नमामि गंगे की आड़ में मंदाकिनी से खिलवाड़ पड़ा 24.62 करोड़ का महंगा सौदा, बाढ़ ने खोली रिवर फ्रंट की पोल

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नमामि गंगे की आड़ में मंदाकिनी से खिलवाड़ पड़ा 24.62 करोड़ का महंगा सौदा, बाढ़ ने खोली रिवर फ्रंट की पोल


नमामि गंगे की आड़ में मंदाकिनी से खिलवाड़ पड़ा 24.62 करोड़ का महंगा सौदा, बाढ़ ने खोली रिवर फ्रंट की पोल


सतना, 17 सितंबर (हि.स.)। मध्य प्रदेश के सतना जिले की प्रसिद्ध धार्मिक नगरी चित्रकूट में मंदाकिनी नदी के संरक्षण के नाम पर चलाए जा रहे नमामि गंगे प्रोजेक्ट की हकीकत बाढ़ का पानी उतरने के बाद सामने आ रही है। आरोग्यधाम तट पर नदी के किनारे हुए निर्माण कार्यों को देखकर यह सवाल खड़ा हो रहा है कि आखिर नदी को बचाने के नाम पर उसके प्राकृतिक स्वरूप के साथ कितना खिलवाड़ किया गया। 24.62 करोड़ रुपये की लागत वाले इस प्रोजेक्ट के तहत तैयार किए जा रहे रिवर फ्रंट का काम अभी पूरा भी नहीं हुआ था कि तेज बाढ़ ने निर्माण की गुणवत्ता और कार्ययोजना पर सवाल खड़े कर दिए।

क्षत-विक्षत नदी तट की तस्वीरें बताती हैं कि मंदाकिनी के स्वाभाविक प्रवाह को ध्यान में रखे बिना किए गए निर्माण कितने भारी पड़ सकते हैं। आरोग्यधाम तट पर नदी के किनारे लगे पुराने पेड़ों के उखड़ने और कांक्रीट की संरचनाओं के क्षतिग्रस्त होने से पर्यावरणविदों और नदी संरक्षण से जुड़े लोगों की चिंता बढ़ गई है। आरोप है कि नमामि गंगे प्रोजेक्ट के नाम पर नदी को प्राकृतिक रूप से संवारने के बजाय कांक्रीट का सहारा लिया गया, जिसका खामियाजा अब नदी और उसके आसपास के पर्यावरण को भुगतना पड़ रहा है।

जानकारों के अनुसार मंदाकिनी नदी के संरक्षण के लिए जल संसाधन विभाग (बाणसागर लोवर पुरवा) ने नमामि गंगे प्रोजेक्ट के तहत 24.62 करोड़ रुपये की कार्ययोजना तैयार की थी। योजना में नदी के किनारे कटाव रोकने और घाटों के निर्माण सहित कई कार्य प्रस्तावित किए गए। आरोग्यधाम में मंदाकिनी के दाहिने तट पर 600 मीटर लंबी और सात मीटर ऊंची कांक्रीट की प्रोटेक्शन वॉल बनाने का प्रावधान किया गया था।

बताया जाता है कि इस कार्ययोजना के पीछे तर्क यह था कि मंदाकिनी के प्रवाह के कारण नदी के किनारों पर कटाव और क्षरण बढ़ रहा है। ऐसे में तट की सुरक्षा के लिए पक्की दीवार जरूरी है। हालांकि, नदी संरक्षण से जुड़े जानकार सवाल उठा रहे हैं कि इतनी बड़ी कांक्रीट संरचना के निर्माण का निर्णय किस वैज्ञानिक अध्ययन के आधार पर लिया गया। उनका कहना है कि नदी के प्राकृतिक प्रवाह, जलस्तर और बाढ़ के दौरान उसके फैलाव का समुचित आकलन किए बिना ऐसे निर्माण करना नदी के लिए नुकसानदेह हो सकता है।

आरोप यह भी है कि कार्ययोजना तैयार करते समय सर्वोच्च न्यायालय के दिशा-निर्देशों और राष्ट्रीय हरित अधिकरण की गाइडलाइन को दरकिनार किया गया। हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। नदी संरक्षण से जुड़े लोगों की मांग है कि पूरे प्रोजेक्ट की स्वीकृति, पर्यावरणीय आकलन और निर्माण प्रक्रिया की निष्पक्ष जांच कराई जाए।

उपलब्ध जानकारी के मुताबिक 10 जनवरी 2023 को प्रोजेक्ट का वर्क ऑर्डर उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर की पीसीएस बिल्डर्स को दिया गया था। बताया गया है कि कंपनी को निर्धारित लागत से 17 फीसदी कम दर पर काम मिला था। टेंडर की शर्तों के अनुसार दिसंबर 2025 तक प्रोजेक्ट पूरा हो जाना चाहिए था। लेकिन निर्धारित समय सीमा के बाद भी काम अधूरा रहा।

