चित्रकूट में नदियों की तलाश के लिए सैटेलाइट का सहारा, फिर भी अतिक्रमण पर नहीं लग रहा अंकुश

WhatsApp Channel Join Now
चित्रकूट में नदियों की तलाश के लिए सैटेलाइट का सहारा, फिर भी अतिक्रमण पर नहीं लग रहा अंकुश


चित्रकूट, 02 अक्टूबर (हि.स.)। मध्य प्रदेश के सतना जिले का चित्रकूट मंदाकिनी, सरयू और पयस्विनी नदियों के बिना अधूरा है। ये नदियां यहां की धार्मिक आस्था के साथ-साथ क्षेत्र की प्राकृतिक पहचान भी हैं। विडंबना यह है कि जिन नदियों की सीमाएं और धाराएं वर्षों से राजस्व अभिलेखों में दर्ज हैं, आज उनमें से एक की पुरानी धारा तलाशने के लिए प्रशासन को सैटेलाइट तस्वीरों और रोवर डीजीपीएस तकनीक का सहारा लेना पड़ रहा है। दूसरी ओर मंदाकिनी के जलग्रहण क्षेत्र में कथित नई प्लॉटिंग और अतिक्रमण के आरोप सामने आ रहे हैं। पयस्विनी भी अतिक्रमण और प्रदूषण की समस्या से जूझ रही है।

सरयू की पुरानी धारा तलाश रहा प्रशासन

रामघाट क्षेत्र में सरयू की पुरानी प्राकृतिक धारा के अस्तित्व और उसकी वास्तविक सीमा का पता लगाने के लिए प्रशासन ने आधुनिक तकनीक का सहारा लिया है। राजस्व, नगर निकाय और संबंधित विभागों की संयुक्त टीम पुराने नक्शों और सैटेलाइट चित्रों के आधार पर नदी की सीमा और पुरानी धारा तलाश रही है। मौके पर रोवर डीजीपीएस तकनीक से सीमांकन की प्रक्रिया भी शुरू की गई है।

सीमांकन पूरा होने के बाद नदी क्षेत्र को स्थायी रूप से चिह्नित करने के लिए पक्के निशान लगाए जाने की तैयारी है। उपलब्ध रिपोर्टों में पुराने प्रवाह क्षेत्र में अतिक्रमण, मिट्टी भराव और पक्के निर्माण की स्थिति सामने आने की बात कही गई है।

इससे एक अहम सवाल खड़ा होता है कि यदि नदी की जमीन राजस्व अभिलेखों और पुराने नक्शों में दर्ज थी तो समय के साथ मौके पर उसका स्वरूप कैसे बदलता गया। राष्ट्रीय हरित अधिकरण के अप्रैल 2026 के आदेश में भी मंदाकिनी, पयस्विनी और सरयू से जुड़े अतिक्रमण, अवैध निर्माण और नदियों के प्राकृतिक प्रवाह से संबंधित शिकायतों का उल्लेख है।

सरयू से जुड़ा संकट मंदाकिनी तक पहुंच सकता है

सरयू की समस्या को केवल एक नदी तक सीमित करके नहीं देखा जा सकता। उसका जलप्रवाह आगे मंदाकिनी से जुड़ता है। ऐसे में सरयू के प्राकृतिक जलग्रहण क्षेत्र, जलस्रोतों और बहाव क्षेत्र में होने वाला बदलाव मंदाकिनी की जलधारा को भी प्रभावित कर सकता है। इसी कारण नदी से जुड़े क्षेत्रों में भूमि उपयोग, डायवर्सन, रजिस्ट्री और निर्माण की अनुमति जैसे पहलुओं की जांच महत्वपूर्ण हो जाती है। यह भी स्पष्ट होना जरूरी है कि नदी क्षेत्र में कथित कब्जे कब हुए और उस दौरान संबंधित विभागों की निगरानी व्यवस्था क्या थी।

इसी बीच ग्राम खीर और पूर्व नगर पंचायत चित्रकूट क्षेत्र में मंदाकिनी के कैचमेंट क्षेत्र में कथित अवैध प्लॉटिंग का मामला सामने आया है। स्थानीय स्तर पर आरोप लगाए जा रहे हैं कि उत्तरप्रदेश सीमा से जुड़े कुछ भूमाफिया राजस्व अभिलेखों और भूमि उपयोग की प्रक्रिया का लाभ उठाकर जलग्रहण क्षेत्र में जमीन काट रहे हैं। इन आरोपों की प्रशासनिक पुष्टि अभी अपेक्षित है, लेकिन इससे नदी संरक्षण को लेकर गंभीर सवाल जरूर खड़े होते हैं।

