परंपरा और स्वावलंबन की अनूठी मिसाल बनी बालाघाट की नसीबा खान

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परंपरा और स्वावलंबन की अनूठी मिसाल बनी बालाघाट की नसीबा खान


- स्वदेश का धागा – ग्रामीण भारत की करघे से बुनी कहानी

भोपाल, 07 मार्च (हि.स.)। हाउस ऑफ़ तसल्ली स्टार्टअप-राफ्टएंडरसन प्रायवेट लिमिटेड के प्रयास और “विमेन वीव” के सहयोग से मध्य प्रदेश के बालाघाट जिले के मेहंदीवाड़ा (वारा सिवनी) गांव की बुनकर नसीबा खान अपने करघे से परंपरा और स्वावलंबन की अनूठी मिसाल प्रस्तुत कर रही हैं।

उनके हाथों से हाथ-कांते ऑर्गेनिक कपास पर बुना गया स्टोल केवल वस्त्र नहीं, बल्कि सादगी, स्वदेशी और आत्मनिर्भरता की भावना का प्रतीक है। इसमें बुना गया चरखे का मोटिफ महात्मा गांधी के स्वदेशी और महिला स्वावलंबन के विचारों को समर्पित है।

जनसम्पर्क अधिकारी लक्ष्मण सिंह ने शनिवार को जानकारी देते हुए बताया कि करीब दो दिनों के अथक श्रम से तैयार यह डिजाइन करघे की लय और ग्रामीण भारत की रचनात्मकता को दर्शाता है। यह पहल न केवल पारंपरिक हथकरघा कला को जीवित रखने का प्रयास है, बल्कि ग्रामीण महिलाओं को सम्मानजनक आजीविका से जोड़ने की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण कदम है। स्पर्श में कोमल और आकर्षण में कालातीत यह स्टोल ग्रामीण भारत की उस सृजनशील शक्ति का प्रतीक है, जो परंपरा और आधुनिकता को एक साथ बुनती है।

सृजन को गांधी पीस फाउंडेशन से संबद्ध सेनि आईपीएस अनुराधा शंकर के द्वारा वेटिकन सिटी के धर्मगुरू पोप तथा अन्य को रोम के एक कार्यक्रम में 26 अक्टूबर 2025 को भेंट किया गया। इस कल्पना को साकार करने में नर्मदापुरम की महिला उद्यमी रत्नम और राकेश ने अपना योगदान दिया है।

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हिन्दुस्थान समाचार / मुकेश तोमर

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