मप्रः श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के पावन अवसर पर 29 स्थलों पर होगा ‘श्रीकृष्ण पर्व’

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मप्रः श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के पावन अवसर पर 29 स्थलों पर होगा ‘श्रीकृष्ण पर्व’


- श्रीकृष्ण की लीलाओं एवं उनके विविध स्वरूपों को कलाकार अपनी प्रस्तुतियों के माध्यम से करेंगे जीवंत

भोपाल, 31 अगस्त (हि.स.)। मध्य प्रदेश में श्रीकृष्‍ण पाथेय न्‍यास, संस्‍कृति विभाग द्वारा श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के पावन अवसर पर प्रदेशभर के 29 ऐतिहासिक, धार्मिक एवं सांस्कृतिक महत्त्व के स्थलों पर ‘श्रीकृष्ण पर्व’ का आयोजन किया जा रहा है। यह प्रतिष्ठित आयोजन आस्था और कला का अद्भुत संगम बनेगा। भगवान श्रीकृष्ण के जीवन - दर्शन, उन की लीलाओं, लोकमंगल की भावना एवं भारतीय संस्कृति में रचे बसे उनके विविध स्वरूपों को प्रदेश एवं देश के ख्यातिलब्ध कलाकार अपनी सशक्त और मनोहारी प्रस्तुतियों के माध्यम से जीवंत करेंगे।

संस्कृति संचालक एन.पी. नामदेव ने सोमवार को बताया कि संगीत, नृत्य, नाट्य एवं अन्य पारंपरिक कला रूपों के माध्‍यम से इन स्थलों की ऐतिहासिकता, पौराणिकता और सांस्कृतिक विशिष्टता को रेखांकित किया जाएगा। यह आयोजन केवल उत्सव नहीं, बल्कि श्रीकृष्ण के जीवन-संदेश, सांस्कृतिक चेतना और भारत की समृद्ध कला परंपराओं को जन-जन तक पहुंचाने का एक अभिनव प्रयास होगा, जिसमें हर स्थल अपनी विशिष्ट पहचान के साथ श्रीकृष्णमय वातावरण में रंगा नजर आएगा।

उन्होंने बताया कि श्रीकृष्ण पर्व के लिए चयनित 29 स्थलों में अनेक ऐसे पावन और ऐतिहासिक स्थल सम्मिलित हैं, जिनकी परंपराएं सीधे तौर पर द्वापर युग और भगवान श्रीकृष्ण के जीवन-प्रसंगों से जुड़ी हुई हैं। इनमें सांदीपनी आश्रम – उज्जैन, नारायणा धाम – उज्जैन, अमझेरा, जानापाव – महू एवं जामगढ़ – रायसेन जैसे स्थल प्रमुख हैं। इसके साथ ही आयोजन स्थलों में अनेक ऐसे प्राचीन मंदिर और धार्मिक केंद्र भी शामिल हैं, जिनका धार्मिक एवं सांस्कृतिक महत्त्व होने के साथ-साथ गौरवशाली ऐतिहासिक अतीत भी है।

नामदेव ने बताया कि मध्य प्रदेश की धरती भगवान श्रीकृष्ण से जुड़े अनेक ऐतिहासिक, पौराणिक और सांस्कृतिक संदर्भों को अपने भीतर समेटे हुए है। भगवान श्रीकृष्‍ण के जीवन के विभिन्‍न पहलुओं एवं लीलाओं के लोकव्‍यापीकरण, सनातन संस्‍कृति के विस्‍तार के साथ ही उनके द्वारा बताए जीवन मूल्‍यों यथा धैर्य, मित्रता, करुणा, दया इत्‍यादि जनमानस तक प्रेषित करने के उद्देश्‍य से माननीय मुख्‍यमंत्री डॉ. मोहन यादव के मंशानुरूप श्रीकृष्‍ण पर्व के माध्‍यम से सांस्‍कृतिक परिदृश्‍य में दर्शाने का प्रयास किया जा रहा है।

