इंदौर के दूषित पेयजल मामले में जांच आयोग ने हाईकोर्ट में पेश की प्रारंभिक रिपोर्ट
- इंदौर के भागीरथपुरा में दूषित पानी से 35 लोगों की हो चुकी है मौत
इंदौर, 05 मार्च (हि.स.)। मध्य प्रदेश के इंदौर शहर के भागीरथपुरा क्षेत्र में दूषित पेयजल कांड को लेकर गुरुवार को उच्च न्यायालय की इंदौर खंडपीठ में सुनवाई हुई। मामले की जांच के लिए गठित आयोग ने अपनी प्रारंभिक रिपोर्ट कोर्ट को पेश की, लेकिन कोर्ट ने विस्तृत रिपोर्ट पेश करने के लिए एक माह का समय दिया है। इस मामले में अब अगली सुनवाई 6 अप्रैल को होगी।
गुरुवार को उच्च न्यायालय में हुई सुनवाई के दौरान जांच आयोग ने मामले को लेकर रहवासियों व अफसरों से अपने साक्ष्य प्रस्तुत करने के लिए कहा है। कुछ लोगों ने साक्ष्य प्रस्तुत भी किए हैं। कोर्ट ने इस मामले में नगर निगम को भी निर्माण से जुड़े रिकॉर्ड प्रस्तुत करने के लिए कहा है। पहले भी मांगे गए थे, लेकिन वे नहीं मिले। अब अगली सुनवाई को कोर्ट में रिकॉर्ड पेश करने होंगे।
गौरतलब है कि भागीरथपुरा में दूषित पानी से अब तक 35 मौतें हो चुकी हैं, जबकि साढ़े चार सौ से ज्यादा लोगों को अस्पताल में भर्ती किया गया था। कई मृतकों को दूसरी बीमारियां भी थीं, लेकिन परिजनों ने बताया कि डायरिया के कारण उनकी हालत ज्यादा खराब हो गई थी। बस्ती के 30 प्रतिशत हिस्से में नई लाइन बिछाई गई है और अब साफ पानी आ रहा है, लेकिन सड़कें अभी भी कई गलियों में खुदी हुई हैं।
ओवरहेड टैंक में पोटैशियम क्लोराइड डालने का दावा
दूषित जल से हुई मौतों को लेकर कोर्ट में दो जनहित याचिकाएं लगी हैं। गुरुवार को सुनवाई के दौरान सीनियर एडवोकेट अजय बागडिया ने अतिरिक्त तथ्यों को रिकॉर्ड पर लाने के लिए एक अंतरिम आवेदन प्रस्तुत किया। इसमें दावा किया कि भागीरथपुरा के वार्ड क्रमांक 11 के ओवरहेड टैंक में कथित रूप से पोटैशियम क्लोराइड की टैबलेट डाली गई थीं।
अजय बागडिया ने दावा किया कि ये टैबलेट नगर निगम की आधिकारिक खरीद प्रक्रिया के बाहर एक निजी दुकान से खरीदी गई थीं। इन्हें मौखिक निर्देशों के आधार पर टैंक में डाला गया था। जबकि पोटैशियम क्लोराइड पीने के पानी को शुद्ध करने के लिए स्वीकृत पदार्थ नहीं है। ऐसे में इस पूरे मामले की निष्पक्ष पुलिस जांच कराए जाने की मांग की गई है।
सुनवाई के दौरान कोर्ट को बताया गया कि इंदौर शहर में पेयजल की आपूर्ति मुख्य रूप से तीन प्रमुख स्रोतों से होती है। इनमें नर्मदा जल योजना, यशवंत सागर बांध और बिलावली तालाब शामिल हैं। इन सोर्स से आने वाले पानी को जलूद वाटर स्टेशन सहित अन्य जल शोधन केंद्रों पर शुद्ध किया जाता है। यहां क्लोरीनीकरण और अन्य तकनीकी प्रक्रियाओं के बाद पानी को शहर के लगभग 108 से 110 ओवरहेड टैंकों तक भेजा जाता है। इसके बाद इन्हीं टैंकों से पाइपलाइन के जरिए अलग-अलग इलाकों में घरों तक पानी की सप्लाई की जाती है।
वकील बागडिया ने कोर्ट को बताया कि जलूद से आने वाली वितरण लाइन में तीसरे आखिरी टैंक तक पानी पूरी तरह मानक के अनुरूप और दूषणमुक्त पाया गया। वहीं उसी लाइन के दूसरे आखिरी और आखिरी टैंक, जिनसे भागीरथपुरा इलाके में पानी सप्लाई होता है, वहां का पानी दूषित पाया गया। पिटीशन में यह भी कहा गया कि मध्य प्रदेश पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड की रिपोर्ट में शहर के कई इलाकों के ग्राउंडवाटर में टोटल और फीकल कोलीफॉर्म बैक्टीरिया की मौजूदगी दिखाई गई। इसके बावजूद बीमारी और मौतों के मामले भागीरथपुरा इलाके तक ही सीमित थे।
कोर्ट में यह भी बताया गया कि ओवरहेड टैंक की देखरेख के लिए पांच लोग जिम्मेदार हैं। इनमें तीन कर्मचारी नगर निगम के हैं, जबकि दो कर्मचारी निजी कंपनी रामकी इंडस्ट्रीज से जुड़े बताए गए हैं। इनके खिलाफ जांच हो। पोटेशियम क्लोराइड से पानी को जहरीला बनाया गया, जिससे लोग प्रभावित हुए। जांच के बाद केस दर्ज हो।
इस कांड को लेकर अब तक नगर निगम मौतों की ठोस वजह पता नहीं कर पाया है। पहले नर्मदा लाइन पर शौचालय बनने की बात कही गई थी, लेकिन बाद में दूसरी लाइनें खराब होने और पानी मिक्स होने की बात भी अफसर कहते रहे। पिछली सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट के समक्ष कहा गया है कि डेथ ऑडिट में 16 मौतें दूषित पानी से होना पाई गई हैं, बाकी मौतों का ऑडिट नहीं हो पाया है। कोर्ट ने पिछली सुनवाई में अफसरों से पूछा था कि इसका आधार क्या है? क्या मृतकों के शवों का पोस्टमॉर्टम किया गया है? विसरा रिपोर्ट कहां है? लेकिन उसका जवाब अफसर ठीक से नहीं दे पाए थे। इस बार हुई सुनवाई में भी यह सवाल अनसुलझे रहे। अब आयोग इससे जुड़े दस्तावेज संबंधित विभागों से लेकर अपनी जांच आगे बढ़ाएगा।
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हिन्दुस्थान समाचार / मुकेश तोमर