नदी संरक्षण से जुड़े लोगों का आरोप है कि जिम्मेदार विभाग ने अधूरे काम की स्थिति में भी गंभीरता नहीं दिखाई। उनका कहना है कि यदि समय पर काम पूरा हो जाता और निर्माण की गुणवत्ता की जांच होती तो बाढ़ के दौरान नुकसान की स्थिति अलग हो सकती थी। अब जब तेज बारिश और बाढ़ के कारण अधूरे निर्माण को नुकसान पहुंचा है, तब इस बात की आशंका जताई जा रही है कि पूरा दोष प्राकृतिक आपदा के सिर मढ़कर दोबारा बजट की मांग की जा सकती है।

हालांकि, इस संबंध में विभाग की ओर से कोई आधिकारिक स्पष्टीकरण सामने नहीं आया है। यह भी स्पष्ट नहीं है कि बाढ़ से हुए नुकसान का आकलन किस स्तर पर किया गया है और निर्माण एजेंसी के खिलाफ क्या कार्रवाई प्रस्तावित है।

नदी संरक्षण अभियान से जुड़े नदी मित्र अभिमन्यु सिंह का कहना है कि मंदाकिनी नदी का वास्तविक स्वरूप वर्ष 2023 में आई बाढ़ के दौरान सामने आ चुका था। उस समय नदी के तेज प्रवाह और बाढ़ के फैलाव ने यह स्पष्ट कर दिया था कि नदी को उसके प्राकृतिक स्वरूप में समझे बिना किए गए निर्माण कितने जोखिम भरे हो सकते हैं। दाकिनी के संरक्षण के नाम पर नदी तट पर किए गए अधिकांश कार्य कांक्रीट आधारित हैं। आरोग्यधाम के सामने बाएं तट पर 125 मीटर, स्फटिक शिला में 75 मीटर और मोहकम गढ़ में 1.2 मीटर लंबे तीन पक्के घाटों का निर्माण किया गया है। उन्होंने कहा कि नदी के किनारे प्राकृतिक संरक्षण के बजाय पक्के निर्माण किए जा रहे हैं, जिससे नदी का स्वाभाविक स्वरूप प्रभावित हो रहा है।

चित्रकूट की पहचान केवल धार्मिक स्थलों से नहीं, बल्कि मंदाकिनी के किनारे बसे घने वनों और प्राकृतिक वातावरण से भी रही है। नदी संरक्षण से जुड़े लोगों का कहना है कि पिछले कुछ दशकों में यहां के प्राकृतिक क्षेत्र में तेजी से बदलाव आया है। सिरसा वन, श्रृंगार वन और प्रमोद वन जैसे क्षेत्र, जो कभी घने तपोवन के रूप में पहचाने जाते थे, अब पहले जैसे नहीं रह गए हैं।

मंदाकिनी के आरोग्यधाम तट पर नमामि गंगे प्रोजेक्ट के निर्माण कार्यों को हुए नुकसान के बाद अब सबसे बड़ा सवाल जवाबदेही का है। 24.62 करोड़ रुपये की लागत वाली कार्ययोजना में किए गए निर्माण की गुणवत्ता, नदी के प्राकृतिक प्रवाह का अध्ययन, पर्यावरणीय दिशा-निर्देशों के पालन और निर्माण की समय सीमा जैसे मुद्दों पर जांच की जरूरत महसूस की जा रही है।

नदी संरक्षण से जुड़े लोगों का कहना है कि बाढ़ को केवल प्राकृतिक आपदा मानकर निर्माण की खामियों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। नदी के स्वभाव को समझकर योजनाएं तैयार करना और प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण करना जरूरी है। उनका कहना है कि मंदाकिनी को बचाने के नाम पर यदि उसके किनारे कांक्रीट का विस्तार ही किया जाता रहा तो आने वाले समय में नदी और पर्यावरण दोनों को नुकसान हो सकता है।

चित्रकूट के धार्मिक और पर्यावरणीय महत्व को देखते हुए अब लोगों की निगाहें प्रशासन और जल संसाधन विभाग की अगली कार्रवाई पर टिकी हैं। क्या प्रोजेक्ट की स्वतंत्र जांच होगी, क्या निर्माण की गुणवत्ता और कार्ययोजना की समीक्षा की जाएगी और क्या प्राकृतिक स्वरूप को बहाल करने की दिशा में कदम उठाए जाएंगे—इन सवालों के जवाब अभी बाकी हैं।

हिन्दुस्थान समाचार / हीरेन्‍द्र द्विवेदी

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