मप्रः सदानीरा समागम की अंतिम संध्या लोकसंगीत, संस्कृति और नर्मदा की महिमा से हुई सराबोर

WhatsApp Channel Join Now
मप्रः सदानीरा समागम की अंतिम संध्या लोकसंगीत, संस्कृति और नर्मदा की महिमा से हुई सराबोर


मप्रः सदानीरा समागम की अंतिम संध्या लोकसंगीत, संस्कृति और नर्मदा की महिमा से हुई सराबोर


मप्रः सदानीरा समागम की अंतिम संध्या लोकसंगीत, संस्कृति और नर्मदा की महिमा से हुई सराबोर


मप्रः सदानीरा समागम की अंतिम संध्या लोकसंगीत, संस्कृति और नर्मदा की महिमा से हुई सराबोर


मप्रः सदानीरा समागम की अंतिम संध्या लोकसंगीत, संस्कृति और नर्मदा की महिमा से हुई सराबोर


मप्रः सदानीरा समागम की अंतिम संध्या लोकसंगीत, संस्कृति और नर्मदा की महिमा से हुई सराबोर


मप्रः सदानीरा समागम की अंतिम संध्या लोकसंगीत, संस्कृति और नर्मदा की महिमा से हुई सराबोर


मप्रः सदानीरा समागम की अंतिम संध्या लोकसंगीत, संस्कृति और नर्मदा की महिमा से हुई सराबोर


भोपाल, 02 जून (हि.स.)। मध्य की राजधानी भोपाल के भारत भवन में वीर भारत न्यास द्वारा जल गंगा संवर्धन अभियान के तहत आयोजित सात दिवसीय सदानीरा समागम का समापन मंगलवार की शाम लोकसंगीत, लोकनाट्य और जल संस्कृति के विविध रंगों के साथ हुआ।

समापन समारोह में पूर्व रंग मंच पर सुप्रसिद्ध लोकगायिका शीला त्रिपाठी एवं दल ने जल केंद्रित बघेली लोकगीतों की प्रभावशाली प्रस्तुति दी। उनके गीतों में जल, नदी, प्रकृति और ग्रामीण जीवन की संवेदनाएँ सजीव हो उठीं, जिन्होंने दर्शकों को लोकसंस्कृति की जड़ों से जोड़ दिया। अंतरंग सभागार में भुंगर खान मंगणियार, जैसलमेर एवं उनके दल ने राजस्थान की समृद्ध मांगणियार गायन परंपरा का मनमोहक प्रदर्शन किया। प्रस्तुति में नदियों के सांस्कृतिक, धार्मिक और सामाजिक महत्व को लोकधुनों एवं गीतों के माध्यम से अभिव्यक्त किया गया। कमायचा, खड़ताल, ढोलक और हारमोनियम की सुरमयी संगति ने वातावरण को लोकरस से भर दिया।

समापन दिवस की अंतिम प्रस्तुति बहिरंग मंच पर कुलवीर सिंह, मुंबई द्वारा निर्देशित नाट्य प्रस्तुति “नर्मदा हर कंकर शंकर...” का मंचन था। यह नाटक नर्मदा नदी के आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और मानवीय पक्षों को संवेदनशीलता के साथ प्रस्तुत करता है। नाटक की केंद्रीय पात्र रेवा नर्मदा तट पर स्थित एक आश्रम में रहने वाली युवती है, जिसने अपना जीवन समाजसेवा के लिए समर्पित कर दिया है। वह आदिवासी समुदायों में शिक्षा, जनजागरूकता और महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए कार्य करती है। उसका जीवन नर्मदा की धारा की तरह शांत, अनुशासित और निरंतर प्रवाहित है।

कहानी में मोड़ तब आता है जब विदेश से आया शिक्षित और आधुनिक विचारों वाला युवक सागर नर्मदा परिक्रमा के दौरान आश्रम पहुंचता है। वह आश्रम को एक साधारण रिसोर्ट समझ लेता है और प्रारंभ में रेवा की जीवनशैली का उपहास करता है। इस व्यवहार से आहत होकर रेवा उससे दूरी बना लेती है। आगे चलकर नर्मदा की पौराणिक कथा एक लोकगायक के माध्यम से मंच पर जीवंत होती है, जिसमें शिव से उत्पन्न नर्मदा, सोनभद्र और जोहिला की कथा प्रस्तुत की जाती है। इसी क्रम में रेवा स्वयं नर्मदा के स्वरूप में दिखाई देती है, जो उसके त्याग, आध्यात्मिक चेतना और लोककल्याण की भावना का प्रतीक बन जाता है। नाटक ने नर्मदा को केवल एक नदी नहीं, बल्कि जीवन, संस्कृति और चेतना की सतत प्रवाहित धारा के रूप में प्रस्तुत किया।

कार्यक्रम के अंत में वीर भारत न्यास द्वारा सदानीरा समागम के लिए विशेष रूप से निर्मित स्मृति-चिह्न भेंट कर सभी कलाकारों का सम्मान किया गया।

---------------

हिन्दुस्थान समाचार / मुकेश तोमर

Share this story