महाकाल की सवारी में 39वें वर्ष भी पारंपरिक राजसी वेशभूषा में शामिल होंगे स्वामी मुस्कुराके

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महाकाल की सवारी में 39वें वर्ष भी पारंपरिक राजसी वेशभूषा में शामिल होंगे स्वामी मुस्कुराके


उज्जैन, 31 जुलाई (हि.स.)। श्रावण-भाद्रपद मास में निकलने वाली भगवान महाकालेश्वर की पारंपरिक सवारी इस वर्ष भी सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विरासत की भव्य झलक प्रस्तुत करेगी। पिछले 38 वर्षों से इस परंपरा का निर्वहन कर रहे स्वामी मुस्कुराके (शैलेंद्र व्यास) इस बार लगातार 39वें वर्ष विशेष राजसी वेशभूषा धारण कर बाबा महाकाल की सवारी में शामिल होंगे।

शैलेंद्र व्यास ने बताया कि उनकी मंडली के सदस्य देश के विभिन्न राज्यों की पारंपरिक राजसी वेशभूषा और विशिष्ट पगड़ियों के साथ हाथों में राष्ट्रध्वज तिरंगा लेकर सवारी में शामिल होंगे। इस वर्ष दक्षिण भारतीय शैली के साथ गुजरात, राजस्थान, कर्नाटक, ओडिशा, असम और केरल की पारंपरिक राजसी वेशभूषाओं का प्रदर्शन किया जाएगा।

उन्होंने बताया कि इस बार सिंहस्थ महाकुंभ पगड़ी, शौर्य सिंदूर पगड़ी, चंद्रयान, ब्रह्मोस मिसाइल, तिरंगा, सूर्ययान, त्रिशूल पगड़ी तथा मयूर मुकुट विशेष आकर्षण का केंद्र रहेंगे। सवारी में स्वामी खिलखिलाके (मनोहर गुप्ता), स्वामी दिल मिलाके (दिनेश रावल), स्वामी गुदगुदाके (मोहित गेहलोत) और पप्पू तलवार भी पारंपरिक राजसी परिधान में बाबा महाकाल की आराधना करते हुए शामिल होंगे।

शैलेंद्र व्यास के अनुसार, भगवान महाकालेश्वर की सवारी का उल्लेख 11वीं शताब्दी की पांडुलिपियों में मिलता है। परमार वंश के राजा भोज ने इस परंपरा को राजकीय उत्सव का स्वरूप दिया था। उस समय सवारी में लोक कलाकार, संगीतकार और करतब दिखाने वाले कलाकार शामिल होते थे, जबकि राजा भोज स्वयं सेना और लाव-लश्कर के साथ पालकी के आगे चलते थे।

उन्होंने बताया कि मराठा शासनकाल में सिंधिया वंश के राणोजी सिंधिया ने महाकाल मंदिर के जीर्णोद्धार के साथ इस परंपरा को भी नया स्वरूप दिया। उनके समय से सवारी में रथ, गजराज, लोक परंपराओं और राजसी वेशभूषा को प्रमुख स्थान मिला, जिसकी झलक आज भी देखने को मिलती है।

स्वामी मुस्कुराके ने कहा कि उनकी मंडली पिछले 38 वर्षों से इस ऐतिहासिक और सांस्कृतिक परंपरा को जीवंत बनाए हुए है। इस वर्ष भी सभी सदस्य पारंपरिक स्वरूप में शामिल होकर महाकाल की सवारी की भव्यता और गौरव को आगे बढ़ाने का प्रयास करेंगे।

हिन्दुस्थान समाचार / ललित ज्‍वेल

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