मप्र: मंत्री प्रतिमा बागरी को जाति प्रमाण पत्र मामले में राहत, कांग्रेस ने फैसले पर उठाए सवाल

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मप्र: मंत्री प्रतिमा बागरी को जाति प्रमाण पत्र मामले में राहत, कांग्रेस ने फैसले पर उठाए सवाल


शिकायतकर्ता प्रदीप अहिरवार ने हाईकोर्ट जाने की घोषणा, जांच प्रक्रिया पर लगाए गंभीर आरोप

भोपाल, 17 जुलाई (हि.स.)। मध्य प्रदेश सरकार की राज्य मंत्री प्रतिमा बागरी के अनुसूचित जाति (एससी) प्रमाण पत्र को लेकर चल रहे विवाद में राज्य स्तरीय जाति छानबीन समिति ने उनके जाति प्रमाण पत्र को वैध मानते हुए शिकायत निरस्त कर दी है।

समिति के इस निर्णय के बाद कांग्रेस ने जांच प्रक्रिया और फैसले पर सवाल उठाए हैं। शिकायतकर्ता एवं मध्यप्रदेश कांग्रेस अनुसूचित जाति विभाग के अध्यक्ष प्रदीप अहिरवार ने निर्णय को हाईकोर्ट में चुनौती देने की घोषणा की है।

शुक्रवार को भोपाल में आयोजित पत्रकार वार्ता में अहिरवार ने आरोप लगाया कि समिति ने उनके द्वारा प्रस्तुत दस्तावेजों और ऐतिहासिक अभिलेखों पर पर्याप्त विचार नहीं किया। उनका दावा है कि जांच निष्पक्ष तरीके से नहीं हुई और सरकार के दबाव में निर्णय लिया गया। हालांकि, उन्होंने अपने आरोपों के समर्थन में न्यायालय जाने की बात कही।

ऐतिहासिक दस्तावेजों की अनदेखी का दावा

अहिरवार ने दावा किया कि उनकी शिकायत 1950 के संविधान (अनुसूचित जातियां) आदेश, 1961 एवं 1971 की जनगणना के रिकॉर्ड, ट्राइबल रिसर्च इंस्टीट्यूट (टीआरआई) की रिपोर्ट तथा अन्य शासकीय दस्तावेजों पर आधारित थी। उनका आरोप है कि समिति ने इन दस्तावेजों को निर्णय में पर्याप्त महत्व नहीं दिया।

1950 के अनुसूचित जाति आदेश का हवाला

शिकायतकर्ता के अनुसार अनुसूचित जातियों का निर्धारण संविधान (अनुसूचित जातियां) आदेश, 1950 के तहत किया गया था। उनका दावा है कि उस समय जिस क्षेत्र में प्रतिमा बागरी का परिवार निवास करता था, वहां बागरी समुदाय अनुसूचित जाति की सूची में शामिल नहीं था। उनका कहना है कि समिति ने इस पहलू पर स्पष्ट टिप्पणी नहीं की।

जनगणना रिकॉर्ड और टीआरआई रिपोर्ट का उल्लेख

अहिरवार ने कहा कि 1961 और 1971 की जनगणना में संबंधित परिवार ने स्वयं को अनुसूचित जाति के रूप में दर्ज नहीं कराया था। इसके अलावा उन्होंने वर्ष 1998-99 की ट्राइबल रिसर्च इंस्टीट्यूट (टीआरआई) की रिपोर्ट का हवाला देते हुए दावा किया कि उसमें विंध्य और बुंदेलखंड क्षेत्र के बागरी समुदाय का अलग सामाजिक वर्गीकरण किया गया था। उनका आरोप है कि इन तथ्यों पर भी समिति ने पर्याप्त विचार नहीं किया।

1976 की संयुक्त सूची और क्षेत्रीय आधार का मुद्दा

शिकायतकर्ता का कहना है कि वर्ष 1976 में लागू संयुक्त अनुसूचित जाति सूची के बाद बागरी/बागड़ी समुदाय को शामिल किया गया। उनका आरोप है कि इसके बाद ऐसे क्षेत्रों में भी अनुसूचित जाति प्रमाण पत्र जारी होने लगे, जहां पहले यह प्रावधान लागू नहीं था। उन्होंने सतना क्षेत्र के संदर्भ में भी इसी आधार पर सवाल उठाए।

हाईकोर्ट में चुनौती देंगे

अहिरवार ने कहा कि वह राज्य स्तरीय जाति छानबीन समिति के फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती देंगे और आवश्यकता पड़ने पर सुप्रीम कोर्ट का भी रुख करेंगे। उनका कहना है कि न्यायालय में सभी दस्तावेज और तथ्य प्रस्तुत किए जाएंगे।

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हिन्दुस्थान समाचार / नेहा पांडे

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