उन्होंने बताया कि इन आयोजनों के माध्यम से न केवल इन स्थलों की ऐतिहासिक, धार्मिक और सांस्कृतिक विशिष्टता को व्यापक पहचान मिल रही है, बल्कि नई पीढ़ी भी मध्यप्रदेश की समृद्ध विरासत और गौरवपूर्ण इतिहास से परिचित हो रही है। यह पहल आस्था के उत्सव के साथ-साथ विरासत के संरक्षण, सांस्कृतिक पुनर्स्मरण और प्रदेश की ऐतिहासिक पहचान को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का सशक्त माध्यम बन रही है। इस वर्ष श्रीकृष्ण पर्व के आयोजन स्थलों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि की गई है। प्रदेश के विभिन्न अंचलों में होने वाली स्‍थानीय गतिविधियों को विस्‍तार करने के लिए सांस्कृतिक महत्‍व के स्थलों को चिन्हित कर वहां आयोजन किए जा रहे हैं।

भगवान श्रीकृष्‍ण से जुड़े मध्‍य प्रदेश के स्‍थल

सांदीपनि आश्रम, उज्‍जैन

उज्‍जैन का नाम आते ही बाबा महाकाल का नाम ध्‍यान में आ जाता है, लेकिन यही वह भूमि भी है जहां भगवान श्रीकृष्‍ण ने अपने जीवन का सबसे महत्‍वपूर्ण अध्‍याय लिखा। मान्‍यता है कि भगवान श्रीकृष्‍ण सांदीपनि आश्रम में 64 दिवस तक रहे। इस अवधि में उन्‍होंने 64 विद्याओं और 16 कलाओं का ज्ञान प्राप्‍त किया। परंपराओं के अनुसार उन्‍होंने चार दिनों में चार वेद, 18 दिनों में 18 पुराण ओर छह दिनों में छह शास्‍त्रों का अध्‍ययन किया।

मान्‍यता है कि इसी आश्रम में भगवान शिव और भगवान श्रीकृष्‍ण का दिव्‍य मिलन हुआ था। भारतीय संस्‍कृति में इसे हरि और हर के पावन मिलन के रूप में देखा जाता है। उज्‍जैन वह स्‍थान है, जहां ज्ञान ने व्‍यक्तित्‍व को आकार दिया, जहां गुरु ने शिष्‍य को दिशा दी, जहां मित्रता ने आदर्श स्‍थापित किया और जहां से योगेश्‍वर श्रीकृष्‍ण की यात्रा ने नई ऊंचाईयों की ओर कदम बढ़ाया। सांदीपनि आश्रम के आसपास ‘सांदीपनि लोक’ विकसित करने की योजना को भगवान श्रीकृष्ण से जुड़े धार्मिक एवं सांस्कृतिक पर्यटन को नई पहचान देने वाली परियोजना के रूप में प्रस्तुत किया गया है। इसमें भगवान श्रीकृष्ण की 108 फीट ऊंची प्रतिमा, लगभग 9 थीम आधारित जोन तथा आधुनिक डिजिटल/AR-VR अनुभव जैसी अवधारणाएँ शामिल हैं। इसका उद्देश्य श्रद्धालुओं को केवल दर्शन तक सीमित न रखते हुए श्रीकृष्ण के जीवन, शिक्षा, गुरुकुल परंपरा और भारतीय ज्ञान-विरासत का अनुभवात्मक परिचय देना है। प्रदेश में भगवान श्रीकृष्ण से जुड़े स्थलों को एक व्यापक सांस्कृतिक-तीर्थ पर्यटन श्रृंखला से जोड़ने के लिए ‘श्रीकृष्ण पाथ’ विकसित किया जा रहा है। यह पहल मध्यप्रदेश की ‘विरासत से विकास’ की व्यापक सोच के अनुरूप है। सांदीपनि आश्रम पहले से ही उज्जैन के प्रमुख पर्यटन स्थलों में शामिल है।

