कथनी से नहीं, करनी से आता है परिवर्तन; मातृशक्ति करेगी सशक्त राष्ट्र का निर्माण

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कथनी से नहीं, करनी से आता है परिवर्तन; मातृशक्ति करेगी सशक्त राष्ट्र का निर्माण


कथनी से नहीं, करनी से आता है परिवर्तन; मातृशक्ति करेगी सशक्त राष्ट्र का निर्माण


राष्ट्र सेविका समिति के विजयादशमी उत्सव में अखिल भारतीय प्रमुख कार्यवाहिका अन्नदानम सीता अक्का का आह्वान, बोलीं- सीता जैसी माताएं तैयार होंगी तो राम जैसे व्यक्तित्व स्वतः उभरेंगे

उज्जैन, 17 अक्टूबर (हि.स.) । राष्ट्र निर्माण की नींव सशक्त, संस्कारित और आत्मनिर्भर मातृशक्ति में निहित है। समाज और राष्ट्र में स्थायी परिवर्तन भाषणों से नहीं, आचरण, अनुशासन और कर्तव्यनिष्ठा से आता है। जब माताएं अपने बच्चों में संस्कार, आत्मविश्वास और राष्ट्र के प्रति समर्पण का भाव जगाती हैं, तब समाज को दिशा देने वाले व्यक्तित्व तैयार होते हैं। राष्ट्र सेविका समिति के उज्जैन विभाग द्वारा आयोजित विजयादशमी उत्सव के प्रकट कार्यक्रम में मुख्य वक्ता के रूप में उक्त विचार राष्ट्र सेविका समिति की अखिल भारतीय प्रमुख कार्यवाहिका अन्नदानम सीता अक्का ने राष्ट्र निर्माण में महिलाओं की भूमिका, भारतीय संस्कृति एवं संस्कारों के संरक्षण और समाज जीवन में मातृशक्ति के योगदान पर विस्तार से मार्गदर्शन देते हुए व्यक्त किए।

उन्होंने कहा, “इस देश में यदि मां सीता तैयार होगी तो अपने आप श्रीराम भी तैयार होंगे।” उन्होंने भारतीय नारी की सामर्थ्य पर विश्वास जताते हुए कहा कि मातृशक्ति में ऐसे अनेक व्यक्तित्व गढ़ने की क्षमता है, जो राष्ट्र के गौरव और सामर्थ्य को नई ऊंचाइयों तक पहुंचा सकते हैं। उन्होंने कहा कि सशक्त राष्ट्र के निर्माण के लिए महिलाओं का आत्मबल, संगठन, अनुशासन और सामाजिक दायित्वबोध आवश्यक है। महिला और पुरुष मिलकर जब राष्ट्रहित में कार्य करते हैं, तब परिवर्तन की व्यापक संभावनाएं आकार लेती हैं।

इस दौरान महिषासुर के वध का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि देवताओं और देवी की संयुक्त शक्ति ने असुर का अंत किया। यह प्रसंग सामूहिक सामर्थ्य और एकजुट प्रयासों की महत्ता को सामने रखता है।

जीजामाता की तरह राष्ट्रनिष्ठ पीढ़ी तैयार करे मातृशक्ति

अन्नदानम सीता अक्का ने छत्रपति शिवाजी महाराज के व्यक्तित्व निर्माण में जीजामाता की भूमिका का उल्लेख करते हुए कहा कि भारतीय नारियों में अनेक शिवाजी तैयार करने का सामर्थ्य है। मां अपने बच्चों को सही दृष्टि, संस्कार और जीवन के उद्देश्य का बोध कराती है तो उसका प्रभाव परिवार से आगे बढ़कर समाज तक पहुंचता है। संस्कारित परिवार ही ऐसे समाज की आधारशिला बनते हैं, जहां कर्तव्य, साहस, आत्मसम्मान और राष्ट्र के प्रति समर्पण को महत्व दिया जाता है।

उन्होंने कहा कि मातृशक्ति को अपनी अंतर्निहित क्षमता पहचानते हुए समाज जीवन में सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए। महिलाओं का विकास शिक्षा, आत्मनिर्भरता और व्यक्तिगत उन्नति तक सीमित विषय नहीं है, इसका व्यापक संबंध सामाजिक चेतना और राष्ट्र के भविष्य से भी है। उनके अनुसार, जब महिलाएं आत्मविश्वास के साथ संगठित होकर आगे बढ़ती हैं, तब समाज में सकारात्मक बदलाव की राह खुलती है।

1936 में हुई थी राष्ट्र सेविका समिति की स्थापना

समिति की स्थापना का उल्लेख करते हुए अक्का ने बताया कि वंदनीया लक्ष्मीबाई केलकर, जिन्हें मौसीजी के नाम से जाना जाता है, ने वर्ष 1936 में विजयादशमी के दिन महाराष्ट्र के वर्धा में राष्ट्र सेविका समिति की स्थापना की थी। समिति का उद्देश्य तेजस्वी राष्ट्र का निर्माण करना है। इसका सूत्रवाक्य है, ‘स्त्री राष्ट्र की आधारशिला है।’