बाढ़ के बाद सामने आई नदी किनारों की स्थिति

हाल ही अगस्त में आई भीषण बाढ़ ने मंदाकिनी के प्राकृतिक बहाव क्षेत्र के साथ छेड़छाड़ के संभावित खतरे को भी सामने ला दिया। नदी किनारे बने मकानों, दुकानों और अन्य निर्माणों को लेकर प्रशासन ने जांच शुरू की। बाढ़ के बाद नगर परिषद चित्रकूट ने तटीय, बाढ़ प्रभावित और संभावित जलभराव वाले क्षेत्रों में बिना अनुमति प्लॉटिंग, भूमि विकास और भवन निर्माण पर रोक लगाने संबंधी आम सूचना जारी की। मुख्यमंत्री स्तर से भी मंदाकिनी के कैचमेंट क्षेत्र में अतिक्रमण चिह्नित कर हटाने और नदी में सीवर तथा नालों का पानी जाने से रोकने के निर्देश दिए गए हैं।

नदी के किनारे कब्जा और पानी में प्रदूषण

मंदाकिनी की समस्या केवल नदी के किनारों तक सीमित नहीं है। सरयू और पयस्विनी से जुड़े जलप्रवाह का असर भी मंदाकिनी की स्थिति पर पड़ता है। दूसरी ओर शहर का गंदा पानी नदियों में पहुंचने की समस्या भी सामने आती रही है।

इस तरह नदियों के सामने दोहरी चुनौती है। एक ओर नदी क्षेत्र और जलग्रहण क्षेत्र में अतिक्रमण का खतरा है, वहीं दूसरी ओर नदी के पानी में प्रदूषण बढ़ने की समस्या है। राष्ट्रीय हरित अधिकरण ने भी नदी क्षेत्र के सीमांकन, अतिक्रमण की पहचान, अवैध निर्माण और सीवेज प्रबंधन को लेकर प्रशासन से जानकारी मांगी है।

विधानसभा में भी उठ चुका है अतिक्रमण का मुद्दा

चित्रकूट की नदियों और उनके आसपास अतिक्रमण का मुद्दा नया नहीं है। वर्ष 2021 में विधानसभा में मंदाकिनी, सरयू और पयस्विनी की सीमाओं में अतिक्रमण का सवाल उठ चुका है। उस समय सरकार की ओर से अतिक्रमण चिह्नित कर कार्रवाई किए जाने की जानकारी दी गई थी।

इसके बावजूद वर्ष 2026 में सरयू की पुरानी धारा तलाशने और मंदाकिनी के तटीय क्षेत्रों का फिर से सीमांकन करने की जरूरत सामने आई है। इससे यह सवाल भी उठता है कि पिछले पांच वर्षों में नदी संरक्षण से जुड़ी व्यवस्थाओं में क्या बदलाव हुआ और यदि अतिक्रमण हटाया गया था तो नदी क्षेत्र में दोबारा कब्जे की स्थिति कैसे बनी।

नदी की सीमा तय करने से आगे बढ़कर जिम्मेदारी तय करने की जरूरत

चित्रकूट में सरयू की पुरानी धारा की तलाश और मंदाकिनी के कैचमेंट क्षेत्र को लेकर सामने आ रहे अतिक्रमण के आरोप एक ही तस्वीर के अलग-अलग पहलू दिखाई देते हैं। नदी की वास्तविक सीमा निर्धारित करना जरूरी है, लेकिन इसके साथ यह पता लगाना भी जरूरी होगा कि नदी की जमीन पर कब्जा कब और किस प्रक्रिया के तहत हुआ।

प्रत्येक संदिग्ध भूखंड के खसरे, राजस्व नक्शे, भूमि उपयोग, डायवर्सन, रजिस्ट्री और निर्माण अनुमति की जांच से स्थिति स्पष्ट हो सकती है। इससे यह भी सामने आ सकता है कि नदी क्षेत्र में हुए बदलाव के दौरान संबंधित विभागों की निगरानी व्यवस्था किस स्तर पर काम कर रही थी।

सैटेलाइट और रोवर तकनीक नदी की पुरानी धारा और उसकी सीमा तलाश सकती है, लेकिन नदी क्षेत्र में हुए अतिक्रमण की जिम्मेदारी तय करना प्रशासनिक कार्रवाई से ही संभव है। चित्रकूट की मंदाकिनी, सरयू और पयस्विनी को बचाने के लिए अब केवल सीमांकन और पुराने प्रवाह की तलाश ही नहीं, बल्कि नदी की जमीन तक पहुंचे अतिक्रमण और उसे संभव बनाने वाली प्रक्रिया की भी जांच जरूरी हो गई है।

हिन्दुस्थान समाचार / हीरेन्‍द्र द्विवेदी

Share this story