स्वदेशी केवल एक सामान नहीं, बल्कि एक भाव है : लोकेन्द्र सिंह राजपूत
भोपाल, 01 नवम्बर (हि.स.)। माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के सहायक प्राध्यापक, लेखक और चिंतक लोकेन्द्र सिंह राजपूत ने कहा कि स्वदेशी केवल एक सामान या उत्पाद नहीं, बल्कि एक भाव है।
लोकेन्द्र सिंह राजपूत रविवार को स्वदेशी जागरण मंच और स्वर्णिम भारतवर्ष फाउंडेशन की ओर से भोपाल के शासकीय मोतीलाल विज्ञान महाविद्यालय परिसर में 24 अक्टूबर से 4 नवंबर तक आयोजित स्वदेशी मेले को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि स्वदेशी की बात पर कई लोगों को आपत्ति होती है और वे इसका उपहास उड़ाते हैं। ऐसे लोगों की बातों पर ध्यान देने के बजाय हमें अपने स्वदेशी विचार और उत्पादों को आगे बढ़ाने के लिए काम करना चाहिए।
यूपीआई की सफलता स्वदेशी तकनीक का उदाहरण
राजपूत ने कहा कि जो लोग भारत से प्रेम नहीं करते, वे स्वदेशी का उपहास उड़ाते हैं। हालांकि आज दुनिया के कई बड़े देश भी अपने यहां स्वदेशी अपनाने की बात कर रहे हैं। स्वदेशी का अर्थ केवल छोटे उत्पादों और लघु उद्योगों को बढ़ावा देना नहीं है, बल्कि देश में बड़े उद्योगों और तकनीकी क्षमताओं का विकास करना भी है।
उन्होंने कहा कि भारत में बना यूपीआई इसका बड़ा उदाहरण है। इसे देश के इंजीनियरों ने विकसित किया है। जब यूपीआई की शुरुआत हुई थी, तब कई लोगों ने इसका उपहास उड़ाया था। इनमें कुछ ऐसे लोग भी थे, जो वित्त मंत्री या वित्त से जुड़े महत्वपूर्ण पदों पर थे। लेकिन आज कई देशों में यूपीआई का उपयोग हो रहा है। इसकी सफलता बताती है कि भारतीय तकनीक दुनिया में अपनी पहचान बना सकती है।
उन्होंने कहा कि स्वदेशी की बात आने पर हमारा ध्यान अक्सर इस ओर जाता है कि सरकार को क्या करना चाहिए, लेकिन नागरिक के तौर पर भी हमारी कुछ जिम्मेदारियां हैं। हर बात के लिए सरकार पर निर्भर नहीं रहा जा सकता। कई बार अंतरराष्ट्रीय नीतियों के कारण सरकारों की भी कुछ सीमाएं होती हैं। ऐसे में नागरिकों का कर्तव्य है कि वे अपने स्तर पर स्वदेशी उत्पादों को प्राथमिकता दें।
इस संदर्भ में उन्होंने अमेरिका में संतरे के अत्यधिक उत्पादन का उदाहरण दिया। उन्होंने बताया कि एक बार अमेरिका में संतरे का बहुत अधिक उत्पादन हो गया था। उस समय जापान की महिलाओं को संतरे पसंद थे, इसलिए अमेरिका ने अपने संतरे जापान के बाजार में भेज दिए। वहां के बाजार में अमेरिकी संतरे उपलब्ध होने के बावजूद जापानी महिलाओं ने उनका विरोध किया और उन्हें नहीं खरीदा। इस उदाहरण से स्पष्ट होता है कि किसी देश के नागरिक अपने बाजार और उत्पादों के प्रति कितने सजग हो सकते हैं। हमें भी संकल्प लेना चाहिए कि अपनी क्षमता के अनुसार स्वदेशी सामान ही खरीदेंगे।
स्वदेशी उत्पाद खरीदने से देश में ही रहेगा पैसा: गौरव कुलश्रेष्ठ
स्वदेशी परमार संस्थान के अखिल भारतीय प्रमुख गौरव कुलश्रेष्ठ ने कहा कि स्वदेशी उत्पादों की सही पहचान और उनके उपयोग को बढ़ावा देने के उद्देश्य से संस्थान का गठन किया गया है। उन्होंने कहा कि दीपावली पर दिये, मोमबत्तियां, कपड़े या अन्य सामान खरीदते समय यह ध्यान रखना चाहिए कि उससे मिलने वाला पैसा किसी भारतीय कारीगर, उद्यमी या रोजगार से जुड़े व्यक्ति तक पहुंचे। हमारा पैसा देश में ही रहना चाहिए, किसी दूसरे देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत करने में नहीं जाना चाहिए।
