुई हलचल


अनूपपुर, 04 जनवरी (हि.स.)। मध्य प्रदेश के अनूपपुर में तीन हाथियों का समूह विगत 12 दिनों से वन परिक्षेत्र, जैतहरी के धनगवां वन बीट के जंगल में निरंतर विचरण कर रहे हैं। जो रात में ग्रमीण क्षेत्र में खेतों में लगी फसलो को आहार बनाते हैं। अभी तक किसी अप्रिय घटना की जानकारी नहीं हैं। इस बीच कुछ के घरों में तोडफोड़ की थी। चार दिनों से हाथियों का समूह रात के समय भी जंगल से बाहर नहीं निकल रहे हैं। ग्रामीणों हाथियों के डर से रतजगा कर रहे हैं।

जिले के जैतहरी वन परिक्षेत्र के धनगवां वन बीट के जंगल में 12 दिनों से 3 हाथियों ने डेरा जमाये हुए हैं। वहीं चार दिनों से रात के समय भी जंगल से बाहर नहीं निकल रहे हैं। जिससे गस्ती दल हाथियों के विचरण पर नजर बनाए रखते हुए ग्रामीणों को जंगल नहीं जाने, जंगल से लगे पगडंडी रास्तों से शाम होने के बाद नहीं चलने, हाथियों के विचरण कि किसी भी तरह की जानकारी मिलने पर वन विभाग को दिए जाने, सचेत एवं सतर्क रहने की हिदायत दी है।

तीनों हाथी धनगवां बीट से लगे कुसुमहाई के पालाडोल, पटौरा, चोई के भलुवान टोला घर,गोढाटोला कुकुरगोंड़ा के बड़का टोला, सरईहा एवं अन्य टोला मोहल्ला की सीमा में लगे जंगल के अंदर जमे हुए हैं। आसपास के ग्रामीणों को जो लकड़ी लेने या अन्य कार्यों से जंगल या अपने खेतों में जाते हैं उन्हें हाथियों के ठहरने, घूमते रहने की तथा पेड़ पौधों को तोड़कर खाने की आहट मिलती है तो विभाग द्वारा मंडल स्तर एवं वन परिक्षेत्र जैतहरी स्तर पर दो अलग-अलग गश्ती दल तैयार किया गया है जो ग्रामीणों के साथ हाथियों के विचरण पर नजर रख रहे हैं। वहीं हाथियों के निरंतर धनगवां बीट के जंगल में ठहरे होने के कारण आसपास के कई ग्रामो के ग्रामीण हाथियों के डर से रात-रात भर जाकर रात बिताने को मजबूर हैं। वही कुछ ग्रामीण पेड़ में सामान एवं खाट रख कर एवं पुलिया के नीचे अस्थाई निवास बना रखा हैं। ग्रमीणों ने बताया कि हाथियों का समूह देर शाम से देर रात होते ही किसी भी समय किसी भी मोहल्ले में प्रवेश कर जाने की संभावना बनी रहती हैं।

हिन्दुस्थान समाचार / राजेश शुक्ला

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