अनूपपुर: साल बोरर का प्रकोप, 9535 साल के पेड़ काटने की मिली मंजूरी

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अनूपपुर: साल बोरर का प्रकोप, 9535 साल के पेड़ काटने की मिली मंजूरी


अनूपपुर: साल बोरर का प्रकोप, 9535 साल के पेड़ काटने की मिली मंजूरी


अनूपपुर: साल बोरर का प्रकोप, 9535 साल के पेड़ काटने की मिली मंजूरी


अनूपपुर, 20 सितंबर (हि.स.)। मध्य प्रदेश के अनूपपुर जिले के अमरकंटक के साल जंगलों में साल बोरर नामक कीट का संक्रमण वन विभाग के लिए चुनौती बना हुआ है। अमरकंटक के 8,584 हेक्टेयर वन क्षेत्र में करीब 40 लाख साल वृक्ष हैं, जिनमें से लगभग 60 हजार पेड़ों में संक्रमण पाए जाने की बात वन विभाग ने कही है। संक्रमण का फैलाव रोकने के लिए अमरकंटक में 9,535 और पड़ोसी डिंडौरी जिले में 1,46,784 पेड़ों की कटाई को केंद्र सरकार से मंजूरी मिलने की जानकारी दी गई है।

40 लाख साल वृक्षों वाले जंगल में 60 हजार संक्रमित

वनमंडलाधिकारी डेविड चनाप ने रविवार को बताया कि अमरकंटक क्षेत्र में संक्रमण करीब 60 हजार पेड़ों तक पहुंच चुका है। इनमें 9,535 पेड़ अधिक संक्रमित श्रेणी में हैं। वन विभाग ने पेड़ों की स्थिति के आधार पर उन्हें टी-1 से टी-6 तक अलग-अलग श्रेणियों में बांटा है। बाकी पेड़ों में संक्रमण अभी शुरुआती स्तर पर है। इसी वजह से संक्रमित पेड़ों की पहचान और समय रहते नियंत्रण को अभियान का अहम हिस्सा बनाया गया है।

इंदिरा गांधी राष्ट्रीय जनजातीय विश्वविद्यालय, अमरकंटक के सहायक प्राध्यापक डॉ. शिवाजी चौधरी के मुताबिक साल बोरर के जीवन चक्र को रोकना संक्रमण नियंत्रण की प्रमुख चुनौती है। उनके अनुसार एक मादा वयस्क कीट करीब 250 से 300 अंडे देती है। इनसे तीन से सात दिन में लार्वा निकलते हैं। लार्वा कई महीनों तक पेड़ के तने के भीतर रहकर लकड़ी को नुकसान पहुंचाते हैं। इसके बाद दिसंबर से अप्रैल के बीच प्यूपा अवस्था आती है। अगले मानसून में वयस्क कीट बाहर निकलते हैं और स्वस्थ पेड़ों तक संक्रमण पहुंचने का खतरा बढ़ जाता है। डॉ. चौधरी के अनुसार शुरुआती स्तर पर रोकथाम नहीं की गई तो संक्रमण का दायरा बढ़ सकता है।

वन विशेषज्ञों के अनुसार साल बोरर की इल्ली पेड़ की छाल को भेदकर तने के अंदर प्रवेश करती है। इसके बाद सैपवुड और हार्टवुड में सुरंगें बनाकर लकड़ी को नुकसान पहुंचाती है। संक्रमण बढ़ने पर पेड़ कमजोर होने लगता है और धीरे-धीरे सूख सकता है। साल के पेड़ से निकलने वाली राल की गंध भी कीटों को आकर्षित करती है। इसी व्यवहार का इस्तेमाल वन विभाग ट्रैप ट्री ऑपरेशन में कर रहा है।

प्रभावित क्षेत्रों में राल छोड़ रहे संक्रमित पेड़ों को छह से सात टुकड़ों में काटकर जंगल में ही रखा जाता है। इनसे निकलने वाली गंध से आकर्षित होकर साल बोरर के वयस्क कीट इन पर एकत्र होते हैं।

इसके बाद शाम से सुबह तक वनकर्मी और स्थानीय ग्रामीण इन कीटों को एकत्र कर संग्रहण केंद्र में जमा करते हैं। निर्धारित प्रक्रिया के तहत इनका वैज्ञानिक तरीके से नष्टीकरण किया जाता है।

वन विभाग के मुताबिक अब तक 40,200 साल बोरर कीट पकड़े और नष्ट किए जा चुके हैं। संक्रमण रोकने के लिए विभाग की 16 समितियां काम कर रही हैं।

वन विभाग के अनुसार देहरादून स्थित फॉरेस्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट की टीम पहले साल बोरर संक्रमण का अध्ययन कर चुकी है। बारिश के बाद जबलपुर स्थित स्टेट फॉरेस्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट की टीम भी प्रभावित क्षेत्र का परीक्षण करेगी। इससे संक्रमण की वर्तमान स्थिति और नियंत्रण उपायों की प्रभावशीलता का आकलन किया जाना है।

पूर्व में आ चुका है साल बोरर का प्रकोप

वन विभाग के अधिकारियों के मुताबिक अमरकंटक क्षेत्र में वर्ष 1995-96 में भी साल बोरर का बड़ा प्रकोप सामने आया था। उस समय प्रभावित पेड़ों को काटकर जंगल से हटाना पड़ा था। डॉ. चौधरी के अनुसार वर्ष 1923-24 में डिंडोरी क्षेत्र में करीब 70 लाख साल वृक्षों के साल बोरर से प्रभावित होने का उल्लेख मिलता है। इस ऐतिहासिक आंकड़े का मूल रिकॉर्ड/दस्तावेज मिलना जरूरी है, ताकि वर्तमान खबर में इसे प्रमाणित तथ्य के रूप में इस्तेमाल किया जा सके।

केंद्र सरकार से मंजूरी मिलने के बाद डिंडोरी में संक्रमित पेड़ों की कटाई शुरू किए जाने की बात कही गई है। अमरकंटक में अक्टूबर से संक्रमित पेड़ों की कटाई प्रस्तावित है। वन विभाग का फोकस संक्रमित पेड़ों की पहचान, ट्रैप ट्री के जरिए वयस्क कीटों को आकर्षित कर नष्ट करने और संक्रमण को स्वस्थ पेड़ों तक पहुंचने से रोकने पर है।

वहीं कार्रवाई के बीच सबसे अहम सवाल यह है कि अमरकंटक में बताए गए करीब 60 हजार संक्रमित पेड़ों और अमरकंटक-दिंडोरी में कटाई के लिए मंजूर 1,56,319 पेड़ों के आंकड़ों का आपसी संबंध क्या है। विभाग के रिकॉर्ड से यह स्पष्ट किया जाना जरूरी है कि मंजूर कटाई का आंकड़ा केवल वर्तमान संक्रमित पेड़ों का है या इसमें संक्रमण रोकने के लिए प्रस्तावित अन्य श्रेणियों के पेड़ भी शामिल हैं।

हिन्दुस्थान समाचार / राजेश शुक्ला

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