श्री नारायणा धाम, उज्जैन

श्री नारायणा धाम मध्य प्रदेश के उज्जैन जिले की महिदपुर तहसील के ग्राम नारायणा में स्थित भगवान श्रीकृष्ण और सुदामा की मैत्री से जुड़ा महत्वपूर्ण धार्मिक स्थल है। यह स्थल उज्जैन की उस व्यापक कृष्ण-परंपरा का हिस्सा है, जिसमें सांदीपनि आश्रम को श्रीकृष्ण की विद्यास्थली और नारायणा धाम को श्रीकृष्ण-सुदामा की मैत्री एवं प्रवास की स्मृति से जुड़े स्थल के रूप में देखा जाता है। नारायणा धाम से जुड़ी लोक-परंपरा और धार्मिक मान्यता के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण और सुदामा ने गुरु सांदीपनि के आश्रम में शिक्षा ग्रहण करते समय यहां रात्रि विश्राम किया था। कथा के अनुसार, गुरु माता के निर्देश पर श्रीकृष्ण और सुदामा वन से लकड़ियां लेने गए थे। अचानक वर्षा होने के कारण वे वापस आश्रम नहीं लौट सके और एक वृक्ष के नीचे रात्रि बिताई। इसी प्रसंग को नारायणा धाम की धार्मिक पहचान से जोड़ा जाता है। स्थानीय परंपरा में यहां स्थित वृक्षों को भी इसी प्रसंग की स्मृति से जोड़ा जाता है। नारायणा धाम की विशिष्टता यह है कि यहां भगवान श्रीकृष्ण के साथ उनके बालसखा सुदामा की आराधना की जाती है। इस कारण यह स्थल केवल धार्मिक आस्था का केंद्र नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति में मित्रता, समानता, स्नेह और मानवीय संबंधों के आदर्श का प्रतीक भी बन गया है। वहां स्थित गोमती कुंड, अंकपात क्षेत्र और अन्य स्मृति-स्थल कृष्ण की शिक्षा-परंपरा से जुड़े हैं। नारायणा धाम के विकास को अब केवल स्थानीय मंदिर विकास तक सीमित न रखकर श्रीकृष्ण पाथेय की व्यापक अवधारणा से जोड़ा जा रहा है। मध्यप्रदेश सरकार ने भगवान श्रीकृष्ण से संबंधित स्थलों को धार्मिक, सांस्कृतिक और पर्यटन की दृष्टि से विकसित करने के लिए “श्रीकृष्ण पाथेय न्यास” का गठन किया गया है। भगवान श्रीकृष्ण से संबंधित क्षेत्रों का साहित्यिक एवं सांस्कृतिक संरक्षण-संवर्धन, मंदिरों एवं संरचनाओं का प्रबंधन, सांदीपनि गुरुकुल की स्थापना के लिए परामर्श तथा श्रीकृष्ण पाथेय के स्थलों का सामाजिक, आर्थिक और पर्यटन की दृष्टि से विकास किया जा रहा है।

अमझेरा, धार

मध्‍य प्रदेश के धार जिले में स्थित अमझेरा में इतिहास, आस्‍था और पौराणिक स्‍मृतियों की अनगिनत परतें समाई हुई हैं। लोक परंपराओं के अनुसार यही वह स्‍थान है, जहां भगवान श्रीकृष्‍ण और रुक्मिणी की दिव्‍य कथा का निर्णायक मोड़ आया था। अमझेरा का सबसे प्रमुख धार्मिक केंद्र मां अमका-झमका माता का प्राचीन मंदिर है। श्रद्धालुओं का विश्‍वास है कि यही वह स्‍थल है, जहां विदर्भ की राजकुमारी रुक्मिणी ने अपने जीवन के सबसे महत्‍वपूर्ण क्षणों में प्रार्थना की थी। पौराणिक कथाओं के अनुसार विदर्भ देश की राजकुमारी रुक्मिणी अत्‍यंत गुणवान, धर्मपरायण और तेजस्विनी थीं। उन्‍होंने भगवान श्रीकृष्‍ण के गुण, पराक्रम और लोककल्‍याणकारी व्‍यक्तित्‍व के बारे में सुना था। उनके मन में श्रीकृष्‍ण के प्रति गहरी श्रद्धा और समर्पण का भाव उत्‍पन्‍न हो चुका था। वे उन्‍हें अपना पति मान चुकी थीं। किन्‍तु परिस्थितियां अनुकूल नहीं थी। रुक्मिणी के भाई रुक्‍मी ने उनका विवाह चेदि नरेश शिशुपाल के साथ निश्चित कर दिया था। यह निर्णय रुक्मिणी की इच्‍छा के विपरीत था। जब रुक्मिणी के भाई रुक्‍मी को इस घटना का समाचार मिला, तब वह क्रोधित हो उठा। उसने अपनी सेना के साथ श्रीकृष्‍ण का पीछा किया। अमझेरा से लगभग 15 किलोमीटर दूर स्थित भोपावर क्षेत्र में दोनों पक्षों के बीच भीषण युद्ध हुआ। युद्ध में भगवान श्रीकृष्‍ण ने रुक्‍मी को पराजित कर दिया। मध्यप्रदेश सरकार ने अमझेरा को श्रीकृष्ण से जुड़े प्रमुख तीर्थ-स्थलों में शामिल करते हुए इसे विकसित करने की विशेष पहल की गई है। अमझेरा को तीर्थ नगरी के रूप में विकसित किया जा रहा है। यह विकास व्यापक “श्रीकृष्ण पाथेय” की अवधारणा के अंतर्गत किया जा रहा है।

