नर्मदा परिक्रमा ने सिखाया अहंकार छोड़कर सेवा और निर्भयता से जीनाः पूर्व कलेक्टर श्रीवास्तव

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नर्मदा परिक्रमा ने सिखाया अहंकार छोड़कर सेवा और निर्भयता से जीनाः पूर्व कलेक्टर श्रीवास्तव


नर्मदा परिक्रमा ने सिखाया अहंकार छोड़कर सेवा और निर्भयता से जीनाः पूर्व कलेक्टर श्रीवास्तव


मंदसौर, 12 सितंबर (हि.स.)। नर्मदा की पद परिक्रमा केवल एक धार्मिक यात्रा नहीं, बल्कि स्वयं को जानने, अहंकार से मुक्त होने और सेवा, त्याग, वैराग्य तथा निर्भयता का बोध कराने वाली साधना है। यात्रा के दौरान मनुष्य को यह अनुभव होता है कि जीवन के लिए बहुत अधिक साधनों की आवश्यकता नहीं है। नर्मदा मैया के किनारे साधु-संतों और सामान्य लोगों की आत्मीय सेवा यह सिखाती है कि जिसके पास देने के लिए बहुत कम है, वह भी श्रद्धा और प्रेम से बहुत कुछ दे सकता है।

यह बात शनिवार को मध्य प्रदेश के मंदसौर जिले के पूर्व कलेक्टर ओमप्रकाश श्रीवास्तव ने नर्मदा परिक्रमा के संस्मरण सुनाते हुए कही। नर्मदा परिक्रमा पूरी करने के बाद मंदसौर पहुंचे पूर्व कलेक्टर ओमप्रकाश श्रीवास्तव एवं उनकी पत्नी भारती श्रीवास्तव के सम्मान में नपा सभागार, गांधी चौराहा पर अष्टमूर्ति ग्रुप द्वारा श्री नर्मदा यात्रा संस्मरण प्रसंग का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में राज्यसभा सांसद एवं भाजपा किसान मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष बंशीलाल गुर्जर की विशेष उपस्थिति रही।

ओमप्रकाश श्रीवास्तव ने कहा कि प्रशासनिक सेवा के दौरान उन्हें जिस तरह की संतुष्टि और स्नेह मंदसौर में मिला, वह कहीं और नहीं मिला। नर्मदा पद परिक्रमा के अनुभव साझा करते हुए उन्होंने कहा कि जब व्यक्ति के भीतर शांति, वैराग्य, प्रेम और करुणा उत्पन्न होने लगे तो समझना चाहिए कि साधना सही दिशा में आगे बढ़ रही है। भारतीय संस्कृति की सबसे बड़ी देन यह है कि वह दिखाई देने वाले संसार के पीछे मौजूद उस सत्य को जानने की प्रेरणा देती है, जिसे हम ईश्वर कहते हैं। जिस तरह विज्ञान के नियमों को समझकर हम संसार को बदलते हैं, उसी तरह अध्यात्म के नियमों को अपने भीतर उतारने पर ईश्वर की अनुभूति की दिशा में आगे बढ़ सकते हैं।

उन्होंने कहा कि नर्मदा परिक्रमा में कई ऐसे अनुभव हुए, जिन्होंने जीवन को देखने का नजरिया बदल दिया। घर में रहते हुए व्यक्ति निश्चिंतता का जीवन जीता है, लेकिन यात्रा में अगले पड़ाव पर क्या मिलेगा, इसकी कोई निश्चितता नहीं होती। उन्होंने बताया कि परिक्रमा सामान्यत: पैदल की जाती है। वर्तमान समय में लोग साइकिल, कार, बस और अन्य साधनों से भी यात्रा करते हैं, लेकिन पैदल परिक्रमा में साधक लंबे समय तक मां नर्मदा के साथ रहता है और यही तप तथा साधना का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है। परंपरागत रूप से परिक्रमा की अवधि तीन वर्ष, तीन माह और 13 दिन बताई जाती है। इसमें चातुर्मास के दौरान परिक्रमा नहीं की जाती।

भारती श्रीवास्तव ने कहा कि परिक्रमा के दौरान साधक नर्मदा का जल अपने साथ लेकर चलता है और प्रतिदिन उसका पूजन-अर्चन करता है। समुद्र में पहुंचकर जल अर्पित करने और पात्र में नया जल भरने की परंपरा है। इसके बाद अमरकंटक में भी जल अर्पित कर पुन: जल लेकर आगे बढ़ा जाता है और परिक्रमा पूर्ण होने पर ओंकारेश्वर में शिव का अभिषेक तथा कन्या पूजन किया जाता है। यात्रा सूर्योदय से सूर्यास्त तक चलती है। रात में ग्रामीणों का आतिथ्य स्वीकार किया जाता है या आश्रमों में विश्राम होता है।

कार्यक्रम में राज्यसभा सांसद बंशीलाल गुर्जर ने कहा कि नर्मदा परिक्रमा के अनुभव सुनना स्वयं में प्रेरणादायी है। स्वागत उद्बोधन एवं आयोजन की भूमिका वरिष्ठ पत्रकार डॉ. घनश्याम बटवाल ने रखी। संचालन वरिष्ठ पत्रकार ब्रजेश जोशी ने किया आभार डॉ. देवेंद्र पुराणिक ने माना।

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हिन्दुस्थान समाचार / अशोक झलोया

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