अहंकार रुपी दानव ही है मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु : डॉ. उमेशचन्द्र शर्मा
झाबुआ, 20 सितम्बर (हि.स.)। एक अह़ंकार ही वह बड़ा शत्रु है, जो मनुष्य के समग्र जीवन पथ को जटिल एवं दुखपूर्ण बना देता है। मानव जीवन में एक बड़ी बाधा के रूप में उपस्थित होने वाला अहंकार रुपी यह दानव न केवल हमारी आध्यात्मिक यात्रा को ही अवरुद्ध करता है, बल्कि पारिवारिक और सामाजिक जीवन को भी समस्या ग्रस्त एवं चुनौती पूर्ण बनाकर उसे तहस नहस कर देता है, क्यौकि अहंकार का मद किसी भी तथ्य या विचार को सहज में स्वीकार करने हेतु तत्पर नहीं होता,बल्कि वह अपने सामने आने वाली विराट् सत्ता को भी तुच्छ समझता है, परिणामस्वरूप समग्र जीवन बोझ में परिवर्तित होकर अंततः पतन का शिकार हो जाता है।
यह विचार कथावाचक डॉ. उमेशचन्द्र शर्मा ने मध्य प्रदेश के जनजातीय बाहुल्य झाबुआ जिले के अनुविभागीय मुख्यालय थान्दला में श्रीमद्भागवत भक्ति पर्व के अन्तर्गत आयोजित श्रीमद्भागवत सप्ताह महोत्सव के प्रथम दिन रविवार को स्थानीय श्रीलक्ष्मीनारायण मंदिर सभागार में श्रीमद्भागवत कथा के दौरान व्यक्त किए। शर्मा श्रीमद्भागवत महापुराण में उल्लेखित राजा परीक्षित को दिए शाप का कथा प्रसंग वर्णन कर रहे थे।
उन्होंने कहा कि राजमद में राजा परीक्षित को ध्यानयोगी और तपोनिष्ठ शमीक मुनि भी ढोंगी दिखाई पड़े, ऐसे में उनका अहंकार जागृत हो गया, कि मैं प्यास से पीड़ित होकर जिस मुनि के आश्रम में आया हूं, वह तपस्वी नहीं, ढोंगी है, और वह मेरी अवहेलना करते हुए आंखें मूंद कर बैठा ध्यान साधना का ढोंग कर रहा है। अहंकार जनित अपने मन में ऐसा मानते हुए राजा परीक्षित ने ध्यानस्थ ऋषि के गले में मरा हुआ सर्प डाल दिया, परिणामस्वरूप उन्हें ऋषि पुत्र श्रृंगी के शाप का भाजन होते हुए मृत्यु का ग्रास बनना पड़ा।
डॉ शर्मा ने श्रीमद्भागवत कथा में आये हिरण्याक्ष वध की कथा प्रसंग का वाचन करते हुए कहा कि अपने बल के अहंकार में चूर दैत्यराज हिरण्याक्ष ने पृथ्वी की अवहेलना करते हुए उसे समुद्र में डुबो दिया था, और देवी पृथ्वी को उस दैत्य के आतंक से मुक्त कराने हेतु वाराह रुप में अवतरित हुए भगवान् श्री हरि विष्णु को ही चुनौती देने लगा था, तब भगवान् वाराह ने एक थप्पड़ जड़कर उसके सारे अहंकार का नाश करते हुए उसका वध कर दिया।
उन्होंने कहा कि पौराणिक आख्यानों में ऐसे और भी कई राजाओं का वर्णन मिलता है जिन्होंने अहंकार के वशीभूत होकर ईश्वर के अस्तित्व तक को अस्वीकार कर दिया तथा अपने को ही ईश्वर समझने लगे और परिणाम यह हुआ कि उन्हें न केवल अपने जीवन में गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ा अपितु वे पतन के गर्त में समा गए।
शर्मा ने कहा कि यह अहंकार ही मानव मन को छल कपट से पूर्ण कर कलुषित कर देता है, तब विकारों से भरे कलुषित मन से आखिर आध्यात्मिक क्षेत्र में धूमिल होती उन्नति और व्यावहारिक जीवन में आने वाली विभिन्न चुनौतियों को कैसे टाला जा सकता है? अहंकार के मद में चूर कपटपूर्ण हृदय कदापि भगवान् का निवास स्थान नहीं हो सकता। ईश्वर की उपस्थिति का एहसास प्रेमपूर्ण हृदय में ही हो सकता है, इसलिए बहुत जरूरी है कि हम अपने जीवन में अहंकार युक्त कपट पूर्ण व्यवहार को किंचित भी स्थान न दें, और सबके प्रति दयाभाव रखते हुए स्वभाव को सरल बनाए रखें।