जामगढ़ – रायसेन

रायसेन जिले की बरेली तहसील के ग्राम जामगढ़ के निकट विंध्याचल क्षेत्र में स्थित जामवंत गुफा भगवान श्रीकृष्ण, जामवंत और स्यमंतक मणि से जुड़े पौराणिक प्रसंग के कारण विशेष महत्व रखती है। स्यमंतक मणि के प्रसंग में भगवान श्रीकृष्ण और जामवंत के बीच इसी गुफा में 27 दिनों तक युद्ध हुआ था। युद्ध के दौरान जामवंत को यह अनुभूति हुई कि श्रीकृष्ण ही उनके आराध्य भगवान राम हैं; इसके बाद उन्होंने स्यमंतक मणि श्रीकृष्ण को सौंपकर अपनी पुत्री जाम्बवती का विवाह उनसे किया। जामगढ़ क्षेत्र का महत्व केवल कृष्ण-परंपरा तक सीमित नहीं है। यहां प्राचीन शिव उपासना से जुड़े स्थल, गुफाएं तथा अन्य पुरातात्विक अवशेष भी पाए जाते हैं और हाल के क्षेत्रीय सर्वेक्षणों में जामगढ़ के जंगलों में लगभग 800 मीटर लंबी पत्थरों पर पदचिह्नों वाली एक प्राचीन पगडंडी तथा प्रारंभिक नागरी लिपि का शिलालेख मिलने की जानकारी मिली है। मध्यप्रदेश सरकार ने जामगढ़ को भगवान श्रीकृष्ण से जुड़े स्थलों की व्यापक विकास अवधारणा ‘श्रीकृष्ण पाथेय’ में शामिल करने की दिशा में पहल की है। जामगढ़ के संबंध में इस पहल का एक महत्वपूर्ण पक्ष स्थल का शोधपरक परीक्षण और दस्तावेजीकरण है।

जुगल किशोर एवं श्री बलदेव जी मंदिर, पन्‍ना

पन्ना को प्राचीन मंदिरों और धार्मिक परंपराओं के कारण “मंदिरों की नगरी” के रूप में जाना जाता है। यहां स्थित श्री जुगल किशोर जी मंदिर और श्री बलदेव जी मंदिर पन्ना की धार्मिक एवं स्थापत्य विरासत के दो प्रमुख केंद्र हैं। श्री जुगल किशोर जी मंदिर का निर्माण पन्ना के चौथे बुंदेला शासक राजा हिंदूपत सिंह ने अपने शासनकाल (1758–1778) में कराया था। मंदिर के गर्भगृह में प्रतिष्ठित भगवान श्री जुगल किशोर जी की प्रतिमा के संबंध में स्थानीय परंपरा है कि इसे वृंदावन से ओरछा के मार्ग से पन्ना लाया गया था। मंदिर की स्थापत्य शैली में बुंदेला वास्तुकला की विशिष्ट विशेषताएं - नट मंडप, भोग मंडप और प्रदक्षिणा पथ - स्पष्ट दिखाई देती हैं तथा भगवान के आभूषण एवं वस्त्रों में बुंदेलखंडी परंपरा की झलक मिलती है। श्री बलदेव जी मंदिर पन्ना की धार्मिक विरासत के साथ-साथ अपनी विशिष्ट स्थापत्य शैली के कारण भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह मंदिर रोमन वास्तुकला से प्रेरित तथा गॉथिक प्रभाव वाला है। विशाल स्तंभों से युक्त इसका महा-मंडप ऊंचे चबूतरे पर निर्मित है, जिससे मुख्य द्वार के बाहर से भी श्रद्धालु भगवान के दर्शन कर सकते हैं। यहां भगवान बलदेव जी की आकर्षक प्रतिमा काले शालिग्रामी पत्थर से निर्मित है और यह मंदिर पन्ना की स्थापत्य कला की विशिष्ट उपलब्धियों में गिना जाता है। मध्यप्रदेश शासन द्वारा पन्ना के इन धार्मिक एवं ऐतिहासिक स्थलों को पर्यटन की दृष्टि से महत्व दिया गया है।

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हिन्दुस्थान समाचार / मुकेश तोमर

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