130 स्वदेशी मेलों के आयोजन का लक्ष्य: श्रीकांत भदोलिया
मेले की प्रस्तावना देते हुए श्रीकांत भदोलिया ने कहा कि स्वदेशी जागरण मंच की स्थापना 1991 में हुई थी। तभी से यह विचार स्पष्ट रहा है कि भारत को आत्मनिर्भर बनाना है तो स्वदेशी उत्पादों का उपयोग बहुत जरूरी है। इसी उद्देश्य से वर्ष 1992 से स्वदेशी मेलों के आयोजन की परंपरा शुरू की गई। इस वर्ष देशभर में 130 मेले आयोजित करने का लक्ष्य रखा गया है। इनके माध्यम से स्थानीय उत्पादों और महिला उद्यमियों को सहयोग देना है, ताकि स्वदेशी जागरण मंच का स्वावलंबन का उद्देश्य पूरा हो सके और देश आत्मनिर्भर बन पाए।
स्वदेशी मेले के नौवें दिन हुई थाली सजाओ प्रतियोगिता, साधना शर्मा रहीं प्रथम
मेले के नौवें दिन रविवार को थाली सजाओ प्रतियोगिता आयोजित की गई। इसमें प्रतिभागियों ने त्योहार, पूजा और पर्यावरण अनुकूल विषयों पर आधारित थालियां सजाईं। प्रतियोगिता का उद्देश्य केवल थाली सजाने तक सीमित नहीं था, बल्कि इसके माध्यम से स्वदेशी वस्तुओं को अपनाने और उनके उपयोग का संदेश देना भी था। प्रतिभागियों को थाली सजाने में अधिक से अधिक स्वदेशी वस्तुओं का उपयोग करने के लिए प्रोत्साहित किया गया।
प्रतियोगिता में साधना शर्मा ने प्रथम, मनीषा जैन ने द्वितीय, आर्यन रघुवंशी ने तृतीय, कनक सक्सेना ने चतुर्थ और प्रीति व्यास ने पंचम स्थान प्राप्त किया। प्रतियोगिता में शामिल सभी प्रतिभागियों को प्रमाणपत्र दिए गए। पांचों विजेताओं को उपहार स्वरूप तुलसी का पौधा भेंट किया गया।
अहोई अष्टमी और स्वदेशी परंपराओं से जोड़ना था प्रतियोगिता का उद्देश्य
मेले की सह संयोजक और सांस्कृतिक एवं प्रतियोगिता प्रमुख सीमा भारद्वाज ने बताया कि प्रतियोगिता का उद्देश्य केवल थाली सजवाना नहीं, बल्कि स्वदेशी के विचार को आगे बढ़ाना और लोगों को अपनी परंपराओं से जोड़ना था। उन्होंने कहा कि अहोई अष्टमी जैसे पर्वों के बारे में भी लोगों को जानकारी हो और वे इन पर्वों को पहचानें। प्रतियोगिता में एक प्रतिभागी ने चावल के तीन रंगों के दानों से तिरंगा बनाया, जो विशेष आकर्षण का केंद्र रहा।
सीमा भारद्वाज ने बताया कि लायंस क्लब की ओर से उन्हें 50 तुलसी के पौधे दिए गए हैं। इन पौधों को प्रतियोगिता के विजेताओं और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भाग लेने वाले प्रतिभागियों को भेंट किया जाएगा। इसके साथ ही 'दामिनी की आवाज' की संस्थापिका अनीता आर्य ने दुर्गा की शक्ति पर मंचीय प्रस्तुति देने वाले 25 बच्चों को पुरस्कृत करने की बात कही है।
योगासन, भजन और लोकनृत्य की प्रस्तुतियों ने बांधा समां
मेले के नौवें दिन सांस्कृतिक कार्यक्रम में गुरुकुल के विद्यार्थियों ने योगासनों की प्रस्तुति दी। मुक्ता डांस अकादमी के कलाकारों ने रंगारंग नृत्य प्रस्तुति दी। इसके साथ ही भजन संध्या और लोकनृत्य सहित अन्य सांस्कृतिक प्रस्तुतियां भी हुईं।
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हिन्दुस्थान समाचार / मुकेश तोमर