ईश्वर के प्रति निष्ठावान और समर्पित जीवों को अपने मन की स्थिति पर ध्यान देते हुए प्रयास करते रहना चाहिए कि मन में विकार प्रवेश न करने पाए, क्योंकि मन ही मनुष्य के लिए बंधन और मोक्ष दोनों का कारण बनता है। अपने मन की निर्मलता के हेतु आवश्यक है कि हम निरहंकारी बनें, और ईश्वर के शरणागत होकर उन प्रभु का स्मरण करते हुए प्रभु प्रेम प्राप्ति के पथ पर आगे बढ़े। किंतु प्रश्न यह उठता है कि हमारा मन आखिर अहंकार रहित और निर्मल कैसे हो, तो निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि ऐसा भगवान् के नाम के प्रताप और भगवान् की पावन लीला कथाओं के श्रवण से ही संभव हो सकता है, अन्यथा हमारे पास ऐसा कोई रसायन नहीं है, जो मन को निर्मलता प्रदान कर सके।
डॉ शर्मा ने हनुमान चालीसा की चौपाई उद्धृत करते हुए कहा कि राम रसायन तुम्हरे पासा, सदा रहो रघुपति के दासा। अर्थात भगवान् श्रीराम के पावन नाम रुपी रसायन से ही श्री हनुमानजी महाराज भगवान् श्री राम के प्रिय दास बने। उन्होंने कहा कि भगवान् का नाम चाहे वह श्रीराम नाम श्री कृष्ण, शिव या दुर्गा का नाम हो, वह मन को निर्मल और प्रभु का प्रेमपात्र बना देता है। इसीलिए श्रीकृष्ण चैतन्य महाप्रभु ने भगवन् नाम संकीर्तनं को ही भगवान् की प्राप्ति और सांसारिक कामनाओं की पूर्ति का साधन निरुपित करते हुए हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे, हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे नामक महामंत्र के संकीर्तन, जप और स्मरण की प्रेरणा दी।
डॉ शर्मा ने कहा कि जो मनुष्य शरणागति भाव से भगवान् में ही अपना चित्त स्थिर कर एवं भगवान् के परायण होकर उनकी कथाओं का श्रवण, कीर्तन ओर स्मरण करते हैं, ओर प्रभु चरणों में अनन्य भाव से प्रेम करते हैं, उन प्रेमी भक्तों को संसार के विविध ताप कोई कष्ट नहीं पहुंचा सकते हैं। सुद्रढ़ भक्ति, योग ओर वैराग्य युक्त ज्ञान से प्रभु की प्राप्ति की जा सकती है, किंतु यह तभी संभव है, जब हम साधु पुरूषों का संग करें ओर परमात्म तत्व का यथार्थ ज्ञान कराने वाली तथा हृदय ओर कानों को प्रिय लगने वाली भगवान् की लीला कथाओं का सेवन करें, सभी देहधारियों के प्रति दया भाव रखते हुए अपने स्वभाव को सरल बनाएं, किसी के भी प्रति शत्रुता का भाव न रखकर सबका हित चाहें ओर सब परिस्थितियों में शांत बने रहें। भगवत्प्राप्ति के विभिन्न साधनों में श्रीहरि कि भक्ति के समान अन्य कोई मंगलमय मार्ग नहीं है।
आज पहले दिन की कथा में भगवान् के लीला अवतारों की कथा, सृष्टिक्रम वर्णन, अश्वत्थामा का मानमर्दन, वाराह अवतार और भीष्म स्तुति सहित हिरण्याक्ष उद्धार की कथा का भी वाचन किया गया।
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हिन्दुस्थान समाचार / मुकेश तोमर

