साश्वत नवपदजी की ओली की तपस्या विशिष्ट महत्व रखती है - पवित्र रत्नजी महाराज
मंदसौर, 17 अक्टूबर (हि.स.)। जैन धर्म व दर्शन में साश्वत नवपदजी की ओली की तपस्या विशिष्ट महत्व रखती है। प्रभु महावीर ने अपने प्रवचन में स्वयं गौतमस्वामी को इसकी महत्ता बतायी है। नवपदजी की ओली में जो भी श्रावक श्राविकाएं आयम्बिल तप करते हुए नवपदजी की साधना करते हैं वे साश्वत सुख पाते हैं।
उक्त उद्गार प. पू. जैन मुनिराज पवित्ररत्न विजय जी म. सा. ने कहे। उन्होंने शनिवार को प्रत्यक्षरत्न विजय जी म. सा. के सानिध्य में आयोजित धर्मसभा (प्रवचन) में कहा कि नवपदजी की ओली की तपस्या के दौरान श्रीपाल रास व श्रीपाल मैना सुंदरी की कथा सुनायी जाती है। श्रीपाल रास जो भी श्रावक-श्राविका 9 दिवस तक मनोभाव से पढ़ते हैं तथा श्रवण करते हुए उनके जीवन में साश्वत सुख स्वयं ही आ जाता है। मैना सुंदरी सहित 9 श्राविका जिनका विवाह श्रीपाल से हुआ था उनके जीवन में नवपद की धर्म आराधना से कैसे परिवर्तन आया यह जानना है तो श्रावक श्राविका को नवपद की धर्म आराधना के दौरान श्रीपाल रास को मनोभाव से श्रवण करना चाहिये। पतिव्रता स्त्री कैसी होती है पति को जीवन के प्रत्येक क्षण वह कैसे सहयोग दे सकती है यह सब ज्ञान हमें श्रीपाल रास से मिलता है। जो भी श्रावक श्राविका इसे श्रवण करते हैं उनके जन्म जन्मांतर के कर्म क्षय हो सकते हैं लेकिन उसके लिये आपके जीवन में भाव भी होना चाहिये। धर्मसभा में बड़ी संख्या में श्रावक श्राविका की उपस्थिति थी। प्रभावना राजमलजी भागचंद जी पोरवाल परिवार के द्वारा वितरित की गई।
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हिन्दुस्थान समाचार / अशोक झलोया