उन्होंने कहा कि इसी विचार को केंद्र में रखकर समिति महिलाओं और बालिकाओं के सर्वांगीण विकास के लिए विभिन्न गतिविधियां संचालित करती है। सेवा प्रकल्पों, प्रशिक्षण वर्गों, आरोग्य शिविरों और संस्कार केंद्रों के माध्यम से महिलाओं तथा वंचित बालिकाओं को आत्मनिर्भर बनाने का प्रयास किया जाता है। देशभर में दैनिक और साप्ताहिक शाखाओं के माध्यम से योग, खेल, देशभक्ति गीत और बौद्धिक चर्चाओं जैसी गतिविधियां आयोजित की जाती हैं। इन गतिविधियों का उद्देश्य महिलाओं में नेतृत्व क्षमता, अनुशासन, आत्मविश्वास और सामाजिक दायित्व की भावना विकसित करना है।

अक्का ने कहा कि किसी भी संगठन की वास्तविक शक्ति उसके सदस्यों की एकजुटता, समर्पण और कर्तव्यपालन में होती है। जब मातृशक्ति अपने उद्देश्य के प्रति प्रतिबद्ध रहती है और समाज के हित में सक्रिय योगदान देती है, तब संगठन सामाजिक परिवर्तन का माध्यम बनता है। उन्होंने समिति की नौ दशक लंबी यात्रा को महिलाओं में संस्कार, आत्मविश्वास और राष्ट्रनिष्ठा का भाव जागृत करने वाला अनुभव बताया।

नौ दशक की यात्रा, संस्कार और सेवा पर जोर

राष्ट्र सेविका समिति के 90 वर्ष पूरे होने के संदर्भ में अक्का ने कहा कि यह यात्रा समाज और राष्ट्र के प्रति समर्पण की प्रेरणा देती है। बदलते सामाजिक परिवेश और नई वैचारिक चुनौतियों के बीच अपनी सांस्कृतिक जड़ों, मूल्यों और परंपराओं को जीवित रखते हुए आगे बढ़ना आवश्यक है। उन्होंने मातृशक्ति से आह्वान किया कि वह अपने दायित्वों को समझे, समाज के प्रति संवेदनशील रहे और राष्ट्र की उन्नति में सक्रिय भागीदारी निभाए।

उनके संबोधन का केंद्रीय संदेश यही रहा कि समाज में बदलाव का आधार व्यक्ति का आचरण और उसके दैनिक जीवन के कर्म हैं। विचारों को व्यवहार में उतारे बिना व्यापक परिवर्तन की कल्पना अधूरी रहती है। माताओं के संस्कार, महिलाओं का आत्मबल और संगठन की सामूहिक शक्ति मिलकर समाज को नई दिशा दे सकते हैं।

घोष, दंड संचालन और व्यायाम योग से दिखाया कौशल

विजयादशमी उत्सव के अंतर्गत आयोजित प्रकट कार्यक्रम में अतिथियों ने दीप प्रज्वलन और शस्त्र पूजन किया। इसके बाद राष्ट्र सेविका समिति की सेविकाओं ने शाखा लगाकर प्रार्थना की और शारीरिक गतिविधियों का प्रदर्शन किया। कार्यक्रम में घोष, दंड संचालन, यष्टि, नियुद्ध और व्यायाम योग की प्रस्तुतियां दी गईं। सेविकाओं ने सामूहिक और व्यक्तिगत गीतों के माध्यम से भी अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन किया।

सेविकाओं की उत्साही भागीदारी ने आयोजन को जीवंत स्वरूप प्रदान किया। संस्कृति, शौर्य, अनुशासन और सेवा के संदेश के साथ कार्यक्रम का समापन वंदे मातरम् के गायन से हुआ। उज्जैन विभाग की बड़ी संख्या में मातृशक्ति कार्यक्रम में उपस्थित रही।

विभाग कार्यवाहिका दीपा केवलिया ने बताया कि कार्यक्रम की अध्यक्षता डॉ. नलिनी लंगर ने की। उल्लेखनीय है कि मुख्य वक्ता अन्नदानम सीता अक्का मूलतः भाग्यनगर, तेलंगाना की निवासी हैं। वे बाल्यावस्था से ही समिति से जुड़ीं और वर्ष 1994 से पूर्णकालिक प्रचारिका के रूप में कार्य कर रही हैं। प्रांत प्रचारिका और क्षेत्र प्रचारिका जैसे दायित्वों का निर्वहन करने के बाद वर्तमान में वे समिति की अखिल भारतीय प्रमुख कार्यवाहिका के दायित्व पर कार्यरत हैं।

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हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. मयंक चतुर्वेदी

Livevns.news Desk
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