अनूपपुर: सड़क पर थिरकते कदम, ढोल-नगाड़ों की गूंज : राजेन्द्रग्राम में छेरछेरा महोत्सव का रंगीन नजारा प्रकट हुआ

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अनूपपुर: सड़क पर थिरकते कदम, ढोल-नगाड़ों की गूंज : राजेन्द्रग्राम में छेरछेरा महोत्सव का रंगीन नजारा प्रकट हुआ


अनूपपुर: सड़क पर थिरकते कदम, ढोल-नगाड़ों की गूंज : राजेन्द्रग्राम में छेरछेरा महोत्सव का रंगीन नजारा प्रकट हुआ


अनूपपुर, 05 जनवरी (हि.स.)। मध्यप्रदेश के अनूपपुर जिले के राजेन्द्रग्राम क्षेत्र में सोमवार को उस समय एक अनोखा और जीवंत दृश्य देखने को मिला, जब आदिवासी समुदाय ने अपने पारंपरिक पर्व छेरछेरा महोत्सव को पूरे उत्साह, उल्लास और सांस्कृतिक गरिमा के साथ मनाया। ढोल-नगाड़ों की गूंज पर युवक-युवतियां पारंपरिक वेशभूषा में सजकर बीच सड़क पर नृत्य करते नजर आए। इस लोक उत्सव ने जहां पूरे क्षेत्र को उत्सवमय बना दिया, वहीं कुछ समय के लिए मुख्य मार्ग पर यातायात भी प्रभावित हुआ।

राजेन्द्रग्राम से अमरकंटक होते हुए छत्तीसगढ़ की ओर जाने वाली मुख्य सड़क पर आदिवासी युवक-युवतियों ने लंबी कतार में शैला (छैला) नृत्य प्रस्तुत किया। सामूहिक नृत्य, तालबद्ध कदम और लोक संगीत की थाप ने राह चलते लोगों को भी पलभर के लिए ठहरने पर मजबूर कर दिया। नृत्य के चलते सड़क पर जाम की स्थिति बन गई और वाहनों की आवाजाही कुछ समय के लिए रोकनी पड़ी।

उत्सव के दौरान राहगीरों और वाहन चालकों से परंपरा के अनुसार प्रतीकात्मक योगदान मांगा गया। हालांकि, इसमें किसी प्रकार का दबाव नहीं बनाया गया और यह पूरी तरह स्वैच्छिक रहा। फिर भी, सड़क पर नृत्य और वाहनों के रुकने से यातायात सुरक्षा को लेकर कुछ समय के लिए जोखिम की स्थिति बनी रही। कुछ लोगों को असुविधा का सामना करना पड़ा, लेकिन वहीं कई राहगीर इस पारंपरिक नृत्य और लोक उत्सव को देखकर रुक गए और जनजाति संस्कृति के इस रंगीन स्वरूप का आनंद लेते नजर आए।

ढोल-नगाड़ों की थाप, पारंपरिक आभूषणों से सजी वेशभूषा और सामूहिक नृत्य ने पूरे वातावरण को लोक उत्सव में बदल दिया। बच्चे, युवा और बुजुर्ग सभी इस पर्व में समान उत्साह के साथ शामिल दिखाई दिए।

छेरछेरा: आदिवासी नववर्ष का प्रतीक

राजेन्द्रग्राम क्षेत्र में निवास करने वाला आदिवासी समुदाय छेरछेरा पर्व को जनजाति नववर्ष के रूप में मनाता है। यह पर्व हर वर्ष 1 जनवरी से 14 जनवरी तक चलता है। इन दिनों लोग घर-घर और सार्वजनिक स्थानों पर जाकर छैला नृत्य करते हैं तथा लोक गीतों के माध्यम से अपनी परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत को जीवित रखते हैं।

लोक परंपराओं की जीवंत झलक

छेरछेरा पर्व के दौरान शैला नृत्य के साथ-साथ डंडा नृत्य जैसी लोक परंपराएं भी देखने को मिलती हैं, जो जनजाति समाज की समृद्ध सांस्कृतिक पहचान को दर्शाती हैं। सामूहिक गीत और नृत्य के माध्यम से समुदाय आपसी एकता, सहयोग और सामाजिक जुड़ाव का संदेश देता है।

स्थानीय लोगों की जुबानी

राजेन्द्रग्राम निवासी दुर्गा ने बताया कि वे हर वर्ष यह पारंपरिक छेरछेरा पर्व पूरे श्रद्धा भाव से मनाते हैं। उन्होंने कहा कि यह त्योहार एक जनवरी से 14 जनवरी तक चलता है, जिसमें लोग नृत्य करते हुए घर-घर और सार्वजनिक स्थानों पर जाते हैं। राहगीरों से लिया जाने वाला प्रतीकात्मक सहयोग भी इसी परंपरा का हिस्सा है।

हिन्दुस्थान समाचार / राजेश शुक्ला

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