भगवन्नाम की दिव्य शक्ति श्रद्धा की प्रतीक्षा किए बिना होती है प्रभावशील: डॉ. उमेश चन्द्र शर्मा

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भगवन्नाम की दिव्य शक्ति श्रद्धा की प्रतीक्षा किए बिना होती है प्रभावशील: डॉ. उमेश चन्द्र शर्मा


झाबुआ, 22 सितम्बर (हि.स.)। भगवान् श्रीकृष्ण का दिव्य एवं पावन नाम दसों दिशाओं में मङ्गल ही मङ्गल करता है। फिर भगवन्नाम चाहे भाव से लिया जाए, अथवा बिना भाव से लिया जाए, वह अपना प्रभाव अवश्य ही दिखाता है, क्यौंकि वस्तु की स्वाभाविक शक्ति इस बात की प्रतीक्षा नहीं करती कि यह मुझ पर श्रद्धा रखता है, या नहीं रखता। परमात्मा के अनगिनत नाम है, और सब नाम समान रूप से दिव्य और प्रभावी है, फिर चाहे राम, कृष्ण, शिव या हरि का नाम लिया जाए अथवा देवी शक्ति दुर्गा का नाम। भगवान् के किसी भी नाम में कहीं कोई भेद नहीं है।

उक्त विचार श्रीमद्भागवत महापुराण में वर्णित अजामिल प्रसंग के दौरान डॉ. उमेश चन्द्र शर्मा ने व्यासपीठ से व्यक्त किए। शर्मा जनजातीय बाहुल्य झाबुआ जिले के थान्दला में श्रीमद्भागवत भक्ति पर्व के अन्तर्गत आयोजित नौ दिवसीय श्रीमद्भागवत सप्ताह महोत्सव के तीसरे दिवस मंगलवार को स्थानीय श्री लक्ष्मीनारायण मंदिर सभागार में कथावाचन कर रहे थे।

श्रीमद्भागवत में उल्लेखित उक्त कथा प्रसंग का वाचन करते हुए डॉ. शर्मा ने कहा कि भगवान् के चरणारविन्द का आश्रय ग्रहण कर द्रढ़ निष्ठा से किये गये अखंड नाम स्मरण के द्वारा जब कोई निष्ठावान साधक साधना पथ पर आगे बढ़ता है, तब उसे परमात्मा की महती कृपा का आभास होने लगता है। शर्मा ने कहा कि जैसे अग्नि से जानते हुए या अनजाने में भी संपर्क हो जाने पर अग्नि जलाती है। ऐसे ही जानते हुए या अनजाने में विष या अमृत पान करने से वो भी अपना प्रभाव दिखाते हैं, उसी प्रकार भगवान् का नाम भी चाहे कैसे भी लिया जाए वह अपना प्रभाव डालता ही है। श्री शुकदेव जी महाराज कहते हैं कि संकेत से किसी अन्य अभिप्राय से, परिहास में, तान अलापने में या फिर किसी की अवहेलना करने के उद्देश्य से भी यदि कोई भगवान् के नामों का उच्चारण करता है, तो उसके पाप नष्ट होते हैं।

आज तीसरे दिन भक्त प्रह्लाद की कथा का भी वाचन किया गया। भक्त प्रह्लाद की भगवान् के चरणों में द्रढ़ निष्ठा का उल्लेख करते हुए डॉ शर्मा ने कहा कि अत्यन्त विषम ओर दुःखदायी परिस्थितियों में भी प्रह्लाद न तो जरा भी विचलित हुए, और न ही उनकी प्रभु निष्ठा में किसी भी तरह से कमी आई। विपरीत समय में भी वे निष्ठावान बने रहे। वे भक्ति पथ पर अडिग रहे, परिणामस्वरूप भगवान् को नृसिंह रूप में अवतार लेकर इस धराधाम पर आना पड़ा। शर्मा ने उक्त प्रसंग में कहा कि कहने में तो भगवान् ने हिरण्यकशिपु का वध किया, किंतु भगवान् कभी भी किसी को मारते नहीं, बल्कि कल्याण ही करते हैं। प्रभु सबके सुह्रद हैं, और वे कभी भी किसी जीव के प्रति कुभाव नहीं रखते, किंतु अधर्मियों को दंड देने का उनका अपना एक तरीका है, और उसमे भी उनकी कृपा ही निहित होती है। हिरण्यकशिपु प्रभु का ही एक सेवक था, किंतु शाप वश उसने असुर योनि में जन्म लिया, और भगवान् से शत्रुता की, किंतु इस रूप में भी उस असुरराज ने भगवान् की स्मरण रूप भक्ति ही की थी इसलिए भगवान् ने वध कर उसका उद्धार कर दिया। । दयालु प्रभु सबके सुह्रद हैं, और सब जीव उनके अपने हैं, इसलिए वे न तो कभी किसी का अनिष्ट नहीं करते हैं, और न ही किसी का वध। श्री भगवान् के द्वारा दैत्यों और राक्षसों के वध में भी उनका कल्याण ही निहित होता है।

आज तीसरे दिवस की कथा में हिरण्यकश्यपु उद्धार सहित भिन्न भिन्न ग्रहों की स्थिति ओर गति का वर्णन, नरकों की गति, मानव धर्म, स्त्री धर्म, वर्ण धर्म और गृहस्थ संबंधी सदाचार का भी वर्णन किया गया।

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हिन्दुस्थान समाचार / मुकेश तोमर

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